UGC Equity Regulations 2026 पर देशभर में बवाल, दिग्विजय सिंह बोले– UGC ने कई सिफारिशें खुद नजरअंदाज कीं
UGC Equity: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जनवरी 2026 में जारी प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 ने पूरे देश के विश्वविद्यालय परिसरों में तूफान मचा दिया है। ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन सवर्ण (जनरल कैटेगरी) छात्रों और शिक्षकों के एक बड़े वर्ग ने इन्हें "एकतरफा" और "भेदभावपूर्ण" करार देते हुए विरोध शुरू कर दिया है।
इस बीच कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह, जिनकी अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति ने इन ड्राफ्ट नियमों की समीक्षा की थी, ने विवाद पर विस्तार से सफाई दी है। उन्होंने कहा कि संसदीय समिति की सिफारिशों को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है, जबकि UGC ने कई अहम सुझावों को खुद नजरअंदाज कर दिया, जिससे स्थिति और जटिल हो गई।

रोहित वेमुला-पायल तड़वी मामलों से शुरू हुआ सफर
ये नियम फरवरी 2025 में UGC द्वारा जारी ड्राफ्ट से निकले, जब रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की अपील और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा में भेदभाव रोकने के लिए मजबूत ढांचा बनाने का फैसला किया। 2012 के पुराने नियमों की जगह लेने वाले इन नए रेगुलेशंस का उद्देश्य SC, ST, OBC, दिव्यांग और अन्य वंचित वर्गों के खिलाफ जाति, लिंग, धर्म, विकलांगता आदि आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है।
13 जनवरी 2026 को UGC ने इन्हें अंतिम रूप से अधिसूचित किया, जिसके बाद हर उच्च शिक्षा संस्थान (HEI) में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (EOC) और इक्विटी कमेटी गठित करना अनिवार्य हो गया। कमेटी में महिलाओं, SC, ST, OBC और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है। शिकायतों पर 15-30 दिनों में जांच और कार्रवाई का प्रावधान है, साथ ही वार्षिक रिपोर्टिंग और संवेदनशीलता प्रशिक्षण भी शामिल हैं।
संसदीय समिति की प्रमुख सिफारिशें (दिसंबर 2025 रिपोर्ट)
दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली शिक्षा, महिला, बच्चे, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने ड्राफ्ट की समीक्षा कर सर्वसम्मत रिपोर्ट सौंपी। समिति ने पांच प्रमुख सुझाव दिए:
- OBC छात्रों और अन्य हितधारकों के उत्पीड़न को जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए।
- दिव्यांगता को भी भेदभाव के आधार के रूप में मान्यता दी जाए।
- इक्विटी कमेटी की संरचना बदली जाए, ताकि 10 सदस्यों वाली समिति में SC, ST और OBC का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत से अधिक हो और निर्णय निष्पक्ष रहें।
- भेदभाव की स्पष्ट पहचान और उदाहरण नियमों में लिखे जाएं, ताकि संस्थान मनमाने ढंग से मामलों को सही-गलत न ठहरा सकें।
- हर साल जातिगत भेदभाव के मामलों का सार्वजनिक खुलासा, फैकल्टी और प्रशासन के लिए अनिवार्य संवेदनशीलता प्रशिक्षण, और छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता व कानूनी मदद सुनिश्चित की जाए।
UGC ने क्या स्वीकार किया और क्या छोड़ा?
दिग्विजय सिंह के अनुसार, UGC ने जनवरी 2026 के अंतिम नियमों में कुछ सिफारिशें मानीं, जैसे:
- OBC को जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में शामिल करना।
- दिव्यांगता को भेदभाव के आधार के रूप में मान्यता।
- वार्षिक रिपोर्टिंग, ट्रेनिंग और सहायता के प्रावधान।
लेकिन महत्वपूर्ण सिफारिशें नजरअंदाज की गईं:
इक्विटी कमेटी में SC-ST-OBC प्रतिनिधित्व को 50% से अधिक करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं।
भेदभाव की विस्तृत परिभाषा और उदाहरणों की सूची नहीं दी गई। सबसे बड़ा विवादास्पद फैसला: झूठी शिकायतों पर सजा का प्रावधान हटाना, जो ड्राफ्ट में था लेकिन अंतिम नियमों में UGC ने खुद हटा दिया।
दिग्विजय सिंह ने कहा, "झूठे मामलों पर सजा का प्रावधान हटना और जनरल कैटेगरी को पूरी तरह बाहर रखना UGC का एकतरफा फैसला था। संसदीय समिति ने ऐसा कोई सुझाव नहीं दिया था। अब छात्रों का गुस्सा UGC और शिक्षा मंत्रालय पर होना चाहिए, न कि समिति पर।"
विरोध की वजह: सवर्ण छात्रों में डर और असंतोष
जनरल कैटेगरी के छात्रों का आरोप है कि नियम "एकतरफा" हैं: जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल SC, ST, OBC के खिलाफ है, जबकि जनरल कैटेगरी के छात्र भी जाति-आधारित भेदभाव का शिकार हो सकते हैं, लेकिन उनके लिए कोई प्रावधान नहीं। इक्विटी कमेटी में SC-ST-OBC का भारी प्रतिनिधित्व होने से निष्पक्ष सुनवाई पर सवाल। झूठी शिकायतों पर कोई सजा न होने से दुरुपयोग का खतरा। कैंपस में "डर का माहौल" बन सकता है, जहां छात्र-शिक्षक खुलकर बोलने से हिचकिचाएंगे।
लखनऊ, दिल्ली और अन्य जगहों पर "सवर्ण सेना" और छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किए। कई छात्रों ने कहा, "प्रतियोगिता, हाई फीस और सीमित सीटों के बीच अब ये नियम जनरल कैटेगरी को 'प्रिज्यूम्प्टिव ऑफेंडर' बना रहे हैं।"
कानूनी मोर्चा
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि नियमों का दुरुपयोग नहीं होगा और किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं, जहां याचिकाकर्ता "कास्ट-न्यूट्रल" परिभाषा की मांग कर रहे हैं।
दिग्विजय सिंह ने अपील की कि विवाद को राजनीतिक रंग न दिया जाए। "ये नियम वंचित वर्गों की सुरक्षा के लिए हैं, लेकिन UGC को संतुलित और स्पष्ट बनाना चाहिए।"
क्या होगा आगे?
ये नियम उच्च शिक्षा में समावेशिता लाने का प्रयास हैं, लेकिन असंतुलित क्रियान्वयन से विवाद बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर UGC स्पष्टीकरण जारी कर झूठी शिकायतों पर प्रावधान जोड़े और परिभाषा को अधिक समावेशी बनाए, तो विवाद कम हो सकता है। फिलहाल कैंपस में तनाव जारी है और छात्र संगठन आंदोलन तेज करने की तैयारी में हैं।
आपकी राय क्या है? क्या ये नियम जरूरी हैं या संशोधन की जरूरत है? कमेंट में बताएं।
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