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Bihar First CM श्रीकृष्ण सिंह के बारे में कितना जानते हैं आप? जानिए आखिर क्यों कहा गया ‘बिहार केसरी’

Bihar First CM: बिहार, हमेशा से राजनीति का सेंटर ऑफ अट्रैक्शन रहा है। यहां की सियासत ने समय-समय पर देश की राजनीति की दिशा को प्रभावित किया है। और इस रंगीन राजनीतिक इतिहास में कुछ ऐसे नेता आए हैं, जिनका प्रभाव सिर्फ सत्ता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज और राज्य के विकास में अमिट छाप छोड़ गया। ऐसे ही एक अद्भुत व्यक्तित्व थे बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह (Sri Krishna Singh) जिन्हें जनता प्यार से 'श्री बाबू' और 'बिहार केसरी' के नाम से जानती थी।

श्रीकृष्ण सिंह का नाम राजनीति में इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने बिहार की सत्ता और प्रशासन को न सिर्फ मजबूत किया, बल्कि उसे जनता के विकास के लिए एक ठोस मंच भी बनाया। उनकी राजनीति की खासियत यह थी कि वे सत्ता के लिए राजनीति नहीं करते थे, बल्कि समाज सेवा और न्याय की भावना उनके हर निर्णय में झलकती थी।

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जब बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक है तो एक नजर बिहार के उस सशक्त राजनीतिक इतिहास पर डालते हैं और इसी कड़ी में आज हम आपको ले चलेंगे बिहार के पहले सीएम के राजनीतिक सफर पर....

मुंगेर से निकला लड़का कैसे बना 'बिहार केसरी'

श्रीकृष्ण सिंह का जन्म बिहार के मुंगेर जिले में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा और पढ़ाई पटना में पूरी की। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान, साल 1935 में वे पहली बार बिहार के प्रधानमंत्री बने। कम ही लोगों को पता होगा कि अंग्रेजी शासन में राज्यों में प्रधानमंत्री का पद होता था, और इस पद पर श्रीकृष्ण सिंह ने बिहार का नेतृत्व संभाला।

आजादी के बाद, 1946 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 200 से अधिक सीटें मिलीं, और अब मौका था बिहार के मुख्यमंत्री चुनने का। कांग्रेस के दो दिग्गज नेता आमने-सामने थे-श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह। जातिगत पृष्ठभूमि भी अलग थी: श्रीकृष्ण सिंह भूमिहार जाति से और अनुग्रह नारायण सिंह राजपूत। लेकिन सियासी लड़ाई में बाज़ी श्रीकृष्ण सिंह ने मारी।

दलितों के हक के लिए लड़ी लड़ाई

श्रीकृष्ण सिंह के जीवन से जुड़ा एक रोचक किस्सा है। साल था 1953 में जब देश में जाति के नाम पर भेद-भाव चरम पर था मंदिरों में नीची जाती के लोगों का प्रवेश बंद था। ऐसे में देवघर के प्रसिद्ध बाबा वैद्यनाथ धाम मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर विवाद जब खड़ा हुआ तब पूरे समाज में विरोध था।

यहाँ तक कि श्रीबाबू के परिवार और यहां तक की उनके पिता जी भी उन्हें रोकना चाहते थे। लेकिन श्री बाबू ने अपने सिद्धांत पर अडिग रहते हुए दलितों के साथ मंदिर में प्रवेश किया। इस ऐतिहासिक कदम ने बिहार के लिए एक नई सोच विकसित की और सभी सार्वजनिक मंदिरों में जाति आधारित प्रतिबंध को खत्म कर दिया।

इस आंदोलन का असर ऐसा रहा कि विनोबा भावे ने भी इसमें उनका समर्थन किया। पंडों और विरोधी समूहों के बीच भीड़-भाड़ के बावजूद श्रीकृष्ण सिंह ने सत्य और न्याय की जीत सुनिश्चित की। इस घटना ने उन्हें 'बिहार केसरी' का गौरवपूर्ण खिताब दिलाया।

इतना ही नहीं श्रीबाबू ने अपने कार्यकाल में कई सामाजिक सुधार लागू किए। बिहार से जमींदारी प्रथा को समाप्त करने के उनके प्रयासों ने उन्हें जनता में लोकप्रियता दिलाई। उनके प्रशासन में बिहार ने विकास की नई राह पकड़ी। उन्होंने उद्योगों और शिक्षा संस्थानों की स्थापना कर राज्य को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए।

आधुनिक बिहार के निर्माता रहे श्रीकृषण सिंह

श्री बाबू ने अपने शासनकाल में बिहार में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं की नींव रखी। हटिया में भारी उद्योग निगम की स्थापना, दामोदर नदी घाटी की बहुद्देशीय सिंचाई और विद्युत परियोजना, बोकारो में पहला स्टील प्लांट, बरौनी डेयरी, और गढ़हरा में एशिया का सबसे बड़ा रेलवे यार्ड-ये सभी उनके दूरदर्शी नेतृत्व के उदाहरण हैं।

उन्होंने भागलपुर के सबौर, समस्तीपुर के पूसा और रांची में कृषि कॉलेज स्थापित किए। नेशनल और स्टेट हाईवे का निर्माण, पलामू जिले में गरीब मेधावी छात्रों के लिए आवासीय विद्यालय की स्थापना-सभी काम उनके दूरदर्शी प्रशासन का परिणाम थे।

गांधीजी की मर्जी के उलट बने प्रधानमंत्री

1937 में अंग्रेजों ने बिहार में पहली विधानसभा चुनाव करवाई। कांग्रेस को बहुमत मिला, लेकिन अंग्रेजों ने मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी के मोहम्मद यूनुस को बिहार का प्रीमियर नियुक्त कर दिया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया और अंततः यूनुस को इस्तीफा देना पड़ा।

महात्मा गांधी चाहते थे कि अनुग्रह नारायण सिंह विधायक दल के नेता बने। लेकिन कांग्रेस नेताओं और विधायकों ने श्रीकृष्ण सिंह का पक्ष लिया। अंततः गांधीजी की मर्जी के उलट श्रीकृष्ण सिंह विधायक दल के नेता चुने गए और बिहार के प्रधानमंत्री बने।

श्रीकृष्ण सिंह की विरासत

श्रीकृष्ण सिंह का देहांत 1961 में हुआ, लेकिन उनके द्वारा किए गए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सुधार आज भी बिहार के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनका नेतृत्व, साहस और समाज सुधार की प्रतिबद्धता उन्हें आज भी 'बिहार केसरी' के रूप में जीवित रखती है। आज पूरा बिहार उनके योगदान को याद कर रहा है, और उनके आदर्श राज्य और समाज के लिए मार्गदर्शन बने हुए हैं।

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