Karnataka Election: जेडीएस को इस बार अपने ही गढ़ में झेलनी पड़ेगी कांटे की टक्कर, जानिए क्यों?
कर्नाटक विधाानसभा चुनाव में इस बार जनता दल-सेक्युलर (JDS) को अपने ही गढ़ में कड़ी चुनौती झेलनी पड़ सकती है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रही है। कांग्रेस का दावा है कि भाजपा और जेडीएस को भारी मतों से हराकर उनकी पार्टी बहुमत की सरकार बनाएगी। हालांकि भाजपा और पूर्व सीएम एच डी कुमारस्वामी की पार्टी जनता दल-सेक्युलर (JDS)भी अपनी जीत के लिए आश्वस्त नजर आ रही है। हालांकि कांग्रेस और भाजपा का जो दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां हैं वो कर्नाटक की जातिगत राजनीति को टारगेट करते हुए वोक्कालिगा समुदाय के वोटरों पर अपना ध्यान विशेषकर मांड्या क्षेत्र में केंद्रित कर रहे हैं। जिससे अपनी पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत बताने वाली जेडीए के लिए ये क्षेत्र जो उनके प्रति वफादार रहा है इस चुनाव में बड़ा खतरा उत्पन्न कर दिया है।

आगामी चुनाव में जनता दल-सेक्युलर (JDS) के सामने अब तक की सबसे कठिन चुनौती बनती नजर आ रही है क्योंकि कांग्रेस और भाजपा दोनों पुराने मैसूरु क्षेत्र में अपने वोक्कालिगा वोट बैंक में भारी सेंध लगाने की बात कह चुकी है। ये वो ही कांग्रेस है जिसके साथ पिछले 2018 के चुनाव के बाद जेडीएस ने हाथ मिलाकर सरकार बनाई थी और कुमास्वामी ने सीएम की कुर्सी संभाली थी, लेकिन कार्यकाल के बीच में ही कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा में शामिल हो गए और जेडीएस और कांग्रेस की सरकार गिर गई और भाजपा ने सरकार का गठन किया था।

सबसे पुरानी क्षेत्रीय पार्टी जेडीएस इस बार कई चुनौतियों का सामना कर रही है क्योंकि कांग्रेस ने वोक्कालिगा के मजबूत नेता डी.के. शिवकुमार को इसके राज्य प्रमुख के रूप में और भाजपा पुराने मैसूरु क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित कर रही है। पार्टी मौजूदा विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के बड़े पैमाने पर पलायन से भी परेशान है, जबकि इसकी 'परिवार केंद्रित' राजनीति पार्टी के क्षैतिज विकास के लिए एक और बड़ी चुनौती है।
ये ही वजह है कि 2023 के चुनाव में खंडित जनादेश की आशंका को देखते हुए, कुमारस्वामी की पार्टी जेडीएस ने नवंबर के तीसरे सप्ताह में कोलार जिले के मुलाबागिलु से पुराने मैसूर क्षेत्र में एक अभियान और 26 मार्च को मैसूर में 10 लाख की भीड़ के साथ एक मेगा रैली के तौर पर पंचरत्न यात्रा शुरू की।
जनता दल-सेक्युलर (JDS) पहले ही 236 सभाएं करते हुए 90 निर्वाचन क्षेत्रों को कवर कर चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी नेता एच.डी. कुमारस्वामी ने दावा किया है कि यात्रा पुराने मैसूरु क्षेत्र में कांग्रेस के मतदाता आधार को तोड़ेगी।
ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस भले ही सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी ने इस क्षेत्र में हमेशा अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन वर्षों से, जेडीएस इस क्षेत्र में विशाल वोक्कालिगा आबादी के कारण प्रतिस्पर्धी में रही है। जहां यात्रा में भारी भीड़ आ रही है, वहीं भाजपा इस क्षेत्र में अधिक सीटें जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है और दूसरी ओर कांग्रेस अपने वोक्कालिगा आधार को वापस लुभाने की कोशिश कर रही है।
बीजेपी की अनुपस्थिति के कारण जेडीएस काफी हद तक अपने गढ़ को बरकरार रखने में सफल रही है। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में, जेडीएस ने इस क्षेत्र में अपने कई पॉकेट बोरो खो दिए। पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस संरक्षक एच.डी. देवेगौड़ा खुद अपनी तुमकुर सीट हार गए, जबकि उनके पोते निखिल कुमारस्वामी गौड़ा मांड्या जिले से हार गए। पार्टी के लिए एकमात्र राहत उनके एक और पौत्र प्रज्वल रेवन्ना की हासन सीट से जीत थी।
वहीं बात अगर करें दिसंबर 2019 में हुए उपचुनावों की तो इममें भाजपा पार्टी केआर पेट विधानसभा क्षेत्र जीतने में कामयाब रही, मांड्या क्षेत्र में इसकी पहली जीत थी, जबकि जेडीएस केआर पीट, चिक्कबल्लापुरा, महालक्ष्मी लेआउट, हुनसुर, सिरा और आरआर नगर के अपने गढ़ों में हार गई थी।
2018 के चुनावों पर गौर करें तो वोक्कालिगा समुदाय जो राज्य की आबादी का 15 प्रतिशत हिस्सा हैं उनके प्रमुख गढ़ में बीजेपी हसन सीट जीतने में कामयाब हुई थी। जेडीएस ने इस क्षेत्र की र 59 में से 28 सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में की निगाहें पुराने मैसूर क्षेत्र में वोक्कालिगा वोटों के एक बड़े हिस्से पर जीत हासिल करने और सत्ता में वापस आने की अपनी उम्मीदों पर टिकी हुई हैं।












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