Bhopal के कालीबाड़ी में बंगाली परंपरा का जादू, सिंदूर खेला में झूमीं महिलाएं, अमिताभ बच्चन की नातिन हुई शामिल
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बुधवार को टीटी नगर स्थित कालीबाड़ी मंदिर में दुर्गोत्सव की रंगत देखने लायक थी। बंगाल की पारंपरिक संस्कृति की मिठास इस बार और गहरी हो गई, जब बंगाली समाज की महिलाओं ने मां दुर्गा की विदाई से पहले 'सिंदूर खेला' की रस्म को हर्षोल्लास से निभाया। इस बार खास बात यह रही कि बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की नातिन नव्या नंदा भी इस समारोह में शिरकत करने पहुंचीं, जिसने पूरे आयोजन को और रोचक बना दिया।
पारंपरिक ढाक की थाप पर नृत्य करती महिलाएं, धुनुची नृत्य की ऊर्जा, और 400 साल पुरानी परंपरा का सम्मान - यह सब कालीबाड़ी को एक जीवंत मंच में बदल दिया। हमारी इस विस्तृत रिपोर्ट में हम इस सांस्कृतिक उत्सव की गहराइयों में उतरते हैं, नव्या नंदा की मौजूदगी के पीछे की कहानी खोलते हैं, और बंगाली परंपरा के पीछे छिपे इतिहास को भी सामने लाते हैं।

दुर्गोत्सव का आगाज: कालीबाड़ी में बंगाल की खुशबू
1 अक्टूबर 2025, बुधवार को भोपाल की कालीबाड़ी में दुर्गोत्सव अपने चरम पर था। नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा को बेटी के रूप में मंदिर में लाया गया था, और अब विदाई का पल नजदीक था। सुबह से ही बंगाली समाज के परिवार मंदिर में जुटने लगे। मंदिर परिसर में फूलों की सजावट, मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा, और पारंपरिक बंगाली व्यंजन जैसे रसगुल्ले और खिचड़ी की महक चारों ओर फैली थी। लेकिन असली आकर्षण था 'सिंदूर खेला' - एक ऐसी रस्म जो विवाहित महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का प्रतीक है।
समारोह की शुरुआत ढाक की मधुर धुन से हुई। महिलाएं लाल-शादी के परिधानों में सजी-धजी थीं, हाथों में सिंदूर की डिब्बियां लिए। उन्होंने मां दुर्गा की प्रतिमा के गालों को पान के पत्तों से स्पर्श किया, फिर उनकी मांग और मस्तक पर सिंदूर चढ़ाया। इसके बाद एक-दूसरे के माथे पर सिंदूर लगाकर वे पति की लंबी आयु और सुख की प्रार्थना करती रहीं। हंसी-ठहाकों और नृत्य के बीच यह दृश्य किसी उत्सव से कम नहीं लग रहा था।
नव्या नंदा की एंट्री: बॉलीवुड का रंग भोपाल में
सुबह 10 बजे के आसपास समारोह में एक नई हलचल मच गई, जब अमिताभ बच्चन की नातिन नव्या नंदा मंदिर में पहुंचीं। 27 साल की नव्या, जो फैशन डिजाइनर और उद्यमी हैं, बंगाली परंपरा से जुड़ाव के लिए जानी जाती हैं। उनकी मां श्वेता बच्चन नंदा की बंगाली जड़ें होने की वजह से नव्या इस संस्कृति से परिचित हैं। वे लाल साड़ी और गहनों से सजी हुई थीं, और उनके साथ कुछ सहयोगी भी थे।
नव्या ने 'सिंदूर खेला' में हिस्सा लिया और मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित किया। उन्होंने एक स्थानीय महिला से सिंदूर लगवाया और फोटो सेशन में भी शामिल हुईं। बाद में उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर की, जिसमें लिखा, "भोपाल की कालीबाड़ी में मां दुर्गा के आशीर्वाद और बंगाली संस्कृति की सुंदरता को महसूस किया।
स्थानीय बंगाली समुदाय के एक सदस्य, सुजीत चक्रवर्ती, ने बताया, "नव्या की मौजूदगी ने हमारे उत्सव को नई ऊंचाई दी। वे हमारी परंपरा को सम्मान दे रही हैं, जो गर्व की बात है।" नव्या का यह दौरा उनके भोपाल कनेक्शन से भी जुड़ा है, क्योंकि उनके परिवार का एक घर यहां है, जिसे वे कभी-कभार देखने आती हैं।
शक्ति का प्रतीक
समारोह का दूसरा आकर्षण था धुनुची नृत्य। बंगाली महिलाओं ने मिट्टी के बर्तन (धुनुची) में नारियल और हवन सामग्री जलाई, और उसकी थाप पर नृत्य किया। यह नृत्य मां भवानी की शक्ति और ऊर्जा को बढ़ाने का प्रतीक है। पुराणों के अनुसार, महिषासुर के साथ युद्ध से पहले मां दुर्गा ने यह नृत्य किया था, जिसके बाद उन्होंने राक्षस का वध किया। नृत्य के दौरान महिलाएं धुनुची को सिर पर, हाथों में, और पैरों के बीच संभालती हैं - यह उनकी साहस और समर्पण का प्रतीक है।
एक नृत्यांगना, रीमा दास, ने कहा, "यह नृत्य सिर्फ कला नहीं, हमारी आस्था है। मां की शक्ति हमें प्रेरित करती है।" ढाक की धुन और नृत्य की लय ने माहौल को अलौकिक बना दिया, और दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे।
400 साल पुरानी परंपरा: सिंदूर खेला का इतिहास
'सिंदूर खेला' की जड़ें 17वीं सदी के बंगाल में हैं, जब यह रस्म शुरू हुई थी। यह परंपरा देवी पक्ष के समापन के रूप में मनाई जाती है। बंगाली समाज नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा को कालीबाड़ी जैसे मंदिरों में लाता है, और दशमी के दिन उनकी विदाई बेटी की तरह की जाती है। सिंदूर खेला में विवाहित महिलाएं मां की प्रतिमा को सिंदूर अर्पित करती हैं, फिर एक-दूसरे को लगाती हैं, ताकि पति की लंबी उम्र और सौभाग्य की कामना हो।
कालीबाड़ी में यह परंपरा 1950 के दशक से शुरू हुई, जब भोपाल में बंगाली समुदाय बसा। आज यह समारोह 500 से ज्यादा महिलाओं और परिवारों को जोड़ता है। आयोजक कमलेश बनर्जी ने बताया, "यह हमारी पहचान है। हर साल यह उत्सव बड़ा होता जा रहा है।"
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