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Bhopal News: इशारों में सीखा ताइक्वांडो, गोल्ड जीतकर दिखाई ताकत – ये है भोपाल की चुप्पी तोड़ने वाली कहानी"

MP News Bhopal: जब ज्यादातर लोग मोबाइल स्क्रीन पर रील्स देखकर घंटों बिता देते हैं, तब भोपाल की 15 साल की एक लड़की अपनी सीमाओं को तोड़कर पूरे देश में मिसाल कायम कर रही है। नाम है कनिष्का शर्मा। वो न बोल सकती हैं, न सुन सकती हैं, लेकिन हौसले और मेहनत की आवाज़ इतनी बुलंद है कि पूरे देश में गूंज रही है।

जन्म से ही श्रवण और वाणी दिव्यांगता के साथ जन्मी कनिष्का ने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने इशारों-इशारों में ताइक्वांडो सीखा और आज राज्य स्तर पर 5 गोल्ड मेडल और राष्ट्रीय स्तर पर 1 सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं। उनके सपनों की उड़ान यहीं नहीं रुकी है। अब वो वर्ल्ड ताइक्वांडो और डेफ ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रही हैं।

Defeating disability Bhopal Kanishka created history by winning 5 gold medals in Taekwondo

इशारों में ही सीखा हर दांव-पेंच

जहां सामान्य खिलाड़ी शब्दों में कोच की हर सीख को समझते हैं, वहीं कनिष्का ने हर 'किक' और 'ब्लॉक' इशारों की भाषा में सीखा। शुरुआत में कठिनाइयां आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। मध्य प्रदेश स्पोर्ट्स एकेडमी में उनकी ट्रेनिंग चल रही है और कोचिंग स्टाफ भी कनिष्का की इस लगन को देखकर खुद को गर्वित महसूस करता है।

पिता ने कहा- 'कभी नहीं मानी हार'

कनिष्का के पिता कपिल शर्मा पेशे से एक फोटोग्राफर हैं। वे कहते हैं, "कनिष्का बचपन से ही जिद्दी है। जब उसने तय कर लिया कि उसे ताइक्वांडो सीखना है, तो हम थोड़े हिचकिचाए क्योंकि ये कोई आसान राह नहीं थी। लेकिन उसने हर मुश्किल को इशारों से मात दी।"

2023 में बेंगलुरु में दिखाया दम

पिछले साल बेंगलुरु में आयोजित राष्ट्रीय ताइक्वांडो प्रतियोगिता में कनिष्का ने पूरे भारत के डेफ एथलीट्स के बीच सिल्वर मेडल जीता। कनिष्का ने बताया कि वो फाइनल में मामूली अंतर से हार गई थीं, लेकिन अब उनका अगला लक्ष्य डेफ ओलंपिक्स में गोल्ड जीतना है।

'रील्स वाली को लाइक करोगे, हमें नहीं!'

कनिष्का के इस संघर्ष और सफलता के बाद भी सोशल मीडिया पर उनकी उपलब्धि को उतनी लाइक और पहचान नहीं मिलती, जितनी एक ट्रेंडिंग रील्स बनाने वाले को। इस पर खुद कनिष्का इशारों में कहती हैं, "लोग रील्स बनाने वालों को फॉलो और लाइक करते हैं, लेकिन असली मेहनत और पसीने की कहानियों पर कम ही नजर जाती है।"

कोच भी हुए इमोशनल

कनिष्का की कोच प्रिया सिंह कहती हैं, "मैंने कई खिलाड़ी ट्रेन किए हैं, लेकिन कनिष्का जैसी जुझारू और समर्पित बच्ची शायद ही कभी देखी हो। शब्दों के बिना सिर्फ आंखों और इशारों से सीखकर उसने जो मुकाम हासिल किया है, वो बहुत बड़ी बात है।"

समाज को दी नई दिशा

कनिष्का ने न केवल अपने माता-पिता और कोच का सिर गर्व से ऊंचा किया है, बल्कि उन हजारों दिव्यांग बच्चों के लिए भी एक मिसाल कायम की है, जो किसी न किसी कारण से खुद को कमजोर समझ बैठते हैं। कनिष्का की कहानी बताती है कि इरादे मजबूत हों तो आवाज़ की नहीं, हौसले की जरूरत होती है।

हम सबको कनिष्का से सीखने की जरूरत

जहां आज की दुनिया लाइक और व्यूज़ के पीछे भाग रही है, वहीं कनिष्का जैसे युवाओं की असली कहानियां बताती हैं कि 'सच्ची प्रेरणा' कहां से आती है।

कनिष्का को उनके इस संघर्ष और सफलता के लिए सलाम! हम उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं और आशा करते हैं कि एक दिन पूरा देश उनकी कहानी को सुनेगा और सराहेगा।

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