क्या कोरोना के कम आंकड़े दिखा कर बिहार में चुनाव कराना चाहती है नीतीश सरकार?

क्या बिहार में वोट की राजनीति के चलते कोरोना मरीजों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही है ? कोरोना की रफ्तार इतनी तेज है सिर्फ 12 दिनों में ही इसके मरीजों की संख्या दोगुनी हो गयी है। यानी बिहार एक खतरनाक मुहाने पर खड़ा है। यह स्थिति तब है जब जांच की संख्या औसत से भी कम है। अगर रोजाना जांच की संख्या बढ़ी तो बिहार के आंकड़े और भयावह हो सकते हैं। ऐसी विकट परिस्थिति में भी चुनावी राजनीति चरम पर है। विपक्षी दल राजद का आरोप है कि सरकार कोरोना मरीजों की संख्या कम दिखाने के लिए जांच पर ध्यान नहीं दे रही है। वह मरीजों की संख्या कम दिखा कर बिहार में सब कुछ ठीक होने का एहसास दिलाना चाहती है ताकि चुनाव अक्टूबर-नवम्बर तक हो जाएं। मौत के आंकड़ों पर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। 19 जुलाई को बिहार सरकार ने कोरोना से मरने वालों की संख्या 179 बतायी जब कि इस दिन केन्द्र सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो ने यह संख्या 208 बतायी। राजद ने नीतीश सरकार पर मौत के आंकड़ों को छिपाने का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ सत्तारुढ़ जद का कहना है कि राजद हार के डर से चुनाव को नियत समय से टालना चाहता है। अभी बिहार में कोरोना की जो विस्फोटक स्थिति है उसके हिसाब से क्या तीन महीने बाद चुनाव कराया जाना उपयुक्त होगा?
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कम जांच पर सवाल
केन्द्र से निरीक्षण के लिए आयी टीम ने भी बिहार में कोरोना की कम जांच पर सवाल उठाया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रोज 20 हजार जांच का लक्ष्य निर्धारित किया है लेकिन 19 से 20 जुलाई के दौरान 24 घंटे में केवल 10 हजार 276 नमूनों की जांच हो पायी। यानी जांच का टारगेट अभी भी बहुत दूर है। राजद का आरोप है कि कोरान जांच के मामले में सबसे अधिक लापरवाही हो रही है। तेजस्वी के मुताबिक राजद कई विधायकों ने कोरोना जांच के लिए नमूने दिये हैं लेकिन 19 दिन बीत जाने के बाद भी उनकी रिपोर्ट नहीं मिली है। विधान परिषद के कार्यकारी सभापति कोरोना संक्रिमत हो चुके हैं। खुद मुख्यमंत्री को आशंका के बाद कोरोना जांच के लिए मजबूर होना पड़ा। कई सांसद, विधायक इस बीमारी की चपेट में हैं। अफसर, डॉक्टर और सरकारी कर्मचारी इसका शिकार हो चुके हैं। ऐसे में सरकार को स्थिति की गंभीरता समझनी चाहिए। सरकार ने नवम्बर तक मुफ्त राशन देने में जो मुस्तैदी दिखायी वैसी मुस्तैदी पीपीई किट और जांच सुविधाओं के मामले में नदारत रही। क्या सरकार ने वोट बैंक को ध्यान में रख कर फैसले लिये। चुनाव से अधिक जरूरी है लोगों की जान बचाने के लिए जांच और इलाज का इंतजाम।

वोट बैंक छिटकने के डर से सख्ती नहीं?
बिहार में कोरोना के भयंकर संक्रमण के बाद सरकार की मंशा पर सवाल उठने लगे हैं। नीतीश सरकार चुनावी लाभ-हानि के गणित में उलझी रही। उसने समय रहते इलाज और सख्त ल़ॉकडाउन पर पर विचार नहीं किया। सरकार की लापरवाही से पिछले 45 दिनों के अनलॉकडाउन में कोरोना संक्रमण तेजी से बहुत तेजी से बढ़ा है। क्या सरकार ने राजनीति नुकसान के डर से अनलॉकडाउन में नियमों का सख्ती से पालन नहीं कराया ? रोजी-रोटी को लेकर लोग पहले से नाराज चल रहे हैं ? ऐसे में सरकार इन पर सख्ती करने से डर रही है। कोरोना गाइलाइंस की धज्जियां उड़ा कर लोग हाट-बाजार में जुट रहे हैं और पुलिस कुछ नहीं कर पा रही है। शादी विवाह में 50 से अधिक लोग शामिल होते रहे जो संक्रमण का सबसे बड़ा कारण बना। कुछ शर्तों के साथ लॉकडाउन में छूट मिली थी लेकिन उनका पालन नहीं कराया गय़ा। इसका नतीजा ये है कि अब बिहार में रोजाना करीब एक हजार लोग कोरोना संक्रमित पाये जा रहे हैं।

12 दिन में दोगुने मरीज
1 जुलाई को बिहार में कोरोना मरीजों की संख्या 10,076 थी। 20 जुलाई को कोरोना मरीजों की संख्या 26,379 हो गयी। यानी 20 दिनों 16 हजार से अधिक मरीज हो गये। जब कि पहले 10 हजार मरीज की संख्या पहुंचने में करीब साढ़े चार महीने का समय लगा। 23 मार्च को बिहार में कोरोना संक्रमितों की संख्या केवल 3 थी। पिछले 12 दिनों में ही कोरोना संक्रमितों की संख्या दोगुनी हो गयी है। 8 जुलाई को कोरोना मरीजों की संख्या 13 हजार 274 थी तो 20 जुलाई को यह संख्या 26 हजार 379 हो गयी। विपक्षी दलों का आरोप है कि कोरोना की विस्फोटक फैलाव के बावजूद नीतीश सरकार चुनाव की तैयारी में जुटी है। आरोप के मुताबिक खगड़िया में राज्य कर्मचारियों के लिए इवीएम प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू कर दिया गया है। वोटर लिस्ट को अपडेट करने का काम भी चल रहा है। एनडीए की सहयोगी लोजपा अभी चुनाव के पक्ष में नहीं है। राजद पहले से चुनाव टालने के पक्ष में है। अब फैसला चुनाव आयोग को लेना है।
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