Bihar Chunav: बिहार चुनाव से पहले वोटर लिस्ट पर बवाल, सुप्रीम कोर्ट के 1995 के आदेश की क्यों हो रही है चर्चा?

Bihar voter List revision 2025: बिहार में वोटर लिस्ट का जो स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) चल रहा है, वो अब एक विवादित मुद्दे -नागरिकता की जांच -से जुड़ गया है। जबकि चुनाव आयोग (ECI) अब तक इस तरह की जांच से दूरी बनाकर रखता आया है। आमतौर पर आयोग ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर दावे और आपत्तियों के जरिए काम करता है और गहराई से नागरिकता की जांच जैसे काम गृह मंत्रालय पर छोड़ता है।

इकोनॉमिक्स टाइम्स के मुताबिक ECI से जुड़े पुराने अफसरों का कहना है कि आयोग की ये सावधानी सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों की वजह से है। कोर्ट ने यह जरूर माना है कि सिर्फ भारतीय नागरिक ही वोट डाल सकते हैं, लेकिन साथ ही यह भी साफ किया है कि चुनाव आयोग को किन सीमाओं में रहकर काम करना चाहिए। यही वजह है कि ECI अब तक इस तरह के विवाद से दूर रहता आया है।

Bihar voter List revision

लाल बाबू हुसैन बनाम ERO केस, 1995: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

1995 में सुप्रीम कोर्ट ने लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) और अन्य मामले में एक ऐतिहासिक फैसला दिया था। यह फैसला कई याचिकाओं को एक साथ मिलाकर दिया गया, जिनमें मुंबई (तब बॉम्बे) और दिल्ली से संबंधित याचिकाएं शामिल थीं।

इन याचिकाओं में चुनाव आयोग (ECI) के दो अहम निर्देशों को चुनौती दी गई थी

  • 21 अगस्त 1992 का निर्देश: जिसमें सभी जिला कलेक्टरों को यह अधिकार दिया गया था कि वे पुलिस सत्यापन के जरिए यह तय कर सकें कि कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं।
  • 9 सितंबर 1994 का निर्देश: जिसमें ERO को यह अधिकार दिया गया था कि वे विदेशी नागरिकों की पहचान कर सकें और उनके नाम मतदाता सूची से हटा सकें।

इन निर्देशों के बाद ग्रेटर बॉम्बे में करीब 1.67 लाख लोगों को नोटिस भेजा गया और उनसे इनमें से कोई एक दस्तावेज पेश करने को कहा गया, जो थे, जन्म प्रमाण पत्र, भारतीय पासपोर्ट, नागरिकता प्रमाण पत्र और नागरिकता रजिस्टर में दर्ज प्रविष्टि की प्रति।

इन नोटिसों के खिलाफ ही सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें यह दलील दी गई कि पहले से वोट डाल चुके लोगों को दोबारा नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर करना असंवैधानिक है।

1995 में दिल्ली के पहाड़गंज इलाके में बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश और बिहार से आए गरीब लोग रहते थे। यहां कई लोगों के वोटर बनने के आवेदन इसलिए खारिज कर दिए गए क्योंकि उनके दस्तावेज चुनाव आयोग (ECI) के नियमों के मुताबिक नहीं थे।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या दिया था फैसला?

1995 में सुप्रीम कोर्ट ने ECI के ऐसे दो आदेशों को रद्द कर दिया था, जिनमें लोगों को अपनी नागरिकता साबित करनी होती थी। कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई पहले से वोटर लिस्ट में है, तो मतलब ये कि उसकी जांच पहले ही हो चुकी है। उसे दोबारा नागरिकता साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता रजिस्ट्रेशन अधिकारियों (ERO) की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे और कहा था कि नोटिस जारी करने से पहले पुरानी वोटर लिस्ट की जांच करनी चाहिए। व्यक्ति को अपनी बात रखने और सबूत देने का पूरा मौका मिलना चाहिए। जांच निष्पक्ष और कानून के दायरे में होनी चाहिए।

असम (2002) में कई लोगों को 'D' (Doubtful citizen) टैग के साथ अलग वोटर लिस्ट में डाल दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह गलत है। गोवा (2013) में एक व्यक्ति चुनाव लड़ने के बाद विदेशी निकला। इसके बाद ECI ने Form-6 में बदलाव किया, जिससे हर व्यक्ति को अपनी नागरिकता की शपथ देनी होती है।

असम वोटर लिस्ट विवाद: क्या है HRA चौधरी बनाम ECI केस

असम में अवैध प्रवास का मुद्दा लंबे समय से विवाद का कारण रहा है। 2002 में जब वहां 'गहन पुनरीक्षण' हुआ, तब फिर से यह विवाद सामने आया। HRA चौधरी बनाम चुनाव आयोग के केस का मामला असम के नागांव जिले से जुड़ा था, जहां कई मतदाताओं को ECI के 1997 के निर्देशों के बाद एक अलग मतदाता सूची में डाल दिया गया। उनके नाम के आगे 'D' (संदिग्ध नागरिकता) का चिन्ह लगा दिया गया था।

इन मतदाताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने अपने फैसले में एक तरफ ECI के अधिकारों को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही 1995 में दिए गए अपने पुराने दिशा-निर्देशों को दोहराया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाने से पहले उसे सुना जाना चाहिए और उचित मौका दिया जाना चाहिए। साथ ही, अगर किसी की नागरिकता संदिग्ध है, तो मामला संबंधित न्यायाधिकरण/प्राधिकरण को भेजा जाना चाहिए और उसी के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि ECI का उद्देश्य असली नागरिकों के साथ अन्याय करना नहीं, बल्कि विदेशी नागरिकों को वोटर लिस्ट में शामिल होने से रोकना है।

2013 में भी एक ऐसा केस आया था, जब गोवा में एक व्यक्ति ने विधानसभा चुनाव लड़ा। बाद में पता चला कि वह विदेशी नागरिक है। मामला कोर्ट में गया और गृह मंत्रालय को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके बाद ECI ने अपने Form 6 (मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए आवेदन) में बदलाव किया। अब हर व्यक्ति को यह स्वघोषणा करनी होती है कि वह भारतीय नागरिक है, और अगर उसने गलत जानकारी दी तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इन फैसलों के बाद चुनाव आयोग ने सतर्कता बढ़ाई और मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए कम दखल देने वाला तरीका अपनाया। अब ज्यादा भरोसा मतदाताओं पर किया जाने लगा। यह फैसला मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने में एक मील का पत्थर माना जाता है।

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