व्हार्टन में बौद्धिक तालिबान ने किया नरेंद्र मोदी पर हमला
अहमदाबाद। तीन मार्च की शाम को भारत पर एक अलग तरह का आतंकी हमला हुआ। यह हमला किया है बौद्धिक तालिबान ने, जो व्हार्टन में है। व्हार्टन इंडिया इक्नॉमिक फोरम में अचानक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का विशेष भाषण रद्द कर दिया गया। इस हमले के पीछे किसका हाथ हो सकता है, यह खोजना बहुत आसान है। दरअसल ऐसा होने की भविष्यवाणी एक रिपोर्ट में पहले ही हो चुकी थी।
सच पूछिए तो यह हमला बहुत बड़ा नहीं है, और न ही अंतिम हमला है। इसमें कोई शक नहीं कि व्हार्टन जैसे कई अन्य संगठन आगे भी यह काम कर सकते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर इसके पीछे कौन मास्टरमाइंड है। तो हम आपको बताना चाहेंगे कि इसके पीछे तालिबानी दिमाग है पांच-सितारा एक्टिविस्ट, दिखावा करने वाले बुद्धिजीवी और दिखावा करने वाले सेक्युलरिस्ट, जो अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिये मोदी को कोसना जरूरी समझते हैं।
सच पूछिए तो पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के संस्थान व्हार्टन की ओर से जब ऐसा फैसला लिया गया, तो मैं चौंक गया। मुझे लगा कि ऐसी सोच रखने वाले संस्थान को शीर्ष पर रहने का कोई अधिकार नहीं। जो संस्थान फ्रीडम ऑफ स्पीच यानी बोलने के अधिकार को बढ़ावा नहीं दे सकता, उसे हम विश्व के शीर्ष संस्थानों में कैसे गिनें।
चलिये अब हम आपको रू-ब-रू कराते हैं उस व्यक्ति से जिनकी इसमें भूमिका रही। वो हैं अनिया लूंबा। इन्होंने सबसे पहले कहा कि मोदी को व्हार्टन में इनवाइट नहीं किया जाये। जेएनयू में अपना लंबा करियर व्यतीत करने वाली लूंबा ने तब भी विरोध जताया था, जब मोदी श्रीराम कॉलेज में भाषण देने जा रहे थे। लेकिन मोदी का भाषण हुआ और उससे लाखों युवा प्रभावित हुए। इससे पहले भी कई बार वो विरोध कर चुकी हैं। लेकिन उनके विरोध से ऐसा प्रतीत होता है, कि जैसे मोदी का विरोध करने से ही उनकी रोजी-रोटी चलती है।
खैर बात यहां हो रही है फ्रीडम ऑफ स्पीच की। तो दुनिया का हर व्यक्ति और संगठन आजाद है, वो चाहे मोदी की बातों से सहमत हों या नहीं। उनकी राजनीतिक सोच को वो मानें या नहीं मानें। लेकिन किसी के बोलने के अधिकार को छीनना शायद अच्छा नहीं। खास बात यह है कि मोदी के भाषण को रद्द किये जाने के बाद से गौतम अदानी और सुरेश प्रभु ने भी अपनी प्रतिभागिता को रद्द कर दिया। मुझे आश्चर्य है कि मॉन्टेक सिंह अहलूवालिया, दिलिप चेरियान और मिलिंद देवड़ा को कौन रोक रहा है अपना नाम वापस लेने से। शबाना आज़मी और जावेद अख्तर भी उस फोरम में हैं। उन्हें अपना नाम वापस लेने से कौन रोक रहा है। क्या देश के गर्व से बढ़कर है खुद की इमेज को बनाना? मैं कलर्स चैनल के मालिक राघव बहल से अपील करूंगा कि वो अपनी स्पॉनसरशिप वापस ले लें।
इस पूरे प्रकरण से मेरे दिमाग में दो सवाल आये हैं। पहला कि इस कार्यक्रम में इनक्रेडेबल इंडिया को सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन जब भारत के किसी एक भारतीय अथवा एक राज्य के मुख्यमंत्री को बोलने से रोक दिया गया, तो भारत सरकार अपना समर्थन जारी क्यों रखे हुए है? दूसरी बात यह कि अंग्रेजी चैनलों द्वारा इस मामले को बढ़ा-चढ़ा कर दुनिया को बताना। हम व्हार्टन पर तो आरोप लगा रहे हैं, लेकिन उन लोगों का क्या जो अपने हैं? क्या उनके लिये देश के सम्मान से बढ़कर सब कुछ है?
(यह लेख लेखक किशोर त्रिवेदी के अंग्रेजी में प्रकाशित लेख का सार है।)













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