Brahmeshwar Mukhiya: मसीहा या 277 लोगों का कातिल? क्या है ब्रह्मेश्वर मुखिया की असलियत?
Brahmeshwar Mukhiya: बिहार में नरसंहारों की चर्चा होते ही ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ ब्रह्मेश्वर मुखिया का नाम सामने आता है। गूगल पर यह नाम खोजने पर एक दुबले-पतले बुजुर्ग की तस्वीर दिखती है, जो दबंग या हत्यारा नहीं लगता। लेकिन यह तस्वीर से बनाई गई धारणा गलत हो सकती है, क्योंकि वह एक शातिर और खतरनाक व्यक्ति था, जिसने बिहार में कई नरसंहारों को अंजाम दिया था।
ब्रह्मेश्वर मुखिया: राक्षस या मसीहा
क्या 277 हत्याओं को अंजाम देने वाला ब्रह्मेश्वर मुखिया एक राक्षस था? या वह नक्सलियों के खिलाफ अपने हक की लड़ाई लड़ने वाला योद्धा था? ब्रह्मेश्वर मुखिया को लेकर बिहार में दो तरह की विचारधाराएं मौजूद हैं। ब्रह्मेश्वर मुखिया ने रणवीर सेना का गठन करते समय कहा था कि वह नक्सलियों को जवाब देना चाहता है, लेकिन महिलाओं और बच्चों को शिकार बनाने के कारण उसके दावे झूठे साबित हुए।

कौन था ब्रह्मेश्वर मुखिया?
ब्रह्मेश्वर मुखिया रणवीर सेना का संस्थापक था। हालांकि, रणवीर सेना नाम का कोई संगठन पंजीकृत नहीं था, लेकिन ब्रह्मेश्वर मुखिया ने एमसीसी (माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर) के नक्सलियों को जवाब देने के लिए इसका गठन किया था। ब्रह्मेश्वर मुखिया ने जो संगठन बनाया था, उसका नाम रणवीर किसान महासंघ था, जिसे पुलिस ने रणवीर सेना का नाम दे दिया था।
नरसंहार का दौर
1990 से 2002 के बीच बिहार में नक्सलियों ने दलितों की आवाज बनने की कोशिश की और कहा कि जो लोग गरीबों को उनका हक नहीं दे रहे हैं, उन्हें हथियारों से जवाब दिया जाएगा। नक्सलियों के इस ऐलान के बाद बिहार में जातीय संघर्ष बढ़ गया। दलितों की सामूहिक हत्या के बाद बदला लेने के लिए नक्सलियों ने सेनारी नरसंहार (1999) और अफसर नरसंहार (2000) को अंजाम दिया, जिससे अगड़ी जाति के लोगों का गुस्सा बढ़ गया। सेनारी नरसंहार में 34 भूमिहारों और अफसर में 11 भूमिहार और राजपूतों की हत्या हुई थी।
MCC बनाम रणवीर सेना
एमसीसी के उग्रवादियों ने अगड़ी जाति के लोगों के घर में घुसकर उनकी हत्या की थी। तब ब्रह्मेश्वर मुखिया ने 1994 में रणवीर सेना का गठन किया। रणवीर सेना ने बिहार में लक्ष्मणपुर बाथे जैसे नरसंहारों को अंजाम दिया, जिसमें 58 दलितों की हत्या हुई थी। ब्रह्मेश्वर मुखिया बिहार के भोजपुर जिले के खोपिरा गांव का रहने वाला था और वह अपने गांव का मुखिया था, इसलिए उसे मुखिया कहा जाता था।
वर्चस्व की जंग में मुखिया की भूमिका
रणवीर सेना ने बिहार में अगड़ी और पिछड़ी जाति की लड़ाई को बहुत क्रूर बना दिया। रणवीर सेना ने नक्सलियों को जवाब देने के नाम पर दलितों पर अत्याचार किए और बथानी टोला नरसंहार (1996), लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार (1997) और शंकरबिगहा नरसंहार (1999) जैसी घटनाओं को अंजाम दिया। इन नरसंहारों को बहुत ही क्रूर तरीके से अंजाम दिया गया था। रणवीर सेना ने महिलाओं और बच्चों को भी नहीं छोड़ा और उनके साथ भी क्रूरता की। गोली मारकर आग में झोंक देना जैसी घटनाएं आम थीं।
