'EC को बिहार के इतिहास-भूगोल की समझ नहीं'– SIR को लेकर नीतीश के सांसद का चुनाव आयोग पर फूटा गुस्सा
JDU MP Girdhari Yadav Slams EC: बिहार में चल रही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) प्रक्रिया को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। इस पर पक्ष-विपक्ष का सियासी बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा। जेडीयू सांसद गिरधारी यादव ने इस प्रक्रिया की मंशा और कार्यान्वयन को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
दोनों नेताओं ने इसे जनविरोधी, अव्यवहारिक और लोकतंत्र को कमजोर करने वाला कदम बताया है। मीडिया से बात करते हुए जेडीयू सांसद गिरधारी यादव ने चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, कि "चुनाव आयोग को बिहार का न इतिहास पता है, न भूगोल। एक महीने में दस्तावेज जमा करने की समयसीमा अव्यवहारिक है।"

JDU सांसद ने क्या कहा?
जनता दल यूनाइटेड (JDU) के सांसद गिरधारी यादव ने इस प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर जमकर हमला बोला है। उन्होंने SIR प्रक्रिया को जनविरोधी, अव्यवहारिक और लोकतंत्र को कमजोर करने वाला कदम करार दिया है। गिरधारी यादव ने बुधवार, 23 जुलाई को दिल्ली में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा, "चुनाव आयोग को बिहार का न इतिहास पता है और न भूगोल। सिर्फ एक महीने के भीतर सभी दस्तावेज जमा करने की जो समयसीमा तय की गई है, वह पूरी तरह अव्यवहारिक और ज़मीनी सच्चाई से कटे हुए फैसले का उदाहरण है।"
'सच्चाई बोलना जरूरी है, चाहे पार्टी कुछ भी कहे'
जेडीयू सांसद ने कहा कि वह खुद सभी जरूरी दस्तावेज इकट्ठा करने में 10 दिन लगा चुके हैं, तो आम जनता के लिए इस काम को एक महीने में पूरा करना कितना मुश्किल होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है। उन्होंने खासतौर पर प्रवासी मतदाताओं की कठिनाइयों का ज़िक्र करते हुए कहा, "मेरा बेटा अमेरिका में रहता है, अब वो कैसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर एक महीने की समयसीमा में इसे पूरा करेगा? यह संभव ही नहीं है।"
गिरधारी यादव ने दो टूक कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है और उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संसद तक का रास्ता चुना है। उन्होंने कहा कि अगर मैं सच नहीं बोल सकता, तो सांसद बनने का कोई मतलब नहीं। पार्टी कुछ भी कहे, लेकिन सच बोलना जरूरी है।
जबरन थोपे गए निर्णय का आरोप
सांसद यादव ने चुनाव आयोग पर SIR प्रक्रिया को जबरन थोपने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि आयोग ने जमीनी हालात को नजरअंदाज करते हुए एक कठोर और जल्दबाजी भरा फैसला लिया है। उनका सुझाव है कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए कम से कम छह महीने का समय देना चाहिए था ताकि सभी नागरिक ठीक से अपने दस्तावेज अपडेट करवा सकें और लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित न हों।
गिरधारी यादव के साथ-साथ कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं और इसे "वोटर सूची से वंचित करने की साज़िश" बताया है। उन्होंने दावा किया कि यह पूरी कवायद आदिवासी, दलित, पिछड़े और मुस्लिम समुदायों को मतदाता सूची से हटाने के लिए की जा रही है।
लोकतंत्र पर संकट का संकेत?
बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष के इस विरोध से यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह प्रक्रिया सचमुच निष्पक्ष है, या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक एजेंडा है? फिलहाल, यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक गरमा गया है और आने वाले दिनों में यह बिहार की राजनीति और चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।
संसद में भी गूंजा मुद्दा, हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित
संसद के दोनों सदनों - लोकसभा और राज्यसभा - में जैसे ही कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी सांसदों ने SIR प्रक्रिया सहित कई मुद्दों पर विरोध शुरू कर दिया। इस कारण राज्यसभा की कार्यवाही एक मिनट के अंदर ही स्थगित कर दी गई, जबकि लोकसभा में कुछ मिनटों तक हंगामे के बीच कार्यवाही चली। सत्र शुरू होने से पहले संसद भवन के बाहर भी विपक्षी सांसदों ने SIR के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।
बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष ने सवालों की झड़ी लगा दी है। जेडीयू और कांग्रेस के नेताओं की आलोचना इस बात की ओर इशारा करती है कि इस पूरी प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता, समयसीमा और निष्पक्षता पर गंभीर आशंकाएं हैं। अब देखना यह होगा कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार इस मुद्दे पर क्या जवाब देती हैं और क्या SIR प्रक्रिया में कोई बदलाव या विस्तार होता है। यह मामला न केवल चुनाव की प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा है, बल्कि आगामी बिहार विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।












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