आखिर क्यों आतंकी हमलों पर शोक जताती है सरकार ?
बैंगलोर। पहले हैदराबाद में दोहरा धमाका फिर इसके बाद श्रीनगर के एक पुलिस पब्लिक स्कूल में हमला। सरकार द्वारा एक जैसी प्रतिक्रिया और किसी भी बड़े कदम का न उठाया जाना। क्या इससे ये नहीं लगता है कि सरकार ने आतंकी हमलों को लेकर यह सोंच बना ली है कि इस तरह के हमले रोंके नहीं जा सकते हैं। हर हमले के बाद केंद्र सरकार के नेताओं के बयान भी एक जैसे ही लगते हैं। आतंकी वारदात के बाद उसकी सीबीआई जांच की मांग करना भी एक फैशन सा हो गया है।
श्रीनगर के स्कूल में हुए हमलों की जिम्मेदारी हिजबुल मुजाहिदीन ने ले ली है। बताया जाता है कि पिछली 15 फरवरी को गुलाम कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में हुई अलगाव वादी संगठनों के नेता, आतंकी संगठनो के नेताओं और आईएसआई के बड़े अधिकारियों की हुई बैठक हुई थी। जिसमें आतंकियों ने भारत के मुख्य शहरों को और प्रदेशों को निशाना बनाने की बात की थी जिसमें से दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, गुजरात, बेंगलूर, आंध्र प्रदेश व यूपी है।
यहां बेहद अफसोसजनक बात ये है कि सरकार ने इन हमलों को रोंकने के लिए अभी तक आतंकवाद के खिलाफ कोई कारगर रणनीति नहीं बनाई है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या देश के नेताओं के लिए राजनीति करना ही एकमात्र मकसद है। देश की सुरक्षा और संप्रभुता उनके लिए कोई मायने नहीं रखती है। जिसके परिणाम स्वरूप आम जनता के मन में यही सवाल बार बार आता है कि आतंकी हमलों को भारत सरकार कब गंभीरता से लेगी।
आतंकी हमलों के बारे में सरकार क्या सोंचती है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने 2011 में मुंबई में हुए बम धमाकों के संदर्भ में कहा था कि हर बार बम ब्लास्ट रोंके नहीं जा सकते हैं अगर पिछले दस वर्षों की बात की जाये तो अब तक चालीस से भी ज्यादा बम धमाके हो चुके हैं। सच है कि यह सब रोंकना बेहद मुश्किल है पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत बनाकर इन घटनाओं को कम तो किया ही जा सकता है। क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में होने वाली आतंकी वारदातें सरकार की इच्छाशक्ति पर भी सवाल उठाती हैं। इस संबंध में भारत सरकार अमेरिका से सीख ले सकती है जहां 9/11 की घटना के बाद कोई आतंकी हमला नहीं हुआ।
हाल ही में संसद पर हमले के आरोपी अफजल को फांसी दिये जाने के बाद हालात की संवेदनशीलता को देखते हुए भारत में सुरक्षा व्यवस्था और बेहतर किये जाने की जरूरत है। जिससे कि होने वाली दुर्घटनाओं पर नजर रखी जा सके और इन्हें रोंकने की कोशिश तो की ही जा सके।













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