'अजब-गजब' ब्रिटिश काल की घड़ी धूप से बताती है सही समय लेकिन सोलर एनर्जी की ज़रूरत नहीं

बिहार में इन दिनों पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार नए-नए प्रयोग कर रही है। वहीं एतिहासिक धरोहरों का भी सौंदर्यीकरण किया जा रहा है।

पटना, 25 जून 2022। बिहार में इन दिनों पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार नए-नए प्रयोग कर रही है। वहीं एतिहासिक धरोहरों का भी सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। इन सब के बीच बिहार में कुछ चीज़ें रहस्यमई और अद्भुत भी है जिस ओर सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है। बिहार के रोहतास ज़िले में ब्रिटिश काल की क़रीब 150 सौ साल पुरानी घरी है। जो आज भी धूप में सही वक़्त बताती है लेकिन उसे सौर उर्जा की ज़रूरत नहीं होती है। ग़ौरतलब है कि उस घड़ी को ना ही चाभी की ज़रूरत है और ना ही किसी अन्य उर्जा स्रोत की।

'अजब-गजब' ब्रिटिश काल की धूप घड़ी

'अजब-गजब' ब्रिटिश काल की धूप घड़ी

150 साल पुरानी घड़ी की टेक्नोलॉजी आज के जमाने के लिए बेमिसाल है। लेकिन सरकार का ध्यान इस ओर नहीं है जिस वजह से इस सनलाइट वाच को पर्यटन के तौर पर पहचान नहीं मिल पा रही है। डिहरी (रोहतास जिला) के एनीकट में सिंचाई विभाग के परिसर क्षेत्र में ब्रिटिश काल की घड़ी मौजूद है। स्थानीय लोगों ने बताया कि यह शानदार धूप घड़ी 1871 में यहां स्थापित की गई थी। उस वक़्त हमारा देश अंग्रेज़ों का गुलाम था। ब्रिटिश सरकार ने सोन नहर प्रणाली बनाने के क्रम में इस धूप घड़ी को बनवाया था, ताकि यांत्रिक कार्यशाला में अधिकारियों और मज़दूरों को वक़्त देखने में आसानी हो और वह समय पर अपना काम पूरा कर सकें।

1871 ई. में की गई थी सनलाइट वॉच की स्थापना

1871 ई. में की गई थी सनलाइट वॉच की स्थापना

स्थानीय लोगों ने बताया कि ऐतिहासिक घड़ी के लिए सरकारी बोर्ड भी लगा गया है। बोर्ड में भी इस बात का ज़िक्र किया गया है कि डेढ़ सौ साल पहले सनलाइट वॉच की स्थापना 1871 ई. में की गई थी। इस धूप घड़ी बनाने के पीछे की वजह यही थी कि सोन नहर प्रणाली बनाने का काम ब्रिटिश सरकार ने यहां शुरू किया था। उस वक़्त यांत्रिक कार्यशाला में मौजूद अधिकारियों और मजदूरों को वक़्त का अंदाज़ नहीं मिल पाता था। उन लोगों को टाइम सही पता चले इसलिए खास तौर से सनलाइट वॉच बनवाया गया था। ग़ौरतलब है कि धूप घड़ी आज भी बिल्कुल सही वक़्त बताती है।

रोमन भाषा में लिखी है चबूतरे पर गिनती

रोमन भाषा में लिखी है चबूतरे पर गिनती

डिहरी के पास सिंचाई विभाग के परिसर घुसते ही धूप घड़ी का चबुतरा नज़र आता है। पहले यह चबुतरा खुला हुआ था लेकिन कुछ साल पहले इसके चारों तरफ़ बाउंड्री करवा दी गई है। आपको बता दें कि इस चबुतरे में धातु की प्लेट के साथ रोमन भाषा में पत्थर पर लिखी गिनती आज भी आसानी से पढ़ सकते है। सूरज की किरण निकलने से डूबने तक हर आधे घंटे में घड़ी सही वक्त दिखाती है। जानकारो की मानें तो इस घड़ी को भौगोलिक एतबार से पृथ्वी के घूमने की गति से घड़ी को मैच किया गया है।

गुमनामी का शिकार हो रही धूप घड़ी

गुमनामी का शिकार हो रही धूप घड़ी

बिहार में मौजूद इस धूप घड़ी को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। बोर्ड के ज़रिए इस प्राचीन घड़ी के बारे में जानकारी हासिल करते हैं साथ ही स्थानीय लोगों द्वारा घड़ी के बारे में भी पूछते हैं। ग़ौरतलब है कि पूरी दुनिया में कुछ ही जगहों पर इस तरह की धूप घड़ी मौजूद है। इस तरह के ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की ज़रूरत है। लेकिन बिहार सरकार की अनंदेखी की वजह से इस प्राचीन घड़ी को सही पहचान नहीं मिल पा रही है। साथ ही इसके रख रखाव और साफ-सफाई के लिए भी कोई खास इंतेज़ाम नहीं । अब तो कड़ी धूप में चबुतरा भी चटकने लगा है । बिहार सरकार को चाहिए कि इस ओर ध्यान देकर इस एतिहासिक घड़ी का नाम ओ निशान मिटने से बचाया जाए और इसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की पहचान मिल सके।

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