Bihar Chunav: उपेंद्र कुशवाहा NDA में हैं या नहीं? क्या है उनका स्टैंड, अगर गठबंधन से हटे तो किसको होगा नुकसान
Bihar Chunav 2025 (Upendra Kushwaha): बिहार की राजनीति एक बार फिर गर्म है और इस बार केंद्र में हैं राष्ट्रीय लोक जनता दल (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा। भले ही वे एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के हिस्से के तौर पर सक्रिय दिखाई देते रहे हों, लेकिन हालिया घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि गठबंधन में उन्हें वैसी अहमियत नहीं मिल रही, जैसी वे अपेक्षा कर रहे हैं।
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले RLM के भीतर बढ़ती बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। पार्टी अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की उपेक्षा को लेकर समर्थकों में नाराजगी है। दरअसल 30 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काराकाट लोकसभा क्षेत्र के बिक्रमगंज में एक चुनावी रैली की थी, जो खुद उपेंद्र कुशवाहा की सीट रही है। लेकिन अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कुशवाहा का नाम तक नहीं लिया। जिससे RLM के कार्यकर्ताओं में मायूसी है।

PM मोदी के भाषण में उपेंद्र कुशवाहा का नाम नहीं लिया जाना बना सियासी चर्चा का विषय
मंच पर पीएम मोदी के साथ राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह, चिराग पासवान, केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी, गिरिराज सिंह, नित्यानंद राय, रज भूषण चौधरी, डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा, राज्य सरकार के मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव, प्रेम कुमार , सांसद संजय जायसवाल के साथ उपेंद्र कुशवाहा भी मंच पर बैठे हुए थे।
पीएम मोदी ने बिक्रमगंज में एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया, जहां उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत जनता का अभिवादन कर की और फिर राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और दोनों उपमुख्यमंत्रियों का नाम लेकर मंच पर मौजूद नेताओं का स्वागत किया। इसके बाद उन्होंने "अन्य मंत्री और जनप्रतिनिधिगण" कहकर आगे का संबोधन जारी रखा।
इस सरकारी कार्यक्रम की प्रकृति को देखते हुए माना जा रहा है कि पीएम ने औपचारिक प्रोटोकॉल के तहत सीमित नामों का ही जिक्र किया। हालांकि, इस दौरान मंच पर मौजूद उपेंद्र कुशवाहा का नाम न लेना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।

बोर्ड-आयोग में भी उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को जगह नहीं, नाराजगी बढ़ी
अब तक बिहार में गठित बोर्ड और आयोगों में RLM को कोई स्थान नहीं मिला है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने बीते कुछ दिनों में कई बोर्ड और आयोगों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां की हैं, लेकिन इनमें RLM को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
जबकि BJP, JDU, LJPR (चिराग पासवान की पार्टी) और HAM (जीतनराम मांझी की पार्टी) को हिस्सेदारी दी जा चुकी है। इससे RLM समर्थकों में निराशा है, और खुद कुशवाहा का मूड भी खिन्न बताया जा रहा है। इन आयोग में चिराग पासवान के बहनोई और जीतनराम मांझी के दामाद को प्रमुख पद मिल चुके हैं।
कुशवाहा की खुली चेतावनी: 'हम डूबे तो आप भी डूबेंगे'
रोहतास जिले के बिक्रमगंज में एक चुनावी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हाल ही में उपेंद्र कुशवाहा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "कुछ लोग यह गलतफहमी में हैं कि उपेंद्र कुशवाहा को डुबा देंगे और खुद उग जाएंगे... ऐसा नहीं होगा। जब एक ही नाव में सवार हैं, तो अगर नाव डूबेगी, तो सब डूबेंगे।"
कुशवाहा ने लोकसभा चुनाव 2024 की ओर इशारा करते हुए कहा कि अगर आगामी विधानसभा चुनाव 2025 में भी वोटों का बंटवारा इसी तरह हुआ, तो NDA को नुकसान उठाना पड़ेगा।
यह बयान केवल नाराजगी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चेतावनी है -अगर RLM को सम्मानजनक भागीदारी नहीं दी गई, तो वे गठबंधन में बने रहने का अपने फैसले पर फिर से विचार कर सकते हैं।
उपेंद्र कुशवाहा NDA में हैं या नहीं?
तकनीकी रूप से RLM अभी भी NDA का हिस्सा है, लेकिन जिस तरह से उन्हें राजनीतिक और प्रशासनिक हिस्सेदारी से दूर रखा गया है, वह गठबंधन की आंतरिक कलह को उजागर करता है। इन घटनाओं के बाद यह साफ है कि उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी को एनडीए में वह मान्यता नहीं मिल रही, जिसकी वे अपेक्षा कर रहे थे। इससे बिहार की सियासत में नए समीकरण बनने की संभावनाएं भी तेज हो गई हैं। कुशवाहा के हालिया बयानों से यह साफ है कि अगर बिहार की राजनीति में उनको नजरअंदाज किया गया, तो वे "तीसरे विकल्प" की ओर भी बढ़ सकते हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है एनडीए के अंदर रालोमो की स्थिति को लेकर असमंजस बरकरार है, खासकर तब जब आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं।

