MP News: दो महीने से सरकारी स्कूल पर लटक रहा ताला, निर्वाचन की कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं शिक्षक कुंजीलाल!

सीहोर जिले के भैरूंदा विकासखंड के दूरस्थ गांव तलैया में शासकीय प्राथमिक शाला पिछले दो महीनों से पूरी तरह बंद पड़ी है। सुबह का वक्त होता था तो कक्षा में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, खेल के मैदान में दौड़-भाग होती थी, लेकिन अब वहां सिर्फ सन्नाटा है।

ताला जड़ दिया गया है मुख्य दरवाजे पर और मासूम बच्चे रोज सुबह स्कूल के बाहर खड़े होकर इंतजार करते हैं कि शायद आज सर आएंगे। लेकिन सर नहीं आते।

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कारण सिर्फ एक है - गांव का एकमात्र सक्रिय शिक्षक कुंजीलाल पिछले दो साल से सीहोर तहसील के निर्वाचन कार्यालय में चिपके बैठे हैं और 70 किलोमीटर दूर अपने स्कूल लौटने को तैयार नहीं।

तीन पद, एक भी शिक्षक नहीं - बच्चों की पढ़ाई पर ताला

जिला शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार तलैया प्राथमिक शाला में तीन शिक्षक पदस्थ हैं:

  • एक शिक्षक की दो साल पहले मृत्यु हो चुकी है।
  • दूसरे शिक्षक पिछले साल सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुए और अभी स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं।
  • तीसरे शिक्षक कुंजीलाल - जो जीवित भी हैं, स्वस्थ भी हैं, लेकिन पिछले दो वर्षों से सीहोर तहसील के निर्वाचन कार्यालय में "चुनाव ड्यूटी" पर डटे हैं।

परिणाम - कक्षा 1 से 5 तक के करीब 85 बच्चे पिछले दो महीनों से पूरी तरह शिक्षा से वंचित हैं।

  • DEO ने लिखा पत्र, चुनाव कार्यालय ने नहीं छोड़ा
  • विद्यालय की इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जिला शिक्षा अधिकारी एस.एस. तोमर ने 18 सितंबर 2025 को एसडीएम तन्मय वर्मा को पत्र लिखा था। पत्र में स्पष्ट लिखा गया था कि "श्री कुंजीलाल, शिक्षक, शा.प्रा.शा. तलैया वर्तमान में आपके कार्यालय में निर्वाचन कार्य पर संबद्ध हैं। उक्त विद्यालय में अन्य दो शिक्षक पदों पर एक की मृत्यु एवं दूसरा दुर्घटना में घायल होने से लंबी छुट्टी पर है। फलस्वरूप विद्यालय पूरी तरह बंद पड़ा है। कृपया शिक्षक को तत्काल मुक्त कर विद्यालय में पदस्थ करने का कष्ट करें।"

यह पत्र लिखे दो महीने से ज्यादा बीत चुके हैं। न रिलीविंग हुई, न शिक्षक स्कूल लौटे।

"मुझे कोई नहीं हटा सकता" - शिक्षक की हठ, प्रशासन की खामोशी- गांव वालों और सूत्रों के अनुसार शिक्षक कुंजीलाल का सीहोर शहर में अपना मकान है। वे खुले आम कहते फिरते हैं - "मैंने ऊपर तक सेटिंग कर रखी है, मुझे निर्वाचन से कोई नहीं हटा सकता।" यही वजह है कि जिला शिक्षा अधिकारी का पत्र भी धूल फांक रहा है।

स्थानीय लोगों ने बताया कि कुंजीलाल को तलैया गांव रोज 70 किमी आने-जाने में परेशानी है, इसलिए वे स्कूल जाने से साफ मना करते हैं। गांव में न मोबाइल नेटवर्क ठीक से आता है, न बिजली नियमित है - इन सबका हवाला देकर उन्होंने स्कूल आना ही बंद कर दिया।

