Bharat Jodo Yatra से बिहार में कांग्रेस को कितना होगा फ़ायदा, प्रदेश में कैसा था पार्टी का इतिहास ?
Bharat Jodo Yatra: कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा का विस्तार करते हुए अब बिहार में भी यात्रा की शुरुआत होने वाली है। आइए आपको बताते हैं कि बिहार में कांग्रेस का इतिहास कैसा रहा है ? 1912 में बिहार राज्य अस्तित्व में आया..
Bharat Jodo Yatra: कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा बिहार में भी शुरू होने वाली है। इस बाबत कांग्रेस के दिग्गज नेता रुपरेखा तैयार करने में जुट गए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश और दिग्विजय सिंह ने बिहार में भारत जोड़ो यात्रा की बात कही है। 28 दिसंबर से मंदार पर्वत (बांका, बिहार) भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत की जाएगी, करबी 1 हज़ार 200 किलोमीटर के सफर के बाद बोधगया में यात्रा ख़त्म होगी। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिए कांग्रेस पार्टी आम लोगों से सीधे जुड़ पाएगी। जनता के ज़मीनी स्तर की परेशानियों से वाकिफ होकर उनका हल निकालने की कोशिश की जाएगी। इसके ज़रिए सियासी फिज़ा में बदलाव होगा और कांग्रेस की सत्ता में वापसी होगी।

गांधी जी को मिली महात्मा की संज्ञा
कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा का विस्तार करते हुए अब बिहार में भी यात्रा की शुरुआत होने वाली है। आइए आपको बताते हैं कि बिहार में कांग्रेस का इतिहास कैसा रहा है ? 1912 में बिहार राज्य अस्तित्व में आया था, जबकि प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन 1908 में ही हो चुका था। 1912 में बांकीपुर (पटना का पुराना नाम) में कांग्रेस की प्रदेश में इंट्री हुई। बांकीपुर कांग्रेस में 1912 में जवाहरलाल नेहरू बतौर डेलिगेट शामिल हुए, उस वक्त उनकी उम्र 22 साल थी। इसके ठीक पांच साल बाद 1917 में गांधी जी चंपारण आए और नए तरीक़े से किसानों के आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन से गांधी जी को महात्मा की संज्ञा दी जाने लगी। महात्मा गांधी ने किसानों के लिए किए गए राष्ट्रीय आंदोलन को ज़मीन से जोड़ा और गांव के लोगों समेत निम्नवर्गीय समुदायों को भी आंदोलन का हिस्सा बनाया।

बिहार में नहीं था कांग्रेस का कोई अस्तित्व
बिहार में उस वक्त कांग्रेस का नामो निशान तक नहीं था और ना ही कोई कार्यकर्ता नज़र आते थे। कांग्रेस के आंदोलन या पार्टी में शामिल होने से लोग कतराते थे। फिर गांधी जी ने अपने साथियों के साथ रायशुमारी की और फ़ैसला लिया कि कांग्रेस के नाम पर कोई भी काम नहीं किया जाए। इसके बाद गांधी जी का राष्ट्रीय आंदोलन आगे बढ़ा तो लोग खुद बखुद कांग्रेस के साथ आने लगे उनकी सक्रियता भी बढ़ी लेकिन जातीय समीकरण में लोग बंधे रहे। आजादी की लड़ाई के दौरान एक साथ देश की लड़ाई लड़ने के लिए आगे सभी आगे बढ़े। इस दौरान जातीय समीकरण का दांव ढीला पड़ा।

1937 में रखी गई त्रिवेणी संघ की नींव
गांधी जी की कोशिशों के बाद कुछ चुने हुए दलित नेताओं को आंदोलन में जगह तो मिली लेकिन वह संगठन में कम और जेल में ज्यादा नज़र आते थे। इसी वजह से साल 1993 में पिछड़े समुदाय के लोगों ने सामाजिक-राजनीतिक संगठन त्रिवेणी संघ की नींव रखी और 1937 के चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ कई जगहों से चुनावी चाल चली। बिहार प्रदेश कांग्रेस में इसके बाद 1947 तक अशराफ़ मुसलमान, कायस्थ और भूमिहारों का बोलबाला रहा। 1948 में ब्राह्मण प्रांतीय कांग्रेस का अध्यक्ष प्रजापति मिश्र के तौर पर अध्यक्ष बना। फिर 1959 में एक पिछड़े मुसलमान अब्दुल कयूम अंसारी कांग्रेस अध्यक्ष बने। पहली बार 1968 में पिछड़ा वर्गीय ब्राह्मण अनंत प्रसाद शर्मा को प्रांतीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया।

