ज्योतिरादित्य की सक्रियता से कांग्रेस नेताओं में बेचैनी
भोपाल। मध्य प्रदेश के कांग्रेस नेताओं में इन दिनों अजीब सी बेचैनी है। वे हैरान और परेशान भी हैं कि आखिर अपने दर्द को किसे बताएं, क्योंकि उनके सपनों के बिखरने का डर उन्हें सताने लगा है। यह बेचैनी और हैरानी विरोधी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने नहीं बल्कि उन्हीं के दल के नेता और केंद्रीय राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की सक्रियता ने बढ़ाई है।
राजनीति में सभी सपने देखते हैं। कुछ इसी तरह राज्य में कांग्रेस नेता भी सपनों को बुनने और गूंथने में लगे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इसी वर्ष राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, और कांग्रेस को नतीजे अपने पक्ष में आने के आसार जो लग रहे हैं। बस यही आस सारी समस्या की जड़ बन गई है।

कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में लगातार मिली दूसरी हार के बाद प्रदेशाध्यक्ष की कमान सुरेश पचौरी से लेकर कांतिलाल भूरिया तक को सौंपी और जमुना देवी का निधन होने पर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद अजय सिंह को सौंपा। इस बदलाव के बाद से राज्य में नए समीकरण बनने की सुगबुगाहट तेज हो गई।
कांग्रेस की परंपरा चुनाव में बहुमत मिलने के बाद नेता के चयन की जिम्मेदारी पार्टी हाईकमान पर छोड़े जाने की रही है। यही कारण है कि तमाम नेता बहुमत मिलने की स्थिति में अपनी-अपनी तरह से अपना भला होने की उम्मीद संजोए बैठे हैं। पर अचानक पिछले कुछ अरसे से केंद्रीय राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की बढ़ी सक्रियता ने संपने संजोने वालों को बेचैन कर दिया है।
सिंधिया पिछले कुछ अरसे में निमाड़ और मालवा अंचल के दो दौरे कर चुके हैं। सिंधिया इन दौरों में पार्टी के किसी बड़े नेता को अपने साथ नहीं ले गए। उनका यह दौरा राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के तहत था। चर्चा है कि प्रदेशाध्यक्ष भूरिया ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हुई बैठक में इस बात की शिकायत भी की थी कि सिंधिया उन्हें दौरे के समय अपने साथ नहीं ले गए। लगता है कि भूरिया की इस शिकायत को ज्यादा महत्व नहीं मिला। यही कारण है कि सिंधिया ने एक बार फिर अकेले खरगोन व खंडवा का दौरा किया।
पार्टी के कई नेता अपनी बेचैनी को छुपाए हुए हैं तो प्रदेशाध्यक्ष भूरिया इसे जाहिर करने से नहीं चूके। उनका कहना है कि सिंधिया किस तरह की जिम्मेदारी चाहते हैं, पार्टी ने उन्हें मंत्री बनाया है। वे ही बताएं कि उन्हें और क्या जिम्मेदारी चाहिए। सिंधिया को लेकर भूरिया सहित अन्य नेताओं में बेचैनी यूं ही नहीं है, क्योंकि सिंधिया इससे पहले ग्वालियर-चंबल संभाग के बाहर कभी भी ज्यादा सक्रिय नहीं हुए हैं। इतना ही नहीं सिंधिया की बदली कार्यशैली भी पार्टी नेताओं को सशंकित कर देने वाली है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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