Indore MP News: लोकायुक्त की सख्त कार्रवाई, नायब तहसीलदार और निलंबित सहायक ने 50 हजार की रिश्वत लेते गिरफ्तार
मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए जा रहे सतत अभियान में लोकायुक्त संगठन ने एक और बड़ी सफलता हासिल की है। महानिदेशक लोकायुक्त योगेश देशमुख के सख्त निर्देशों पर इंदौर लोकायुक्त इकाई ने एक संयुक्त ट्रैप कार्यवाही को अंजाम दिया, जिसमें तहसील खुड़ैल के नायब तहसीलदार दयाराम निगम और निलंबित सहायक ग्रेड-3 नरेंद्र नरवरिया को 50,000 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया।
यह घटना सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ों को उखाड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो आम नागरिकों में विश्वास जगाने का काम करेगी। आरोपी दोषी के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण संशोधन अधिनियम 2018 की धारा 7 एवं 61(2) के तहत कड़ी कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

ट्रैप कार्यवाही का पूरा ब्योरा: कैसे फंसे आरोपी जाल में?
यह कार्यवाही एक वकील की शिकायत पर आधारित थी, जो सरकारी प्रक्रिया में अनावश्यक देरी और रिश्वत की मांग से तंग आ चुके थे। आवेदक कृष्ण कुमार डांगी, जो ग्रेटर ब्रजेश्वरी, इंदौर के निवासी हैं, ने इंदौर लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक राजेश सहाय को एक विस्तृत आवेदन प्रस्तुत किया। डांगी ने बताया कि उनकी विधवा बुआ भगवंतिबाई, जो ग्राम खराडीया की निवासी हैं, की भूमि के नामांतरण (म्यूटेशन) के लिए तहसील खुड़ैल में आवेदन किया गया था। लेकिन निलंबित सहायक ग्रेड-3 नरेंद्र नरवरिया ने नायब तहसीलदार दयाराम निगम के साथ मिलकर प्रक्रिया में जानबूझकर बाधा उत्पन्न की और 50,000 रुपये की रिश्वत की मांग की।
लोकायुक्त टीम ने शिकायत की प्रारंभिक जांच की, जिसमें आरोप सही पाए गए। आवेदक से रिश्वत की राशि लेने की तारीख 30 सितंबर 2025 तय हुई, और आरोपी पक्ष ने डांगी को तहसील खुड़ैल कार्यालय बुलाया। लोकायुक्त पुलिस ने तुरंत एक विशेष ट्रैप दल का गठन किया, जिसमें डीएसपी सुनील तालान, निरीक्षक आशुतोष मिठास, स उपनिरीक्षक रहीम खान, प्रधान आरक्षक प्रमोद यादव, आरक्षक आदित्य भदौरिया, राकेश मिश्रा, आशीष नायडू, आशीष आर्य, शैलेंद्र बघेल और वाहन चालक शेरसिंह ठाकुर शामिल थे। ट्रैप प्लान के तहत आवेदक को रिश्वत की नकली नोटों वाली राशि दी गई, और टीम को कार्यालय के आसपास गुप्त रूप से तैनात किया गया।
कार्यवाही के दौरान निलंबित सहायक नरेंद्र नरवरिया ने आवेदक से रिश्वत राशि अपने टेबल की दराज में रखवा ली। जैसे ही रिश्वत ग्रहण की पुष्टि हुई, आसपास तैनात लोकायुक्त दल ने आरोपी को मौके पर ही धर दबोचा। नायब तहसीलदार दयाराम निगम भी इस सौदे में संलिप्त पाए गए, और उनकी भूमिका की जांच जारी है। रिश्वत राशि बरामद कर ली गई, और आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी गई। यह कार्यवाही दोपहर करीब 2 बजे के आसपास संपन्न हुई, जिसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध है।
कानूनी कार्रवाई: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सजा का प्रावधान