पहली बार दलितों के बीच से बने प्रदेश अध्यक्ष
1973 में सीताराम केसरी और 1977 में दलितों के बीच से मुंगेरीलाल पहली दफा बिहार कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए। 1983 में रामसरन प्रसाद सिंह,1990 में लहटन चौधरी बिहार कांग्रेस अध्यक्ष बने इसके बाद डूमरलाल जैसे कई नेता अध्यक्ष बनते रहे। इस दौरान कांग्रेस का संगठन बहुत ही बुरे दौर से गुज़र रहा था। बिहार कांग्रेस में सामाजिक संतुलन बनाने की पहली बार कृष्णवल्लभ सहाय ने पहल की। उन्होंने ग्यारह सदस्यीय मंत्रिमंडल में तीन पिछड़ावर्गीय मंत्री को शामिल किया। उन्होंने लोहिया की जाती-नीति से पहले यह पहल की थी जिसकी वजह से विरोध का भी सामना करना पड़ा।

नेहरू ने कामराज को बनाया कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष
कांग्रेस पार्टी में संतुलन बरकरार रखने के लिए नेहरू ने कामराज को कांग्रेस अध्यक्ष बना कर माहौल को पार्टी के पक्ष में रखने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाए। 1970 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के संगठन को भंग कर फिर से कांग्रेस का पुनर्गठन किया जिसके बाद कांग्रेस की बिहार इकाई का भी पुनर्गठन हुआ। इंदिरा कांग्रेस में ऊंची जाति के प्रतिनिधियों को जगह नहीं मिली। इंदिरा गांधी की चुनावी रणनीति में ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्गों का एक अलग मुकाम था। इसी दौरान बिहार में जयप्रकाश आंदोलन में आरएसएस का पूरा समर्थन मिला।

इंदिरा गांधी का 1980 में चमका सियासी सितारा
जयप्रकाश आंदोलन के दौरान बिहार में समाजवादी और संघी ताकतों का सियासी परचम बुलंद हुआ लेकिन 1979 में सबके रास्ते अलग हो गए। 1980 में इंदिरा गांधी का सियासी सितारा चमका और उन्होंने कमबैक किया। फिर बिहार में जगन्नाथ मिश्र की अगुवाई में कांग्रेस की नई सियासी समीकरण की नींव पड़ी। कांग्रेसी और जनसंघी मिश्र ( जगन्नाथ और कैलाशपति ) कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ इकठ्ठा हो गए। इस सियासी दांव में संजय गांधी ने खासी दिलचस्पी दिखाई जिसका परिणाम हुई कि दिल्ली के बाद कांग्रेस ने बिहार में भी वापसी हुई।

कांग्रेस की बिखरती सियासी ज़मीन
बिहार में 1980 से 1990 के मार्च तक कांग्रेस की सरकारें रही।बिहार में कांग्रेस के शासनकाल में पांच सीएम (जगन्नाथ मिश्र , चंद्रशेखर सिंह , बिंदेश्वरी दुबे , भागवत झा और सत्येंद्रनारायण सिन्हा) सीएम बने सभी ऊंची जाती से ताल्लुक रखते थे। कांग्रेस जाते-जाते भागलपुर दंगे का मंज़र बिहारवासियों के लिए छोड़ गई। इसी वजह से बिहार जातीय सियासत ने पांव पसारे और कांग्रेस की जड़ें सूख गई थी। बिहार में जातीय समीकरण ने ऐसा घर किया कि बिहार में कांग्रेस पिकनिक पार्टी बनकर रह गई। आलम यह हुआ कि बिहार में भाजपा भी आंशिक रूप से शासन में आई तो पिछड़े वर्ग से ही तीन उपमुख्यमंत्री बनाए।

संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की ज़रूरत
कांग्रेस ने कभी भी अपनी खामियों को नहीं सुधारा अगर वह इस पर ग़ौर करती तो शायद आज कांग्रेस के लिए ऐसे हालात पैदा नहीं होते। कांग्रेस के बिहार में अस्तित्व खोती चली गई। 1952 में बिहार विधान सभा में कांग्रेस विधायकों की तादाद 239 थी लेकिन आज सिर्फ 19 क्यों है। कांग्रेस के हार के पीछे की सबसे बड़ी वजह संगठनात्मक समीकरण पर ध्यान नहीं देना है। भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिए कांग्रेस ज़मीनी स्तर पर जनसंवाद तो कर रही है लेकिन इसके साथ-साथ कांग्रेस को अपनी चुनावी रणनीति और पार्टी के एजेंडे में भी बदलाव लाने की ज़रूरत है।
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