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बर्लिन को 2030 तक जलवायु तटस्थ बनाने के लिए होगा मतदान

Climate Change: पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है. कहीं बेतहाशा गर्मी पड़ रही है, तो कहीं अचानक बाढ़ आ रही है. ऐसे में ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कटौती ही एक मात्र उपाय है.

बर्लिन में प्रदर्शन

पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है. कहीं बेतहाशा गर्मी पड़ रही है, तो कहीं अचानक बाढ़ आ रही है. ऐसे में ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कटौती ही एक मात्र उपाय है.

इसे देखते हुए जर्मनी ने 2045 तक खुद को जलवायु तटस्थ देश बनाने की योजना बनाई है, लेकिन बर्लिन की जनता चाहती है कि इस तय योजना से 15 साल पहले ही देश की राजधानी जलवायु तटस्थ बन जाए. इसके लिए जनमत संग्रह कराया जा रहा है. इस रविवार को जनता जनमत संग्रह के लिए मतदान करेगी.

मौजूदा लक्ष्य पर्याप्त नहीं है

18 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 24 लाख लोग इस मतदान में हिस्सा ले सकेंगे. इस संशोधन के पारित होने के लिए जरूरी है कि कम से कम 25 फीसदी, यानी 6,13,000 लोगों को इसके पक्ष में मतदान करना होगा.

बर्लिन में जलवायु को बचाने के लिए प्रदर्शन

जर्मनी के अन्य हिस्सों की तरह ही बर्लिन में भी 2045 तक, कार्बन-डाइऑक्साइड के शुद्ध उत्सर्जन में 1990 के स्तर की तुलना में 95 फीसदी कमी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है.

हालांकि, जलवायु वैज्ञानिकों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह लक्ष्य पर्याप्त नहीं है, क्योंकि जर्मनी 2031 तक उस कार्बन उत्सर्जन की सीमा को पार कर चुका होगा जिसे उसने ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के उपायों के तहत तय किया था.

जनमत संग्रह शुरू करने वाले समूह 'क्लीमानूश्टार्ट बर्लिन' के मुताबिक, 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के तहत जो लक्ष्य तय किया गया था उसे समय से पहले हासिल करने की जरूरत है.

जनमत संग्रह के साथ-साथ, समूह यह भी चाहता है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बर्लिन की सरकार को कानूनी तौर पर बाध्य किया जाए.

यह समूह मौजूदा ऊर्जा कानून में संशोधन के लिए मतदाताओं से अपनी सहमति देने का आग्रह कर रहा है. अगर यह संशोधन पारित हो जाता है, तो तत्काल प्रभाव से लागू होगा और शहर की नगरपालिका को तुरंत कार्रवाई करनी होगी.

अगर बर्लिन की राज्य सरकार लक्ष्य को हासिल करने में सफल नहीं हो पाती है, तो उस पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है और आर्थिक दंड लगाया जा सकता है.

क्लिमेन्यूस्टार्ट बर्लिन के एक कार्यकर्ता जेसामाइन डेविस ने डीडब्ल्यू को बताया, "हम इस संभावना को कम करना चाहते हैं कि सरकार सिर्फ खोखले वादे न करे, बल्कि उन वादों को पूरा भी करे और हम 2030 तक जलवायु तटस्थता का लक्ष्य हासिल करने के लिए राजनेताओं पर दबाव बना सकें.

बर्लिन ने जलवायु आपातकाल की घोषणा की है और इस समय उसके मुताबिक कोई काम नहीं किया जा रहा है. ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा है कि आपातकाल के मुताबिक काम किया जा रहा हो."

राजनीतिक समर्थन की कमी

बर्लिन की कम से कम 80 फीसदी ऊर्जा आपूर्ति जीवाश्म ईंधन स्रोतों से होती है. बर्लिन की राज्य संसद 'द सीनेट' के कुछ सदस्यों का मानना है कि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर पूरी तरह निर्भरता हासिल करने के लिए सात साल का समय पर्याप्त है. हालांकि, वे इससे जुड़ी लागतों को लेकर चिंतित हैं.

सोशल डेमोक्रेट्स (एसपीडी), ग्रीन्स और पोस्ट-कम्युनिस्ट लेफ्ट पार्टी की गठबंधन वाली शहर की स्थानीय सेंटर-लेफ्ट सरकार ने लोगों से आग्रह किया है कि वे रविवार को 'नहीं' के पक्ष में मतदान करें. हालांकि, बर्लिन की पर्यावरण और जलवायु संरक्षण सीनेटर, ग्रीन पार्टी के संसदीय समूह की नेता बेटिना जराश ने प्रस्तावित संशोधन के समर्थन में बात की है.

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की हालिया रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया है कि स्थिति 'नाटकीय' है. 2030 तक जलवायु तटस्थता को लागू करने की लागत अरबों में होने का अनुमान है, क्योंकि इमारतों की मरम्मत करने और निजी परिवहन को नियंत्रित करने की जरूरत होगी.

आलोचकों ने चेतावनी दी है कि तय लक्ष्य के समय को पहले लाने का मतलब है कि अन्य क्षेत्रों में किए जाने वाले निवेश में कटौती करनी होगी, जैसे कि बच्चों की देखभाल और शिक्षा से जुड़े क्षेत्र में.