आरोपी दयाराम निगम और नरेंद्र नरवरिया के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण संशोधन अधिनियम 2018 की धारा 7 (लोक सेवक द्वारा रिश्वत लेना) और धारा 61(2) (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत मामला दर्ज किया गया है। इस अधिनियम के तहत दोषी पाए जाने पर न्यूनतम 3 वर्ष से लेकर 7 वर्ष तक की सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा हो सकती है। लोकायुक्त महानिदेशक योगेश देशमुख ने इस मामले को प्राथमिकता देकर त्वरित सुनवाई के निर्देश दिए हैं। जांच में आरोपी के अन्य सौदों और नेटवर्क की भी पड़ताल की जा रही है, ताकि भ्रष्टाचार का पूरा जाल उजागर हो सके।
महानिदेशक लोकायुक्त का संदेश: भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस
महानिदेशक लोकायुक्त योगेश देशमुख ने इस कार्यवाही पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा है। हमारी टीम सतर्कता और सख्ती के साथ काम कर रही है, और ऐसी कार्रवाइयां भविष्य में और तेज होंगी। आम नागरिकों को शिकायत दर्ज करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि हर छोटी जानकारी भ्रष्टाचार को रोकने में सहायक सिद्ध हो सकती है।" देशमुख ने हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि मध्य प्रदेश में लोकायुक्त ने इस वर्ष अब तक 150 से अधिक ट्रैप कार्यवाइयां की हैं, जिनमें 200 से ज्यादा सरकारी अधिकारी फंसे हैं। इंदौर इकाई ने ही पिछले तीन महीनों में 25 से अधिक मामलों में सफलता हासिल की है।
मध्य प्रदेश में लोकायुक्त की सक्रियता: एक नजर आंकड़ों पर
मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को नई गति दी है। राज्य में तहसील, पटवारी, नायब तहसीलदार और अन्य निचले स्तर के अधिकारी भ्रष्टाचार के प्रमुख आरोपी पाए जा रहे हैं। 2025 के पहले नौ महीनों में लोकायुक्त को 5,000 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 40 प्रतिशत भूमि संबंधी मामलों से जुड़ी हैं। इंदौर संभाग में ही 300 से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गईं, और 60 ट्रैप कार्यवाइयां अंजाम दी गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिलसिला जारी रहा, तो सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी।
हाल के अन्य मामलों में इंदौर लोकायुक्त ने एक पटवारी को 20,000 रुपये की रिश्वत लेते पकड़ा था, जबकि भोपाल में एक एसडीएम पर 2 लाख की मांग का मामला सामने आया था। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि भ्रष्टाचार अब किसी एक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रणालीगत समस्या बन चुकी है।
आम नागरिकों पर भ्रष्टाचार का बोझ
यह ट्रैप कार्यवाही न केवल आरोपी अधिकारियों के लिए सबक है, बल्कि यह आम नागरिकों के लिए भी एक संदेश है। भूमि नामांतरण जैसी बुनियादी सेवाओं में रिश्वत की मांग से प्रभावित लाखों लोग परेशान हैं। आवेदक कृष्ण कुमार डांगी ने घटना के बाद कहा, "मैं एक वकील हूं, लेकिन सरकारी कार्यालयों में भी रिश्वत का जाल इतना जटिल है। लोकायुक्त की यह कार्रवाई उन सभी के लिए राहत है जो न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं।" विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल इंडिया के दौर में भी ऑफलाइन भ्रष्टाचार जारी है, और इसके लिए और सख्त कानूनों की आवश्यकता है।
इस घटना से प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाने की मांग उठ रही है, ताकि लोग बिना डरे शिकायत दर्ज कर सकें। एनजीओ और सामाजिक संगठनों ने लोकायुक्त की तारीफ की है, लेकिन साथ ही डिजिटल शिकायत पोर्टल को और मजबूत करने की सिफारिश की है।












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