PICs: सिर्फ घाट की सफाई ही नहीं करतीं ये मुस्लिम महिलाएं, हर साल मनाती हैं छठ
छठ पर्व करने वाली मुस्लिम महिला नसीमा खातून का कहना है कि 'सास की मौत के बाद 1 साल हमारे घर में छठ पर्व नहीं किया गया था। जिसके बाद हमारे पति की तबियत खराब होने लगी। फिर हमने अपनी सास की परंपरा को जारी रखा और छठी मैया से अगले साल व्रत करने की मन्नत मांगी।'
पटना। आज से लोक आस्था के महापर्व छठ की शुरुआत हो चुकी है, इस महापर्व की लोकप्रियता और पवित्रता का एक अलग महत्व माना जाता है। ये पर्व तो खासकर हिंदुओं का महापर्व माना जाता है लेकिन इस पर्व को लेकर कुछ ऐसी तस्वीर सामने आई है जो मजहब के गिले-शिकवे दूर कर इसे आस्था का महापर्व बना देती है। बिहार के कुछ मुस्लिम समुदाय के द्वारा जहां हिंदुओं का महापर्व छठ घाट की साफ सफाई की जा रही है तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी मुस्लिम परिवार हैं जो पिछले कई वर्षों से श्रद्धा और विश्वास के साथ इस छठ पर्व को मना रहे हैं। आइए अब हम आपको बताते हैं वैसे मुस्लिम परिवारों के बारे में जिसकी छठ पर्व के प्रति आस्था सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल देखने को मिली है। सबसे पहले हम बात करेंगे बिहार के भागलपुर जिले की जहां छठ व्रत की तैयारी में हिस्सा ले रहे कुछ मुसलमान समुदाय के लोगों ने सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश की है। भागलपुर में छठ व्रतियों की सुविधा के लिए मुस्लिम समुदाय के लोग छठ घाटों की सफाई करने में लगे हुए हैं।

तस्वीरें पेश कर रही हैं मिसाल
एक-दो नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय के दर्जनों लोगों की टोली गंगा के किनारे जमा होकर सफाई अभियान में जुटी हुई है। ये नजारा भागलपुर के खिरनीघाट से लेकर कालीघाट तक देखने को मिली। जहां मां काली की प्रतिमा विसर्जन के बाद घाट पर पसरी गंदगी की सफाई में मुस्लिमों की एक टोली काफी मेहनत और आस्था से घाट की साफ सफाई कर रही है। ये तस्वीर सामने आने के बाद ऐसा कहा जा रहा है कि धर्म लोगों को जोड़ने के साथ-साथ प्रकृति को पूरी तरह समर्पित जाति धर्म और मजहब से ऊपर उठकर लोगों को जोड़ रही है। तो दूसरी तरफ बिहार के सिवान जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पर्व की आस्था को लेकर एक मिसाल कायम की है। इस तस्वीर में एक गांव के कई मुस्लिम परिवार पिछले कई दशक से नियम और निष्ठा के साथ छठ का व्रत कर रहा है।

आस्था का महापर्व 'छठ'
बिहार के सिवान जिले के हुसैनगंज प्रखंड के बड़रम गांव के कई मुस्लिम परिवारों में भी छठ धूम-धाम से किया जाता है। वहीं जब छठ पर्व करने वाले मुस्लिम परिवार के एक छठ व्रती से बातचीत किया गया तो उन्होंने कहा कि हमारे सास के द्वारा मन्नत मांगी गई थी कि हमें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी तो हम छठ करेंगे । कुछ ही सालों बाद छठ मैया ने उनकी मन्नत पूरी कर दी और अब्दुल जलील उर्फ भिखारी के रूप में उन्हें एक संतान की प्राप्ति हुई ।तब से ही हमारे यहां छठ हो रही हैं।तब से छठ व्रत की परंपरा उनके परिवार में हैं। पहले यह पर्व अब्दुल की मां करती थी अब उसकी पत्नी नईमा खातून विगत 25 वर्षों से करती आ रही है।

नसीमा खातून ने बताया क्यों मनाती हैं छठ
छठ पर्व करने वाली मुस्लिम महिला नसीमा खातून का कहना है कि सास की मौत के बाद 1 साल हमारे घर में छठ पर्व नहीं किया गया था। जिसके बाद हमारे पति की तबियत खराब होने लगी। फिर हमने अपनी सास की परंपरा को जारी रखा और छठी मैया से अगले साल व्रत करने की मन्नत मांगी और तब से लेकर आज तक ये पर्व कर रहे हैं। नसीमा के साथ-साथ लाड़ली खातून, जैमुन खातून जैसे और भी कई मुस्लिम परिवार छठ की पूजा बड़े ही आस्था और विश्वास के साथ करता है। जो लोग इस पूजा को नहीं करते वो इसका प्रसाद छठ व्रत करने वाली मुस्लिम महिलाओं को देते हैं और पूजा खत्म होने के बाद बड़े ही श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रसाद को ग्रहण करते हैं।

गांव है हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल
तो दूसरी तरफ गांव के एक हिंदू परिवार के रहने वाले शिक्षक राजेश रंजन सिन्हा का कहना है कि आप को हिंदू मुस्लिम की एकता देखनी है तो हमारे गांव में आकर छठ पर्व देखिए। यहां घाट की सफाई से लेकर चूल्हा बनाने तक हिंदू-मुस्लिम महिलाएं एक साथ करती है। हिंदुओं की तरह ही मुस्लिम परिवार वाले भी छठ पर्व का इंतजार बड़े ही बेसब्री से करते हैं और दूर-दूर से छठ पर अपने घर पहुंचते हैं।












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