जेल से चुनाव, जातिगत रैली पर क्‍या सोच रहा थिंक टैंक?

सुप्रीम कोर्ट ने जेल से चुनाव लड़ने वालों पर सख्‍त रोक लगा दी है। इससे ठीक पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी में जातिगत रैलियों पर प्रतिबंध लगाया। इन प्रतिबंधों के बाद से नेताओं के स्‍वर बदल गये, लेकिन पार्टियों के थिंक टैंक इस बारे में सोचने में जुट गये हैं, कि कैसे इन नियमों का तोड़ निकाला जाये, क्‍योंकि अगर इन आदेशों पर चुनाव आयोग ने अमल कर दिया, तो कई सीटों से हाथ धोना पड़ सकता है।

हमने इस संबंध में कुछ नेताओं से बात की, खुले तौर पर सभी के सुर वैसे ही थे, जैसे आपने टीवी चैनलों पर सुने, "सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों का हम स्‍वागत करते हैं और जाति के आधार पर राजनीतिक करने वालों को इससे सबक मिलेगा।" ऐसे बयान आपको बसपा, सपा, भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की जुबान से सुनने को जरूर मिले होंगे, लेकिन खास बात यह है कि पार्टियों के आलाकमान नेताओं ने अब अपने थिंक टैंक को इसका तोड़ निकालने को कहा है।

इस संबंध में भाजपा की अंत्‍योदय समिति के नेता ने कहा कि इससे तो भ्रष्‍टाचार और बढ़ेगा। जेल में पड़े नेताओं पर रोक लगने के बाद अब वो अपने रिश्‍तेदारों को बाहुबलि बनाने के प्रयास करेंगे और अपनी सीट पर अपने बेटे, दामाद, भाई आदि को खड़ा करने के प्रयास जरूर करेंगे। और अगर वो चुनाव जीते तो सामने काम वो करेंगे, दिशा-निर्देशन दद्दा का होगा।

ऐसे निकलेगा जातिगत रैलियों का तोड़

जातिगत रैलियों के बारे में हमने बसपा के एक नेता से बात की, तो वो हंसे और बोले पहले पार्टियां जाति व समुदाय के मठाधीशों को आमंत्रित करती थीं, अब जाति व समुदाय के संगठन पार्टी के नेताओं को आमंत्रित करेंगे। तो कान दाहिने की जगह बायें हाथ से पकड़ा जायेगा बस। इस पर भाजपा की अंत्‍योदय समिति के सदस्य ने कहा, "लगभग हर समुदाय के संगठन यूपी में मौजूद हैं। उदाहरण के तौर पर- कायस्‍थ महासभा, अखिल भारतीय ब्राहमण महासभा, कुर्मी समाज, दलित महासभा, वैश्‍य महासंघ, आदि। कोर्ट पार्टी को रोक सकती है, लेकिन किसी भी ऐसे संगठन को रैली या महासम्‍मेलन करने से नहीं रोक सकती, क्‍यांकि संविधान ने खुद ऐसे संगठन बनाने की अनुमति दी है।"

भाजपा नेता ने कहा, "जाहिर सी बात है अब जातिगत राजनीति करने वाली इन संगठनों के महासम्‍मेलनों को धन मुहैया करायेंगी, और ये संगठन उस पैसे के ऐवज में पार्टी के शीर्ष नेताओं को आमंत्रित करेंगे। इससे विभिन्‍न समुदायों के तथाकथित मठाधीशों का कमाई करने का जरिया भी बढ़ जायेगा, क्‍योंकि यहां राजनीतिक पार्टियों की मजबूरी होगी।"

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