इंडिपेंडेंट एसोसिएशन ऑफ बिजनेस बर्लिन-ब्रांडेनबुर्ग (यूवीबी) के प्रमुख क्रिश्चियान एम्सिंक ने जनमत संग्रह को 'बेईमान' बताया. उन्होंने कहा कि मतदाताओं को 'धोखा' दिया जा रहा है कि बर्लिन 2030 तक जलवायु तटस्थ बन सकता है.

जनमत संग्रह शुरू करने वाले समूह ने इस बात को लेकर कोई योजना पेश नहीं की है कि नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत को बढ़ावा देने के लिए धन का इंतजाम कैसे किया जा सकता है. हालांकि, उनका तर्क है कि ऊर्जा के स्रोत में बदलाव से स्थानीय अर्थव्यवस्था में निवेश को बढ़ावा मिलेगा और इससे रोजगार के मौके पैदा होंगे.

यूवीबी में उद्योग, ऊर्जा और बुनियादी ढांचा नीति के प्रमुख बर्कहार्ड राइन ने डीडब्ल्यू को बताया कि जिन चीजों को मुद्दा बनाया जा रहा है वह असल मुद्दा है ही नहीं.

उन्होंने कहा, "अभी हमारी मुख्य समस्या नई नौकरियां पैदा करना नहीं है. कई उद्योग और कंपनियों में हमारे पास योग्य कर्मचारियों की कमी है. हमारी समस्या यह है कि हमें जो करना चाहिए वह काम कर ही नहीं रहे हैं."

इस जनमत संग्रह में मुख्य समस्याओं की जगह सिर्फ अव्यावहारिक चीजों पर बातें हो रही हैं, जबकि कंपनियां बुनियादी ढांचे का इंतजार कर रही हैं."

क्लिमेन्यूस्टार्ट बर्लिन के आयोजक इस बात पर अड़े हुए हैं कि 2030 तक जलवायु तटस्थता के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है. उनका कहना है कि इस क्षेत्र में सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय संसाधनों की क्षमता पर पूरी तरह ध्यान नहीं दिया गया है.

डेविस ने कहा, "नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में शायद यह हमारा सबसे बड़ा संसाधन है और इस पर विचार नहीं किया जा रहा है. जलवायु आपातकाल की स्थिति में सबसे पहले इस पर विचार किया जाना चाहिए. बर्लिन के पास ब्रांडेनबुर्ग में 160 वर्ग किलोमीटर का ऐसा इलाका मौजूद है जिसका इस्तेमाल पवन ऊर्जा के लिए किया जा सकता है."

कानूनी कदम उठाने पर विचार

राजनीति, विज्ञान और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने साथ मिलकर 2021 में क्लिमेन्यूस्टार्ट बर्लिन समूह की स्थापना की थी. इसे फ्राइडे फॉर फ्यूचर, एक्सटिंक्शन रिबेलियन, जर्मनी के राष्ट्रीय साइकिल चालक संघ और बर्लिन के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय के सस्टेनेबिलिटी ऑफिस का भी समर्थन है.

साथ ही, इस समूह को न्यूयॉर्क के निवेशक अल्बर्ट वैगनर और सुजान डेंजिगर का भी समर्थन मिला है. इन दोनों के पास जर्मनी की नागरिकता है. इससे पहले इन्होंने बर्लिन में यूनिवर्सल बेसिक इनकम लागू करने के लिए अभियान चलाने वाले समूह को आर्थिक मदद की थी.

बर्लिन का यह जनमत संग्रह, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण पर सरकारों को घेरने के लिए धरातल पर चलाया जा रहा सबसे नया कैंपेन है. जुलाई 2022 में संयुक्त राष्ट्र ने स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ पर्यावरण के अधिकार को मानव अधिकार घोषित करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था.

साथ ही, यूरोपीय न्यायालय ने भी यह फैसला सुनाया है कि अगर वायु प्रदूषण की वजह से किसी नागरिक के स्वास्थ्य पर असर पड़ता है, तो वह सरकार पर मुकदमा कर सकता है.

हालांकि, संशोधन में यह नहीं बताया गया है कि अपने दायित्वों को पूरा न करने पर सरकार पर किस तरह के प्रतिबंध लागू होंगे. कैंपेन की शुरुआत करने वालों का कहना है कि प्रस्तावित कानून में प्रतिबंधों का मसौदा तैयार करना एक अत्यधिक जटिल प्रक्रिया है.

ऐसा कानून बनाने में काफी समय लगता है जिस पर कोई विवाद न हो और धरती को बचाने के लिए इतना ज्यादा समय नहीं बचा है.

डेविस ने कहा, "जलवायु संकट इतना जरूरी विषय है कि हम जल्द से जल्द जनमत संग्रह कराना चाहते थे. हमने सोचा कि अगर कानूनी क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ प्रतिबंधों को परिभाषित करेंगे, तो ज्यादा अच्छा होगा."

जनमत संग्रह शुरू करने वाले समूह का कहना है कि 4,50,000 मतदाताओं ने डाक मतपत्र के लिए आवेदन किया है. उन्हें उम्मीद है कि रविवार को संशोधन को मंजूरी मिल जाएगी.

डेविस ने कहा, "हम अभी उस चरण में हैं जहां कह रहे हैं कि सभी मतदाताओं को वोट देने की जरूरत है. अगर हम कुछ वोटों से हार गए, तो यह काफी विनाशकारी होगा."

Source: DW

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