बिहार चुनाव 2025: उपेंद्र कुशवाहा NDA से अलग हुए तो किसको होगा नुकसान?
🔴 बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में अगर RLM के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में NDA से अलग राह चुनते हैं, तो इसका सीधा असर JDU के कोर वोटबैंक पर पड़ सकता है।
🔴 बिहार में कुशवाहा (कोइरी) समुदाय की जनसंख्या लगभग 4-5% मानी जाती है। कुशवाहा दावा करते हैं कि ये बिहार के 70 से ज्यादा विधानसभा सीटों और 15 लोकसभा सीटों के चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। यह समुदाय पूर्वी बिहार, मगध और दक्षिण-मध्य बिहार के कई जिलों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
🔴 नीतीश कुमार की जेडीयू परंपरागत रूप से कोइरी+कुर्मी (जिसे 'लव-कुश' समीकरण कहा जाता है) की राजनीति करती रही है। नीतीश खुद कुर्मी समुदाय से आते हैं। कुशवाहा अगर NDA में रहते हैं, तो यह समीकरण मजबूत होता है। लेकिन अगर उपेंद्र कुशवाहा अलग हो जाते हैं या तीसरा मोर्चा बनाते हैं, तो लव-कुश गठबंधन टूट सकता है और इससे JDU की पकड़ कमजोर हो सकती है।
🔴 2020 के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा ने अलग होकर चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें अधिक सीटें नहीं मिलीं हालांकि, कुछ सीटों पर JDU के उम्मीदवारों को नुकसान हुआ, जहां कुशवाहा वोट निर्णायक थे।
🔴 अगर उपेंद्र कुशवाहा 2025 में अलग होकर चुनाव लड़ते हैं या महागठबंधन से जुड़ते हैं, तो, कई सीटों पर NDA को 2-5% वोट कटने का खतरा हो सकता है, जो हार-जीत तय करने के लिए काफी है। JDU की 20-25 सीटें सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती हैं, खासकर जहां कोइरी वोटर ज्यादा हैं।
🔴 अकेले लड़ना उनके लिए मुश्किल रहेगा, लेकिन कुशवाहा+महागठबंधन या तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनने पर वह बड़ी भूमिका में आ सकते हैं। नाराजगी, उपेक्षा और सीट बंटवारे में हिस्सेदारी न मिलना RLM को NDA से अलग करने की संभावित वजह बन सकती है।
अगर उपेंद्र कुशवाहा NDA से अलग होते हैं, तो यह नीतीश कुमार की JDU के लिए एक संकट का संकेत होगा। कुशवाहा जाति का वोट प्रतिशत बिहार की राजनीति में अहम है, और गठबंधन में यह वोटबैंक निर्णायक हो सकता है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले यह देखना दिलचस्प होगा कि उपेंद्र कुशवाहा NDA के साथ बने रहते हैं या नई सियासी राह चुनते हैं। अभी के हालात को देखते हुए कहा जा सकता है कि वे गठबंधन में हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं हैं। अगर उनकी पार्टी को नजरअंदाज किया जाता रहा, तो RLM एक अलग स्टैंड ले सकती है। ऐसे में कुशवाहा की हर राजनीतिक चाल पर अब सबकी नजर होगी।












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