कन्या भ्रूण हत्या रोकने जैसे सकारात्मक काम करती हैं खाप पंचायतें

अदालत ने कई मामलों में उनसे बातचीत की वहीं उनके द्वारा महिलाओं के लिए ड्रेस कोड निर्धारित करने और मोबाईल न रखने का आदेश जारी करने पर पंचायतों की आलोचना की। न्यायमूर्ति आफताब आलम व रंजना प्रकाश देसाई की पीठ ने कहा कि इस प्रकार के आदेश व्यक्ति के जीने के मौलिक अधिकारों का हनन हैं और साथ ही कानून का उल्लंघन भी करते हैं। कोई भी गैर कानूनी संस्था किसी को अपने आदेशों को मानने के लिए मजबूर नहीं सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर खाप पंचायतों से 25 फरवरी तक जवाब भी मांगा है। अदालत ने पिछली सुनवाई में उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया था। पंचायतों का यह कहना था कि उनके बारे में हमेशा तथ्यों को तोड़मरोड़कर और उन्हें तालिबानी रूप में पेश किया जाता है।
कोर्ट एक एनजीओ की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें खाप पंचायतों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि यह पंचायतें एक ही गोत्र में विवाह करने के कारण हत्या कर देती हैं साथ ही प्रेमी युगलों से गलत व्यवहार भी करती है। याचिका में खाप पंचायतों पर पर ऑनर किलिंग का आरोप भी लगाया गया था। जिस पर उत्तर प्रदेश और हरियाणा के शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने कहा कि खाप पंचायतें सीधे तौर पर कभी भी आनर किलिंग में शामिल नहीं होती है लेकिन ऐसा माहौल जरूर पैदा करती हैं।
एनजीओ ने आरोप लगाया था कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में आनर किलिंग के मामले बढ़ रहे हैं लेकिन सरकारें वोट कट जाने के डर से इन खाप पंचायतों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करती हैं।
परिवारिक मामलों में खाप पंचायतों द्वारा निर्णय देने पर उनका विरोध करते हुए सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जय सिंह ने कहा कि यह पंचायतें निर्णय सुनाने वाली संस्थाएं होने का दावा कर रही हैं और पुलिस इन्हें रोकने में नाकाम रही है।












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