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हौसलों से लिख डाली खुद की किस्मत! 100% ब्लाइंड तसव्वर अली और मनीषा कुमारी को मिला नियुक्ति पत्र

अगर आपको लगता है कि भगवान या अल्लाह ने आपके साथ बहुत अन्याय किया है, आपके साथ भेदभाव किया है। जिसके वजह से आज आप सफल नहीं हो पा रहे हैं। तो इन दोनों की कहानी आपको एक बार जरूर सुन्नी चाहिए।

Agra 100% blind Tasavvar Ali and Manisha Kumari get appointment letter

अक्सर लोग अपनी असफलता के पीछे कोई न कोई बहाना ढूँढ़ते हैं। ये ऐसा था वो वैसा था, अगर ऐसा होता या वैसा हो जाता जैसे बहानों के पीछे लोग अपनी नाकामयाबी छुपाने की कोशिश करते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने मजबूत इरादों और अटूट हौसलों के बल पर दुनिया जीतने का माद्दा रखते हैं। आज की कहानी ऐसी ही 2 शख्सियतों की है जिनके बारे में सुन आप भी कहेंगे, वाह क्या बात है!

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आंखों से 100% ब्लाइंड, दोनों को नियुक्ति पत्र
आज की कहानी तसव्वर अली और मनीषा कुमारी की है। भले ही यह दोनों अलग-अलग शहरों के रहने वाले हैं, लेकिन दोनों के इरादे मजबूत और अटूट हैं। जीवन में चुनौतियां लगभग एक जैसी हैं। दोनो ने संघर्षों से लड़ कर खुद को साबित किया है। यह कहानी इलाहाबाद के रहने वाले 38 साल के तसव्वर अली और दिल्ली उत्तम नगर ईस्ट की रहने वाली 30 वर्षीय मनीषा कुमारी की है। दोनों में एक समानता है कि दोनों ही देख नहीं सकते, आंखों से 100% ब्लाइंड है। लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से आगरा के सूरसदन में रोजगार मेले में दोनों लोगों को आज नियुक्ति पत्र मिला।

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तीन बहने भी उन्ही की तरह नेत्रहीन
इलाहाबाद के रहने वाले तसव्वर अली खान 38 साल के हैं। अब वे आगरा रेलवे DRM ऑफिस में पर्सनल डिविजन सीनियर क्लर्क कम टाइपिस्ट के पद पर कार्यरत है। लेकिन उनके संघर्षों की कहानी हैरान कर देने वाली है। जब वह 2005 में 12वीं क्लास की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनकी आंखों में कुछ प्रॉब्लम हुई। देश के अलग-अलग अस्पतालों में इलाज करवाया, एम्स तक गए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। आखिर में तसव्वर की आंखों की रोशनी पूरी तरीके से चली गई। तसव्वर की 6 बहने हैं, इन बहनों में तीन बहने उन्हीं की तरह बिल्कुल अंधी हैं। पिता का 2002 में पहले ही स्वर्गवास हो चुका है। घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है।

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घर में कोई कमाने वाला नहीं, तसव्वर बने रेलवे में सीनियर क्लर्क
जब आंखों में समस्या होना शुरू हुई तो पढ़ाई छूट गई। इसके बाद उन्होंने इंदौर के एक फोटो स्टूडियो में एडिटिंग का काम किया। आंखों की समस्या ने यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। इस नौकरी से भी उन्हें हाथ धोना पड़ा। लोग ताने मारते थे, कहते थे कि अब वे किसी काम के नहीं है। लेकिन तसव्वर ने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उन्होंने कोशिश जारी रखी और अब वह रेलवे में सीनियर क्लर्क/ टाइपिस्ट हैं।
रोजगार मेले में आज उन्हें नियुक्ति पत्र मिला है। तसव्वर कहते हैं कि मुझे इस समाज में एक एग्जांपल सेट करना है कि अगर कोई दिव्यांग हो जाता है तो उसे समाज ताने मारता है और घर बिठा देता है। मैं समाज में एक एग्जांपल सेट करना चाहता हूं कि अपने बच्चों को आगे बढ़ाइए, मुश्किल हालात में उनका हौसला बढ़ाइए। उन्हें ताने मत मारिए वह भी आगे बहुत कुछ कर सकते हैं।

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दिमागी बुखार ने छीनी उनकी आंखों की रोशनी
दूसरी कहानी 30 बर्षीय मनीषा कुमारी के संघर्षों से जुड़ी हुई है। मनीषा कुमारी उत्तम नगर ईस्ट दिल्ली की रहने वाली हैं। पिता उपेंद्र सिंह मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं। मां हाउसवाइफ है और तीन बहनों में वह दूसरे नंबर की हैं। एक छोटा भाई है जो 12th की पढ़ाई कर रहा है।
बात 2007 की है जब मनीषा नाइंथ क्लास में पढ़ रही थी कि तभी एक दिमागी बुखार ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली। मनीषा ने अपनी आंखों का इलाज देश के कई हॉस्पिटलों में करवाया। दिल्ली एम्स गई, लेकिन उनकी आंखों की रोशनी वापस नहीं लौट सकी। आंखों की रोशनी जाने के बाद मनीषा टूट गईं थी, लेकिन मनीषा ने हार नहीं मानी।

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    बनी आगरा DRM ऑफिस में सीनियर क्लर्क
    मनीषा मेहनत करती रही और आज आगरा DRM ऑफिस में सीनियर क्लर्क टाइपिस्ट के पद पर तैनात हैं। मनीषा कुमारी कहती हैं कि अब उनके परिवार की स्थिति ठीक हो जाएगी। मैं आंखों से अंधी हूं तो क्या हुआ ? लेकिन अब अपने घर का चिराग बनूंगी। पिता का इलाज कराऊंगी, भाई का इलाज कराऊंगी। आज उन्हें बेहद खुशी है और वह देश के प्रधानमंत्री का धन्यवाद करती है कि उन्होंने इतनी सारी वैकेंसी निकाली जिसमें उनका चयन हुआ।

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