बिहार चुनाव से पहले नीतीश की 'सोशल इंजीनियरिंग': जाति, वोट बैंक, चिराग-मांझी की नाराजगी, हर मामला कर दिया सेट!
Bihar Chunav 2025 (Nitish Kumar) : अगर आप भी ये सोच रहे हैं कि बढ़ती उम्र की वजह से बिहार की राजनीति से नीतीश कुमार का "वर्चस्व" कम होने वाला है, तो हो सकता है आपका आकलन गलत हो...। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का चाणक्य रूप फिर एक बार सामने आया है। एनडीए गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर बढ़ती हलचल और सहयोगी दलों की नाराजगी के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अलग-अलग अयोग के पुनर्गठन का काम फिर से शुरू कर दिया है। उच्च जाति आयोग, अनुसूचित आयोग से लेकर मछुआरा आयोग का पुनर्गठन किया गया है।
इन आयोगों में एक के बाद एक कई नियुक्तियों की गई हैं और उसमें नेताओं के रिश्तेदारों को जगह दी गई है। इन नियुक्तियों के जरिए नीतीश कुमार ने एक साथ कई रणनीतिक लक्ष्य साधने की कोशिश की है। ये नियुक्तियां केवल 'पद भरने' की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि सोच-समझकर तैयार की गई सामाजिक और राजनीतिक इंजीनियरिंग का हिस्सा हैं, जो आने वाले विधानसभा चुनाव में गठबंधन की स्थिरता बनाए रखने के लिहाज से बहुत अहम है।

चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की नाराजगी पर ब्रेक लगाने की कोशिश!
एनडीए में दो सहयोगी दल ऐसे हैं जो अक्सर सीटों की संख्या और राजनीतिक सम्मान को लेकर असहजता जाहिर करते रहे हैं -लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा। चिराग पासवान ने जहां बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर की है, वहीं जीतन राम मांझी समय-समय पर सीटों को लेकर दबाव बनाते रहे हैं।
इन दोनों नेताओं को ठंडा करने के लिए नीतीश कुमार ने एक चतुर दांव खेला -रामविलास पासवान के दामाद और चिराग पासवान के जीजा मृणाल पासवान को राज्य अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। इससे दो संकेत जाते हैं -एक, चिराग के परिवार को सत्ता-साझेदारी का हिस्सा बनाया गया, जिससे उन्हें सुकून मिला। दूसरा, मृणाल विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते थे, अब इस पर विराम लग गया है...क्योंकि आयोग का पद संवैधानिक है। मृणाल अपने बेटे के लिए भी LJPR का टिकट अलौली से चाहते हैं...अब ये होगा या नहीं, आगे पता चलेगा।
इसी तरह, जीतन राम मांझी के दामाद देवेंद्र कुमार मांझी को अनुसूचित जाति आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया। इससे मांझी को 'सम्मान' भी मिला और उनका दबाव भी नियंत्रित करने की कोशिश की गई। देवेंद्र मांझी तब चर्चा में आए थे जब उन्हें जीतन राम मांझी ने अपना पीए बनाया था। हालांकि विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।

हर जातीय वर्ग को 'पैकेज' का हिस्सा बनाया गया
नीतीश कुमार की यह नियुक्ति नीति केवल सहयोगियों को साधने तक सीमित नहीं रही। आयोगों में दलित, महादलित, मल्लाह समुदाय और अनुसूचित जातियों के लोगों को शामिल कर सामाजिक संतुलन भी साधा गया है:
महादलित आयोग में कटिहार के मनोज कुमार को अध्यक्ष बनाया गया है। मछुआरा आयोग में ललन कुमार को अध्यक्ष और अजीत चौधरी को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। इससे यह साफ होता है कि नीतीश कुमार सिर्फ अपने सहयोगियों को संतुष्ट करने में नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरण को भी मजबूत करने में लगे हैं, ताकि मतदाता को यह संदेश दिया जा सके कि हर वर्ग को सत्ता में भागीदारी मिल रही है।
सीट शेयरिंग से पहले का 'साइलेंट गेम'
NDA में सीट बंटवारे को लेकर पर्दे के पीछे खींचतान जारी है। चिराग पासवान की आक्रामकता और मांझी की मांगें एनडीए के भीतर खलबली मचा सकती थीं। लेकिन आयोगों के जरिए से किए गए ये तात्कालिक 'सम्मानजनक समझौते' सीटों को लेकर होने वाली सियासी खींचतान पर ब्रेक लगाने का काम कर सकती है।
चिराग के बहनोई को बड़ी जिम्मेदारी देकर उन्हें भी NDA के 'अनुकूल' बनाए रखा गया। अब यह संभव है कि चिराग पासवान और उनकी पार्टी लोजपा (रामविलास) की अंदरूनी राजनीति इन नियुक्तियों से संतुलित रहेगी, भले ही वह चुनावी रणनीति बनाते रहें।
नीतीश कुमार की यह रणनीति दिखाती है कि कैसे राजनीति में केवल नीतियां नहीं, पद और प्रतिष्ठान भी बड़े चुनावी हथियार होते हैं। आयोगों की नियुक्तियां महज प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दांव हैं। एनडीए में अंदरूनी संतुलन साधने के लिए नीतीश कुमार ने जो कदम उठाया है वह आगामी चुनाव की सियासी जमीन भी तैयार कर रहा है। अगर यह रणनीति सफल रहती है, तो नीतीश कुमार न केवल NDA के भीतर विवादों को नियंत्रित करने में सफल होंगे, बल्कि सामाजिक गठजोड़ के सहारे चुनावी नैया पार करने की ओर भी बढ़ सकते हैं।

नीतीश का ये दांव RJD कांग्रेस के वोट बैंक को कैसे नुकसान पहुंचा सकता है?
नीतीश कुमार का 'आयोग कार्ड' RJD और कांग्रेस के पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक को भी चुनौती दे सकते हैं। RJD और कांग्रेस का मुख्य वोट बैंक यादव और मुस्लिम समुदाय रहा है। हर जाति के लिए अलग से आयोग बनाकर नीतीश ने र RJD के "एक तरफा" जातीय आधार को कमजोर करने की कोशिश की है।
नीतीश पहले से ही महादलित, मल्लाह, निषाद, कुर्मी, और अति पिछड़ा वर्ग को साथ लेकर चलने की कोशिश करते रहे हैं। अब आयोगों में उन्हें शामिल करके ये संदेश देने की कोशिश की है कि RJD सिर्फ यादवों की पार्टी है, लेकिन JDU सबकी बात करता है। इससे गैर-यादव OBC, दलित और अति पिछड़ा वर्ग RJD से दूर हो सकता है।
RJD का वोट बैंक यादव भले हो, लेकिन अब नीतीश की कोशिश है कि यादव समाज के अंदर के गरीब, पिछड़े, गैर-राजनीतिक वर्गों को ये महसूस कराया जाए कि लालू-तेजस्वी ने सिर्फ खास यादवों को ही आगे बढ़ाया। इस नैरेटिल से यादव वोटों में भी दरार पड़ सकती है।
नीतीश कुमार सीधे मुस्लिम आयोग नहीं बना रहे, लेकिन सामाजिक प्रतिनिधित्व की इस रणनीति से मुस्लिमों को यह संदेश देने की कोशिश है कि हम सबको भागीदारी देते हैं, कांग्रेस या RJD की तरह सिर्फ एक खास वर्ग पर निर्भर नहीं हैं।
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