निर्वाचन ड्यूटी में भी लापरवाही, नोटिस तक जारी

दिलचस्प बात यह है कि जिस निर्वाचन कार्यालय में कुंजीलाल इतने आराम से बैठे हैं, वहां भी उनकी लापरवाही जगजाहिर है। अनुभागीय अधिकारी राजस्व (एसडीओपी) ने उन्हें "निर्वाचन कार्य में गंभीर लापरवाही" बरतने पर 14 नवंबर 2025 को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। नोटिस में लिखा है:

  • "आप निर्वाचन कार्य में नियमित रूप से अनुपस्थित रहते हैं, कार्य में रुचि नहीं लेते तथा मनमाने ढंग से कार्य करते पाए गए हैं। स्पष्टीकरण दें कि आपके विरुद्ध क्यों न अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।"
  • लेकिन नोटिस का भी कोई असर नहीं। न निर्वाचन कार्यालय ने उन्हें रिलीव किया, न शिक्षा विभाग ने सख्ती दिखाई।

अभिभावकों में गुस्सा, बच्चों में निराशा

तलैया गांव की रहने वाली राधा बाई (बदला हुआ नाम) ने बताया, "हमारे बच्चे दो महीने से स्कूल नहीं जा रहे। घर में कोई पढ़ाने वाला नहीं। प्रायवेट स्कूल इतना दूर है कि ले जाना संभव नहीं। सर को सिर्फ अपनी सुविधा दिखती है, बच्चों का भविष्य किसी को नहीं दिखता।"

ग्राम पंचायत सरपंच रामसिंह यादव ने कहा, "हमने कलेक्टर साहब को भी आवेदन दिया, लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई। एक शिक्षक की जिद की वजह से पूरा गांव शिक्षा से वंचित है।"

SIR का बहाना, असल में मनमानी

वर्तमान में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर पूरे प्रदेश में हजारों शिक्षक चुनाव ड्यूटी पर लगे हैं। लेकिन अधिकांश शिक्षक सुबह स्कूल जाते हैं, दो-तीन घंटे पढ़ाते हैं, फिर ड्यूटी पर चले जाते हैं। लेकिन कुंजीलाल ने तो स्कूल आना ही बंद कर दिया।

शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "ऐसे दर्जनों शिक्षक हैं जो सालों से मुख्यालय में अटैच हैं। ऊपर तक पहुंच होने की वजह से कोई हाथ नहीं डालता। तलैया इसका जीता-जागता उदाहरण है।"

शिक्षा का अधिकार कानून की धज्जियां

RTI एक्टिविस्ट अजय दुबे कहते हैं, "शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा 24 स्पष्ट कहती है कि शिक्षक को गैर-शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जा सकता, सिवाय जनगणना, चुनाव और आपदा प्रबंधन के। वह भी अस्थायी रूप से। लेकिन यहां तो दो साल से एक शिक्षक स्कूल नहीं जा रहा। यह RTE का खुला उल्लंघन है।"

अब आगे क्या?

ग्रामीणों ने ऐलान किया है कि अगर दिसंबर के पहले सप्ताह तक शिक्षक नहीं लौटे तो वे स्कूल के सामने धरना देंगे। कुछ अभिभावक कलेक्टर से मिलने की तैयारी कर रहे हैं। वहीं जिला शिक्षा अधिकारी ने कहा है कि वे दोबारा एसडीएम को पत्र लिख रहे हैं।

लेकिन सवाल वही है - क्या एक शिक्षक की मनमानी मासूम बच्चों के भविष्य पर भारी पड़ती रहेगी? क्या निर्वाचन की कुर्सी इतनी प्यारी है कि उसके लिए दर्जनों बच्चों की पढ़ाई दांव पर लगाई जा सकती है? तलैया गांव की यह कहानी पूरे मध्य प्रदेश के उन सैकड़ों स्कूलों की कहानी है, जहां शिक्षक हैं, वेतन मिलता है, लेकिन पढ़ाई नहीं होती। वनइंडिया हिंदी इस मामले पर नजर बनाए हुए है। क्या कुंजीलाल अब भी नहीं लौटेंगे स्कूल? या प्रशासन आखिरकार जागेगा?

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