'तापमान बढ़ने का कारण ग्लोबल वार्मिंग नहीं'
बैंगलोर। आज 'विश्व पर्यावरण दिवस' है। एक ऐसा दिन जब हम पूरी दुनिया के लिए सोंचते हैं क्योंकि भले ही हम राष्ट्र की सीमाओं में बंधे हो पर प्रकृति के लिए हम सभी एक जैसे ही हैं। इस समय दुनिया के अलग अलग देश निरंतर मौसम परिवर्तन के कारण आने वाले परिणामों का सामना कर रहे हैं। जिसके कारण अमेरिका और जर्मनी जैसे देश भी बाढ़ और तूफान का सामना कर रहे हैं।
क्या यह वाकई ग्लोबल वार्मिंम के कारण हो रहा है? अगर इन दिनों उत्तर भारत भीषण गर्मी का सामना कर रहा है तो क्या इसका कारण ग्लोबल वार्मिंग है। इस बारे में लखनऊ विश्वविद्यालय के विभाग 'एडवांस लर्निंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट आफ जियोलॉजी' के प्रोफेसर ध्रुवसेन सिंह ने 'वनइंडिया' के वरिष्ठ संपादक अजय मोहन वर्मा को बताया कि इन दिनों अधिक गर्मी पड़ने का कारण ग्लोबल वार्मिंग नही बल्कि मौसम चक्र है। इसी मौसम चक्र के कारण कभी मानसून देर से आता है तो कभी जल्दी या कभी मानसून कम ही रहता है। मौसम बदलाव के लिए ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेदार नहीं हैं।
अजय मोहन जी के पूछने पर कि 'ग्लोबल वार्मिंग' का क्या असर पड़ता है के बारे में प्रोफेसर ध्रुवसेन ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण जो ग्लेशियर हैं वही पिघलते हैं, जिससे कि समुद्र का जल स्तर प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है, लेकिन यह वृद्धि कुछ मिलीमीटर में ही होती है। ऐसा कहना है गलत है कि समुद्र तटीय स्थान जल्द ही जलमग्न हो जायेंगे। प्रोफेसर सिंह का कहना है कि अभी समुद्र तटीय स्थानों को कोई खतरा नहीं है ऐसा होने में अभी कई हजार साल का वक्त लगेगा। उन्होने ग्लोबल वार्मिंग के लिए प्रदूषण को जिम्मेदार ठहराया जिससे कि पृथ्वी की ओजोन परत लगातार कमजोर हो रही है, जिससे कि सूर्य की किरणें सीधे ग्लेशियरों पर पड़ती है और वह पिघल जाते हैं।
प्रोफेसर ध्रुवसेन ने कहा है कि मौसम में होने वाले बदलाव के लिए ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेदार नहीं है, यह एक मौसम चक्र है जो कि घूम फिरकर आता रहता है।













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