कैसे सम्राट चौधरी की अगुवाई में बदल रही है बिहार बीजेपी? आसान नहीं है महागठबंधन का रास्ता
बिहार में सम्राट चौधरी के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से पार्टी काफी बदली हुई नजर आ रही है। चौधरी बहुत कम समय में अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए जोर लगाते हुए नजर आ रहे हैं।

बिहार में भारतीय जनता पार्टी ने जब से सम्राट चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, इसकी चाल, चेहरा और चरित्र सबमें काफी बदलाव नजर आने लगी है। बिहार में चुनाव लड़ने के लिए सबसे जरूरी है, जातीय समीकरण को साधना। सम्राट चौधरी के आने के बाद से यह काम जोरदार तरीके से शुरू है।

कुशवाहा समाज से पहले बीजेपी अध्यक्ष
सम्राट चौधरी कुशवाहा समाज या कोइरी जाति के पहले नेता हैं, जो बीजेपी के अध्यक्ष बने हैं। बिहार में यादवों के बाद ओबीसी में सबसे बड़ी आबादी इसी समाज की है। कुशवाहा समाज उस लव-कुश वोट बैंक में बड़े भाई की भूमिका में रहा है, जिसकी फसल अबतक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार काटते रहे हैं।
करीब 10% है कुर्मी-कोइरी की जनसंख्या
नीतीश कुमार कुर्मी जाति से हैं और बिहार में कुर्मी-कोइरी की करीब 10% आबादी में 6% से अधिक कुशवाहा समाज की बताई जाती है। चर्चा है कि बीजेपी सम्राट चौधरी को 2025 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री उम्मीदवार प्रोजेक्ट कर सकती है।

ओबीसी वोट बैंक में विस्तार पर है भाजपा की नजर
इसके पीछे की रणनीति यह है कि जेडीयू के कोर वोट बैंक यानि कुर्मी-कोइरी और अति-पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के 15% में सेंध लगाना। यही नहीं चौधरी के नाम पर पार्टी राजद के MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण के 30% वोट बैंक को भी हिलाना चाहती है।
17 वर्षों तक बिहार भाजपा में छाए रहे सुशील मोदी
बिहार भाजपा पर करीब 17 वर्षों तक राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी का दबदबा रहा। सीएम नीतीश कुमार के साथ उनका तालमेल ऐसा रहा है कि कई बार भाजपा और जदयू के नेता भी चक्कर खा जाते हैं। उनसे पहले कैलाशपति मिश्र का प्रदेश संगठन पर प्रभाव था। लेकिन, फिर पार्टी का कोई सशक्त नेतृत्व उभर ही नहीं पाया।

नीतीश और सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा लेते हैं चौधरी
सम्राट चौधरी के आने के बाद से बीजेपी बिहार में लीडरशिप संकट से काफी हद तक उबरती हुई नजर आ रही है। वह जिस तरह से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी सरकार के खिलाफ हार्ड लाइन लेते हैं, भाजपा के पुराने वाले नेतृत्व में उसका काफी अभाव रहा है। यही नहीं पार्टी में पहले आंतरिक गुटबाजी भी काफी हावी हो गई थी।
भाजपा में दूसरे दलो के नेताओं की आवक बढ़ी
सम्राट चौधरी बिहार विधान परिषद के सदस्य और पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी के बेटे हैं। 2017 में भाजपा में शामिल होने से पहले राजद और जदयू में भी रह चुके हैं। मार्च में उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से जदयू के दो प्रवक्ता अजय आलोक और सुहेली मेहता बीजेपी में आ चुके हैं।

खुद को जमीनी नेता साबित कर रहे हैं सम्राट चौधरी
यही नहीं, जिला स्तर पर सत्ताधारी महागठबंधन के भी 100 से ज्यादा नेताओं की बीजेपी में ज्वाइनिंग हो चुकी है। नीतीश के पूर्व सहयोगी और राष्ट्रीय लोक जनता दल के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की भी जल्दी शामिल होने की चर्चा है। सम्राट चौधरी ने कमान संभालते ही खुद को जमीनी नेता के रूप में स्थापित करके दिखाया है।
Recommended Video

उन्हें सासाराम और बिहारशरीफ के दंगा-प्रभावित इलाकों में जाने और जहरीली शराब पीने से मारे गए लोगों के परिजनों के बीच पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा। वह बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं को हर क्षण सक्रिय बनाए रखते हैं। सरकार की नाकामियों को सोशल मीडिया पर उजागर करवाने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

बीजेपी के जुझारू नेता के तौर पर बन रही है छवि
जेल नियम बदलकर गोपालगंज के पूर्व डीएम के हत्या के दोषी आनंद मोहन को समय से पहले रिहा किया गया तो चौधरी ने पार्टी के कई दूसरे नेताओं से अलग लाइन लेकर विरोध करने में जरा भी देरी नहीं दिखाई। लगता है कि जैसे प्रदेश भाजपा को जिस जुझारू नेतृत्व की दशकों से तलाश थी, उसे सम्राट पूरा कर देना चाहते हैं।

सीएम की कुर्सी और कुशवाहा समाज
कुल मिलाकर भाजपा ने चौधरी को जो ओबीसी वोट बैंक को साधने का टास्क दिया है, उसके लिए वह अपने काम में पूरी तरह से तल्लीन हो चुके हैं। भाजपा की नई सोशल इंजीनियरिंग के पीछे तथ्य ये है कि राज्य में ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कुर्मी, यादव, दलित, कायस्थ और मुसलमान को भी मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला है। लेकिन, कुशवाहा समाज को उस कुर्सी का स्वाद नहीं मिल पाया है। अपवाद के तौर पर सतीश प्रसाद सिंह का नाम जरूर लिया जाता है, जो 1968 में मात्र पांच दिन के लिए इस पद पर रहे थे।
भाजपा ने की लव और कुश दोनों को साधने की कोशिश
भाजपा के सामने पहली चुनौती 2024 के चुनाव में राज्य की 40 लोकसभा सीटों पर महागठबंधन का सामना करना है। इसके लिए पार्टी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और जदयू के अध्यक्ष रहे आरसीपी सिंह को भी पार्टी में शामिल कराकर सत्ताधारी गठबंधन को तगड़ा झटका दिया है।
आरसीपी न सिर्फ नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा के रहने वाले हैं, बल्कि उन्हीं की कुर्मी जाति से भी हैं। इलाके में उनकी छवि ईमानदार अफसरशाह की रही है और उनके पास पार्टी संगठन चलाने का बढ़िया अनुभव भी है। इस तरह से बीजेपी ने नीतीश के लव-कुश वोट बैंक में पूरी तरह से घुसपैठ करने की कोशिश की है।












Click it and Unblock the Notifications