गर्भ में भी बच्चों के चेहरे गाजर के स्वाद से खिल उठते हैं

नई दिल्ली, 22 सितंबर। उत्तरपूर्वी इंग्लैंड में दुरहम यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों का कहना है कि उनकी खोज से पहली बार इस बात के सीधे सबूत मिले हैं कि बच्चे जन्म से पहले ही अलग गंध और स्वाद को लेकर अलग तरह की प्रतिक्रिया देते हैं. वैज्ञानिकों की एक टीम ने 100 गर्भवती महिलाओं के 4डी अल्ट्रासाउंड स्कैन का अध्ययन किया और यह पता लगाया कि गाजर के स्वाद के संपर्क में आने वाले बच्चों के चेहरे पर हंसी दिखाई पड़ी. इसी तरह जिन बच्चों को गहरे रंग वाली पत्तेदार गोभी का जायका मिला उनके चेहरे रुआंसे हो गये.
पोस्ट ग्रेजुएट रिसर्चर बेयजा उस्तुन का कहना है, "कई अध्ययनों से यह पता चला था कि बच्चे गर्भ में ही स्वाद और गंध को जान सकते हैं लेकिन यह नतीजा उनके जन्म के बाद की जानकारियों से निकाला गया था. हमारी स्टडी में पहली बार जन्म से पहले ही उनकी प्रतिक्रियाओं को देखा गया है.

जन्म से पहले की पसंद
उस्तुन ने यह भी कहा, "इससे नतीजा निकलता है कि जन्म से पहले लगातार स्वाद से बच्चों का सामना करा कर उनमें भोजन के लिये पसंद विकसित की जा सकती है, जब हम सेहतमंद खाने से जुड़ा संदेश देना चाहते हैं तो फिर यह बात ज्यादा अहम हो सकती है, इससे खाने को लेकर जो दिक्कतें होती हैं उनसे बचा जा सकता है."
इंसान स्वाद और गंध के मेल से बने जायके का अनुभव करता है. माना जा रहा है कि भ्रूण में यह काम गर्भ के एमनियोटिक फ्लुइड को सूंघने और निगलने के जरिये होता है.
साइकोलॉजिकल साइंस जर्नल में छपी रिसर्च रिपोर्ट दुरहम के फीटल एंड नियोनेटल रिसर्चर लैब और मध्य इंग्लैंड के बर्मिंघम में एस्टन यूनविर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तैयार की है. फ्रांस में बुरगुंडी के नेशनल सेंटर फटर साइंटिफिक रिसर्च की एक टीम भी इसमें शामिल थी.
इन टीमों में शामिल वैज्ञानिकों का मानना है कि उनकी इस खोज से इंसान के स्वाद के विकास के साथ ही गंध के रिसेप्टरों, धारणाओं और स्मृतियों के विकास को समझने में मदद मिलेगी.

रिसर्च रिपोर्ट के सह लेखक प्रोफेसर जैकी ब्लिसेट एस्टन यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं. उनका कहना है, "यह दलील दी जा सकती है कि जन्म से पहले स्वाद का संपर्क उन स्वादों के लिए पसंद बना सकता है जिनका सामना जन्म के बाद होगा. दूसरे शब्दों में हरी पत्तेदार गोभी जैसे स्वादों से भ्रूण का ज्यादा सामना करा कर उनके स्वाद की आदत लगाई जा सकती है."
वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके बाद अगला कदम होगा यह पता लगाना का कि क्या ज्यादा समय तक उन स्वादों का अनुभव कराया जाये तो उसे लेकर नकारात्मकता घटती है? इसका नतीजा तब दिखेगा जब बच्चों के जन्म के बाद उन्हें इनका स्वाद चखाया जायेगा मुमकिन है कि तब उन्हें इसका स्वाद ज्यादा बुरा ना लगे. एनआर/एए (एएफपी)
Source: DW
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