Motivational Story: कभी 2 वक्त की रोटी के लिए थी मोहताज, खो-खो विश्व कप जीतने के बाद मोनिका की बनीअलग पहचान
Success Story Monika Shah: मोनिका शाह का एक साधारण पृष्ठभूमि से विश्व चैंपियन बनने तक का सफ़र वाकई प्रेरणादायक है। बिहार के भागलपुर के डिम्हा गांव की रहने वाली मोनिका ने कई चुनौतियों का सामना किया।
एक समय ऐसा था जब उन्हें दो वक्त का खाना भी नहीं मिल पाता था और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उन्हें सब्ज़ियाँ भी बेचनी पड़ती थीं। इन कठिनाइयों के बावजूद, उनके दृढ़ संकल्प ने उन्हें खो-खो विश्व कप जीतने में मदद की।

मोनिका के पिता ने अथक परिश्रम किया, शुरुआत में दिल्ली में सब्ज़ियाँ बेचीं, फिर कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान अपने गाँव लौट आए। अपनी ज़मीन न होने के कारण उन्होंने बटाई पर खेती करना शुरू कर दिया। मोनिका नेपाल से आने वाली बाढ़ से प्रभावित गाँव में खेलने की कठिनाइयों को याद करती हैं। फिर भी, वह खो-खो के प्रति जुनूनी रहीं।
समर्थन और दृढ़ संकल्प: मोनिका अपने पीटी शिक्षक को कठिन समय में बहुत सहायता करने का श्रेय देती हैं। उनके माता-पिता भी अपनी सब्जी की दुकान पर लंबे समय तक काम करते थे। मोनिका अक्सर उनके साथ खेल के सामान के लिए पर्याप्त पैसे कमाने की उम्मीद में काम करती थी। आर्थिक तंगी के बावजूद उनकी माँ ने खो-खो के प्रति उनके जुनून को प्रोत्साहित किया।
अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए मोनिका को याद है कि संसाधनों की कमी के कारण उन्हें एक साल तक रोज़ाना एक ही टी-शर्ट पहननी पड़ी थी। वह 2010 की उस टी-शर्ट को संजोकर रखती है, जब उसने छठी कक्षा में पहली बार नेशनल्स खेला था। यह उसकी दृढ़ता और साधारण शुरुआत की याद दिलाता है।
खो-खो विश्व कप की जीत: भारतीय महिला टीम ने 19 जनवरी 2025 को नेपाल के खिलाफ फाइनल मैच में 78-40 के स्कोर से जीत हासिल की। मोनिका ने इस महत्वपूर्ण जीत में छह अंक बनाकर अहम भूमिका निभाई। पुरुष टीम ने भी नेपाल को 54-36 के स्कोर से हराया।
मोनिका का महत्वाकांक्षी खिलाड़ियों के लिए संदेश स्पष्ट है: कभी हार मत मानो और कड़ी मेहनत करते रहो। वह इस बात पर जोर देती हैं कि लगन का फल अंततः मिलता है, उन्होंने बताया कि वह 16-17 सालों से बिना उम्मीद छोड़े खो-खो खेल रही हैं।
मार्गदर्शन और प्रोत्साहन: अपनी पूरी यात्रा के दौरान मोनिका को अपनी गुरु माँ और महासचिव एमएस त्यागी सर से बहुमूल्य मार्गदर्शन मिला। उन्होंने संदेह के क्षणों में उसे प्रेरित किया, उसे खेल छोड़ने के बजाय खेलना जारी रखने के लिए कहा क्योंकि वह प्रतिभाशाली थी।
एमएस त्यागी सर द्वारा लाए गए बदलावों ने खो-खो के विकास को काफी प्रभावित किया है। सुधांशु मित्तल सर ने भी खेल को आगे बढ़ाने में बहुत योगदान दिया है। मोनिका शाह की कहानी सभी मुश्किलों के बावजूद दृढ़ता और दृढ़ संकल्प की कहानी है। गरीबी से निकलकर विश्व चैंपियन बनने तक का उनका सफर आज ऐसे ही संघर्षों का सामना कर रहे कई युवा एथलीटों को प्रेरित करता है।












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