277 लोगों की हत्या का आरोप
ब्रह्मेश्वर मुखिया को भूमिहार और अगड़ी जाति के लोग अपना मसीहा मानते थे क्योंकि वह उनके हक की बात कर रहा था, जबकि दलित उसे राक्षस मानते थे। पांच लाख के इनामी ब्रह्मेश्वर मुखिया को पुलिस ने पटना से गिरफ्तार किया था। उस पर कई मामलों में केस चला, कई केस में वह साक्ष्य के अभाव में छूट गया, फिर भी उसे नौ साल की जेल हुई। जेल से छूटने के बाद उसने कहा था कि वह मुख्यधारा में आकर किसानों के लिए काम करेगा।
रणवीर सेना बनने की कहानी
ब्रह्मेश्वर मुखिया के करीबी रहे बांके बिहारी शर्मा का कहना है कि मुखिया जी ने रणवीर सेना बनाई, लेकिन इसकी जरूरत क्यों हुई, इस पर कोई बात नहीं करता है। बिहार में भूमिहार जाति पर एमसीसी के लोग अत्यधिक अत्याचार कर रहे थे। उस वक्त बिहार में लालू यादव की सरकार थी।
गांधीवादी मुखिया कैसे हुआ हिंसक?
उस दौर के एक पत्रकार ने बताया कि "एक बार की घटना मैं बताना चाहता हूं कि कुछ लोगों की हत्या एमसीसी वालों ने कर दी और लाश तीन दिनों तक गांव में पड़ा रही। सरकार ने दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। भूमिहारों को जमीन जोतने नहीं दिया जा रहा था। उनसे उनके लाइसेंसी हथियार छीने जा रहे थे, मजदूरों को मारा जा रहा था। पैसा नहीं देने पर हत्या हो रही थी और सरकार चुप थी, थक कर रणवीर सेना का गठन किया गया। मुखिया जी आतंक नहीं शांति चाहते थे, लेकिन कितने लोगों की बलि होते चुपचाप देखते। वे तो शुरुआत में गांधीवादी थे। 80-85 बीघा के गृहस्थ, अपने मजदूरों की चिंता करने वाले सबको खिलाकर खाने वाले, लेकिन कोई भी कितना अत्याचार सह सकता है? क्रिया के विपरीत तो प्रतिक्रिया होगी ना, सो हुई। मुखिया जी को बदनाम किया जाता है, उन्होंने जिस वजह से रणवीर सेना बनाई, उन कारणों को मिटाने के लिए कुछ नहीं किया गया। सरकारें अत्याचार देखती रही।"
ब्रह्मेश्वर की हत्या पर भी बवाल
ब्रह्मेश्वर मुखिया के जितने प्रशंसक थे, उतने ही आलोचक भी। यही वजह थी कि उसकी हत्या 1 जून 2012 में कर दी गई। मुखिया के शव को जब अंतिम संस्कार के लिए पटना लाया जा रहा था, तो उसके समर्थकों ने पटना की सड़कों पर खूब बवाल काटा। हिंसा हुई और पुलिस पर यह आरोप लगा कि उसने दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। लेकिन डीजीपी अभयानंद ने बल प्रयोग न करने के अपने निर्णय को सही ठहराया था।
नरसंहारों का उपसंहार
2005 के बाद से बिहार में नरसंहारों का क्रम रुक गया है, लेकिन उसकी यादें आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं। ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद बिहार में नरसंहारों का क्रम तो रुक गया, लेकिन पीड़ितों के दिलों में आज भी डर और असुरक्षा की भावना बनी हुई है।
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