बिहार में पहली बार भाजपा का CM! वो 5 वजहें जिसने सम्राट चौधरी को बनाया 'सुल्तान', कैसे जीता BJP-RSS का भरोसा

Bihar New CM Samrat Choudhary Analysis: भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी स्थापना के बाद पहली बार बिहार की सत्ता की कमान सीधे अपने हाथ में ली है। सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर इतिहास रच दिया है। सवाल यही है कि आखिर बीजेपी ने इतना बड़ा फैसला क्यों लिया और क्यों सम्राट चौधरी ही इस पद के लिए सबसे उपयुक्त माने गए।

शपथ ग्रहण समारोह में नीतीश कुमार की मौजूदगी और जेडीयू कोटे से बिजेंद्र यादव और विजय चौधरी का डिप्टी सीएम बनना इस बात का संकेत है कि यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संतुलन भी है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कई परतें हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। तो आइए समझते हैं वो 5 बड़े कारण, जिसकी वजह से भाजपा ने सम्राट चौधरी पर दांव लगाया और क्यों वे आज बिहार के निर्विवाद 'सम्राट' बन गए हैं।

Samrat Choudhary taking oath as Bihar CM with Nitish Kumar

1. जब भाजपा 'अकेली' पड़ी, तब सम्राट ने संभाला मोर्चा

साल 2022 में जब नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़कर महागठबंधन का दामन थामा था, तब बिहार भाजपा एक गहरे संकट में थी। उस वक्त पार्टी को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो नीतीश और लालू की जोड़ी से सीधे आंख मिला सके। सम्राट चौधरी ने न केवल लालू यादव के पुराने भ्रष्टाचार के मामलों पर हमला बोला, बल्कि नीतीश कुमार की 'सुशासन बाबू' वाली छवि को भी आक्रामकता से चुनौती दी।

इससे पहले भाजपा के नेता नीतीश के खिलाफ इतना कड़ा रुख अपनाने से बचते थे। सम्राट ने न केवल पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया, बल्कि एक 'मुरैठा' (पगड़ी) बांधकर संकल्प लिया कि जब तक नीतीश को सत्ता से नहीं हटाएंगे, इसे नहीं खोलेंगे। 28 जनवरी को जब सरकार बदली, तो उनका संकल्प पूरा हुआ और 3 जुलाई 2024 को उन्होंने अयोध्या की सरयू नदी में डुबकी लगाकर अपना मुरैठा भगवान राम के चरणों में समर्पित किया। उनकी इसी 'जिद्द' और 'कमिटमेंट' ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को प्रभावित किया।

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2. नीतीश के 'लव-कुश' किले में सेंधमारी

बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा गणित 'लव-कुश' समीकरण (कुर्मी-कोइरी) रहा है। यह नीतीश कुमार का सबसे मजबूत पावर हाउस माना जाता था। भाजपा ने सम्राट चौधरी, जो कि कोइरी (कुशवाहा) समाज से आते हैं, उन्हें आगे करके इस अभेद्य किले को भीतर से खोल दिया।

दिलचस्प बात यह है कि नीतीश कुमार ने भी सम्राट को अपना उत्तराधिकारी मानकर एक बड़ा सियासी दांव खेला। उन्होंने अपने वोटर्स को यह संदेश दिया कि सत्ता किसी 'बाहरी' या 'परिवार' (लालू परिवार) को देने के बजाय अपनी ही बिरादरी (लव-कुश) के हाथ में सौंपी है। अब तक बिहार में 'कुर्मी' मुख्यमंत्री और 'कुशवाहा' डिप्टी सीएम का चलन था, लेकिन सम्राट के सीएम बनने से यह समीकरण उलट गया है। अब कुशवाहा समाज का नेतृत्व शीर्ष पर है, जिससे नीतीश का कोर वोट बैंक एनडीए के साथ पूरी तरह सुरक्षित हो गया है।

Samrat Choudhary taking oath as Bihar CM with Nitish Kumar
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3. कुशवाहा वोट बैंक पर फोकस

बिहार में जातीय गणना के बाद यह साफ हो गया कि यादवों (14.26%) के बाद कुशवाहा समाज (4.2%) की संख्या काफी निर्णायक है। बिहार की लगभग 40 से 45 विधानसभा सीटों पर यह समाज हार-जीत तय करता है। 2025 के चुनावों में यह देखा गया कि कोइरी-कुर्मी समाज का 71% वोट एनडीए के पाले में गया।

सम्राट चौधरी को कमान देने का असर जमीन पर दिखने लगा है। मगध क्षेत्र की 47 सीटों में से एनडीए जो 2020 में सिर्फ 18 सीटें जीता था, वह 2025 में बढ़कर 40 तक पहुंच गई। शाहाबाद क्षेत्र, जहाँ 2020 में एनडीए मात्र 2 सीटें जीत पाया था, वहां 2025 में यह आंकड़ा 19 सीटों तक पहुंच गया। मगध और शाहाबाद में मिली यह बंपर बढ़त सम्राट चौधरी की सोशल इंजीनियरिंग का ही नतीजा है।

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4. बिहार से यूपी चुनाव का पिच तैयार करना

सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना सिर्फ बिहार तक सीमित फैसला नहीं है। इसके पीछे उत्तर प्रदेश की राजनीति का भी बड़ा गणित छिपा है। उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। यूपी में अखिलेश यादव ने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देकर गैर-यादव ओबीसी को अपने साथ जोड़ने की मुहिम शुरू की है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के 7 कुर्मी सांसद जीते, जबकि भाजपा के मात्र 3।

यूपी विधानसभा में यादवों से ज्यादा कुर्मी विधायकों (41) की संख्या है। भाजपा ने बिहार में एक कुशवाहा (कोइरी) चेहरे को मुख्यमंत्री बनाकर यूपी के मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज को एक बड़ा संदेश दिया है। अखिलेश यादव के 'गैर-यादव ओबीसी' कार्ड को बेअसर करने के लिए सम्राट चौधरी को एक 'पोस्टर बॉय' के रूप में पेश किया गया है, जिसका असर आने वाले यूपी चुनावों में निश्चित रूप से दिखेगा।

Samrat Choudhary taking oath as Bihar CM with Nitish Kumar

5. मोदी-शाह के भरोसेमंद 'ऑलराउंडर'

सम्राट चौधरी के पास सरकार और संगठन, दोनों को चलाने का लंबा अनुभव है। वे राबड़ी देवी से लेकर नीतीश कुमार तक की सरकारों में मंत्री रहे हैं। उन्होंने कृषि, पंचायती राज, वित्त और गृह जैसे महत्वपूर्ण विभागों को संभाला है। संगठन में भी वे सचिव से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक की सीढ़ियां चढ़ चुके हैं।

सबसे अहम बात यह है कि वे अमित शाह के 'टास्क मास्टर' हैं। बिहार भाजपा को 'नीतीश का पिछलग्गू' होने के टैग से बाहर निकालना सबसे कठिन काम था, जिसे नित्यानंद राय और संजय जायसवाल जैसे नेता पूरी तरह नहीं कर पाए। सम्राट ने न केवल संगठन को आक्रामक बनाया, बल्कि नीतीश के साथ गठबंधन में रहते हुए भी अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई। उनकी कार्यक्षमता का ही नतीजा है कि साल 2005 के बाद नीतीश कुमार ने पहली बार किसी नेता के लिए 'गृह विभाग' जैसा बड़ा पोर्टफोलियो छोड़ दिया।

RSS के भीतर चली खींचतान, फिर सम्राट के नाम पर कैसे बनी सहमति?

बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के चयन को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के भीतर भी गहन मंथन हुआ। सूत्रों के मुताबिक संघ की शुरुआती सोच यह थी कि राज्य में पार्टी का पहला सीएम किसी ऐसे चेहरे को बनाया जाए, जो संगठन का पुराना स्वयंसेवक हो और सामाजिक रूप से अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) का प्रतिनिधित्व करता हो। इसी रणनीति के तहत दीघा विधायक संजीव चौरसिया का नाम भी गंभीरता से चर्चा में आया और उनकी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ अहम बैठकें भी हुईं।

हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। संघ के भीतर ही एक प्रभावशाली धड़े ने इस प्रस्ताव से अलग रुख अपनाया और सम्राट चौधरी के नाम पर जोर देना शुरू किया। यह धड़ा मानता था कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में एक ऐसा चेहरा जरूरी है, जो आक्रामक भी हो, संगठन को संभालने की क्षमता भी रखता हो और बड़े सामाजिक समीकरणों को साध सके।

सूत्र बताते हैं कि सम्राट चौधरी को लेकर संघ के भीतर दो अलग-अलग रिपोर्ट तैयार की गई थीं, जिनमें उनके राजनीतिक प्रभाव, संगठनात्मक पकड़ और नेतृत्व क्षमता का विस्तृत आकलन किया गया। इसी दौरान बीजेपी के संगठन प्रभारी भीखू भाई दलसानिया ने भी एक अलग रिपोर्ट तैयार की, जिसमें उन्होंने सम्राट चौधरी को बिहार की कमान सौंपने की सिफारिश की।

आखिरकार संघ और पार्टी नेतृत्व के बीच कई दौर की चर्चाओं के बाद सम्राट चौधरी के नाम पर सहमति बन गई। यह फैसला बताता है कि बीजेपी और संघ दोनों ने मिलकर एक ऐसा चेहरा चुना, जो न सिर्फ राजनीतिक रूप से मजबूत हो, बल्कि आने वाले चुनावी समीकरणों में भी फिट बैठता हो।

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सम्राट चौधरी 'सरप्राइज' नहीं, सोची-समझी रणनीति

बीजेपी को अक्सर सरप्राइज फैसलों के लिए जाना जाता है, लेकिन सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। यह एक लंबी रणनीति का हिस्सा है। सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार भाजपा के लिए एक नए युग का आगाज है। उन्होंने अपनी मेहनत और रणनीतिक कौशल से खुद को साबित किया है। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती 2025 के बाद बिहार को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाने और एनडीए के कुनबे को एकजुट रखने की होगी। क्या सम्राट बिहार के विकास के भी 'सम्राट' बन पाएंगे? यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल भाजपा के इस मास्टरस्ट्रोक ने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया है।

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