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Holi 2026: होलिका दहन की अग्नि और राख का क्या है महत्व? जानिए शास्त्रसम्मत नियम और मान्यता

Bhopal News: होली का त्योहार रंगों और खुशियों का पर्व है, लेकिन इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ और महत्व भी छिपा है। होली की अग्नि और राख इस त्योहार के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं, जो हमें जीवन के अहम संदेश देते हैं।

ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद गौतम के अनुसार, होलिका दहन से उत्पन्न होने वाली अग्नि, जिसे होलिका पंचाग्नि भी कहा जाता है, भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की विजय और दुष्ट राजा हिरण्यकश्यप के नाश का प्रतीक है।

Holi 2026 What is significance of fire and ashes of Holika Dahan Learn scriptural rules and beliefs

भक्त प्रह्लाद द्वारा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक था, जो इस अग्नि में नहीं जली; बल्कि नकारात्मक ऊर्जा और राक्षसी प्रवृत्ति की होलिका दहन हो गई। यह अग्नि नकारात्मक शक्तियों को दूर करने का प्रतीक है और हमें जीवन में सत्य और अच्छाई की विजय का संदेश देती है।

पंडित गौतम के अनुसार, होली की राख को भस्म कहा जाता है, जिसे शरीर पर लगाया जाता है। यह भस्म शुद्धिकरण और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानी जाती है। यह त्वचा और शरीर को ठंडक प्रदान करती है तथा नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक होती है।

उन्होंने बताया कि यह पवित्र अग्नि सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण मानी जाती है। परंपरा के अनुसार, इसी अग्नि को घर लाकर पूजन किया जाता है। इस अग्नि से भोग-प्रसाद तैयार कर कुल देवता, ग्राम देवता और स्थान देवता को अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि इस अग्नि से बने प्रसाद के सेवन से जठराग्नि संतुलित होती है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

ज्योतिष मठ संस्थान के आचार्य पंडित विनोद गौतम ने बताया कि इस वर्ष सूतक एवं ग्रहण काल को ध्यान में रखते हुए 3 मार्च को प्रातः 9:00 बजे से धुलेंडी (धूलिवंदन) और रंग खेलने से परहेज करना चाहिए। उनके अनुसार, ग्रहण काल में देवताओं को कष्ट माना जाता है, इसलिए ऐसे समय में उत्सव मनाना शुभ नहीं होता। इस कारण 4 मार्च को होलिका उत्सव एवं चल समारोह निकालने की सलाह दी गई है।

उन्होंने बताया कि होली की भस्म, गुलाल और रंग पहले कुल देवताओं, मंदिर के देवताओं, ग्राम देवताओं और वास्तु देवताओं को अर्पित किए जाते हैं। अतः सूतक या ग्रहण काल में इन्हें अर्पित नहीं करना चाहिए। शास्त्रसम्मत मान्यता के अनुसार, दूसरे दिन से ही रंगोत्सव प्रारंभ करना उचित है।

पंडित गौतम के अनुसार, होली की अग्नि और राख का महत्व हमें जीवन में सकारात्मकता और शुद्धता बनाए रखने की प्रेरणा देता है। होली की अग्नि नव ऊर्जा का संचार करती है और इसे 'प्रथम अग्नि' भी कहा जाता है। इसी प्रकार, होली की भस्म देवताओं को अर्पित करने के बाद माता-पिता और परिवारजनों को लगाई जाती है। इसके बाद धुलेंडी खेलने की शुरुआत होती है और फिर विभिन्न रंगों व गुलाल से होली खेली जाती है।

मान्यता है कि होली की राख को शरीर पर लगाने से त्वचा संबंधी समस्याओं में राहत मिलती है और मानसिक शांति बढ़ती है। घर के चारों ओर भस्म लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। इस प्रकार, होली की अग्नि और राख हमें जीवन के महत्वपूर्ण संदेश देती हैं और एक पवित्र तथा सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करती हैं।

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