Bihar News: कृषि प्रधान राज्य में दाल-तेल की किल्लत, त्योहारों से पहले महंगाई का नया डर, आसमान छू सकते हैं दाम
Bihar News: बिहार, जिसे परंपरागत रूप से "कृषि प्रधान राज्य" कहा जाता है, इस समय दाल और तेलहन की भारी कमी से जूझ रहा है। कृषि विभाग की ताज़ा रिपोर्ट एक गंभीर तस्वीर पेश करती है-राज्य की कुल खपत और उत्पादन के बीच इतना बड़ा अंतर है कि इसका असर न केवल किसानों और व्यापारियों पर, बल्कि आम उपभोक्ता की थाली पर भी साफ़ दिख रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यही वजह है कि आने वाले महीनों में दाल और खाद्य तेल की कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है।

उत्पादन बनाम मांग: संकट की जड़
दाल: 2023-24 में राज्य को 11.92 लाख टन दाल की ज़रूरत थी, जबकि उत्पादन सिर्फ 3.98 लाख टन पर सिमटा। यानी लगभग 7.94 लाख टन की कमी।
तेलहन: तस्वीर और भी चिंताजनक है। ज़रूरत 14.31 लाख टन की थी, पर उत्पादन सिर्फ 1.5 लाख टन। करीब 12.8 लाख टन का अंतर।
प्रति व्यक्ति खपत: भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के मुताबिक हर व्यक्ति को रोज़ 25 ग्राम दाल और 30 ग्राम तेल की आवश्यकता है। मगर बिहार में उपलब्धता दाल की केवल 3 ग्राम और तेल की 10 ग्राम है।
क्यों घट रहा है उत्पादन
खेती का पैटर्न: राज्य में पारंपरिक तौर पर धान और गेहूं को प्राथमिकता मिलती है। दाल और तेलहन फसलें किसानों की प्राथमिक सूची में नीचे हैं।
सिंचाई और तकनीक की कमी: नहर और ट्यूबवेल नेटवर्क कमजोर है, आधुनिक बीज और तकनीकी सहयोग सीमित है।
जलवायु का असर: अनियमित मानसून और जलवायु परिवर्तन ने पैदावार घटाई है।
बाजार का रुझान: धान-गेहूं की सरकारी खरीद होती है, जबकि दाल और तेलहन के लिए स्थायी समर्थन मूल्य का भरोसा नहीं।
बाज़ार पर असर
आयात पर निर्भरता: बिहार अपनी ज़रूरत का लगभग 70-80% दाल और 90% तक तेल बाहर से मंगाता है। परिवहन लागत और बिचौलियों के मार्जिन से खुदरा दाम बढ़ जाते हैं।
हालिया रुझान: पटना, गया और भागलपुर मंडियों में अरहर दाल का भाव पहले ही ₹150-₹160 प्रति किलो के आसपास है, जबकि सरसों तेल ₹170-₹180 प्रति लीटर पर पहुंच चुका है।
मौसमी दबाव: त्योहारों के मौसम (दुर्गापूजा से छठ तक) में खपत बढ़ती है। ऐसे समय में आपूर्ति की कमी दामों को और ऊपर धकेल सकती है।
विशेषज्ञों का अनुमान: आगे क्या
थोक व्यापारी मान रहे हैं कि यदि राज्य सरकार ने स्टॉक सीमा और आयात पर समय रहते कदम नहीं उठाए तो अगले दो-तीन महीनों में दाल के भाव 10-15% और बढ़ सकते हैं। तेलहन की स्थिति अधिक नाज़ुक है। सरसों तेल और सोयाबीन तेल की कीमतों में 15-20% उछाल की आशंका जताई जा रही है।
उपभोक्ताओं पर सीधा असर
कीमतें बढ़ने से मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों की थाली से प्रोटीन और वसा जैसे आवश्यक पोषक तत्व घटने का खतरा है। पहले से ही बिहार में औसत प्रोटीन खपत राष्ट्रीय स्तर से कम है। दाल और तेल की महंगाई कुपोषण को और बढ़ा सकती है।
समाधान की दिशा
कृषि विशेषज्ञों का सुझाव है कि राज्य सरकार को दलहन-तेलहन के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) पर सीधी खरीद, क्लस्टर फार्मिंग, और माइक्रो-इरिगेशन जैसी नीतियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही, बीज वितरण और किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम को तेज़ करने से अगले दो-तीन वर्षों में उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
बिहार में दाल और तेलहन की कमी सिर्फ कृषि नीति की चुनौती नहीं, बल्कि आम नागरिक की रसोई का संकट बनती जा रही है। मौजूदा हालात और त्योहारों की बढ़ती मांग को देखते हुए दाल और खाद्य तेल के दाम निकट भविष्य में और चढ़ सकते हैं। समय रहते प्रभावी कदम न उठाए गए तो यह महंगाई लंबी अवधि तक उपभोक्ताओं को परेशान करेगी। चुनाव के मद्देनज़र भी मौजूदा सरकार को उपभोक्ताओं की नाराज़गी का शिकार होना पड़ सकता है।












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