Exclusive: भाजपा की डबल हैट्रिक, तो कांग्रेस की 'तेरहवीं'
अहमदाबाद। एक हिन्दी फिल्म के गीत की पंक्ति ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' गुजरात कांग्रेस पर सटीक बैठती है। अहमदाबाद में पालडी स्थितत गुजरात प्रदेश कांग्रेस समिति (जीपीसीसी) मुख्यालय पर अक्सर आतिशबाजी और मिठाइयां बँटती हैं, तो इस गीत की पंक्ति बरबस ही याद आ जाती हैं। किसी चुनावी जीत को लेकर इस प्रकार की आतिशबाजी जीपीसीसी मुख्यालय पर आखिरी बार 9 दिसम्बर, 2009 को हुई थी। शायद आज तो कांग्रेस वालों को भी याद नहीं होगा कि वह आतिशबाजी क्यों की गई थी तथा मिठाइयाँ क्यों बँटी थी। हम याद दिलाए देते हैं। 9 दिसम्बर, 2009 सोमवार वह दिन था जब देश के तीन राज्यों दिल्ली, राजस्थान और मिजोरम विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिला था और जीपीसीसी मुख्यालय रोशन हो गया था।
परंतु आखिर यहाँ कब बजेगी शहनाई? कांग्रेस नेताओं को यह दिन याद नहीं होगा। दूसरों, भले ही वह फिर अपनी ही पार्टी के नेता हों, की जीत पर जश्न मनाने वाले कांग्रेस नेताओं के लिए यह दुर्भाग्य कहलाएगा या फिर सबक कि उन्हें गुजरात में जीत नसीब नहीं होती और जश्न मनाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।
कांग्रेस को गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 में 61 सीटें मिली हैं और इस तरह फिर एक बार उसे गुजरात में हार का सामना करना पड़ा है, लेकिन अब हार की चर्चा करते-करते लोग और यहाँ तक कि निराशा में डूबे कांग्रेस के नेता भी यह भूल ही गए हैं कि गुजरात में उनकी हार का यह सिलसिला छोटा नहीं, बहुत लम्बा होता जा रहा है।

हिन्दी में एक कहावत है किसी के मुकाबले उन्नीस साबित होना। मतलब एक को 40 में से 21 और दूसरे को 19 अंक मिले हैं। यही हाल गुजरात कांग्रेस का है। यदि उंगली पर वास्तव में गणना की जाए, तो पता चलता है कि गुजरात में भाजपा से दो-दो हाथ करते हुए कांग्रेस लोकसभा-विधानसभा चुनावों में लगातार तेरहवीं बार उन्नीस साबित हुई है, तो दूसरी ओर विधानसभा के मामले में नरेन्द्र मोदी ने तीसरी बार जीत कर हैट्रिक दर्ज कराई है, तो भाजपा इस मामले में डबल हैट्रिक दर्ज करा चुकी है।
1989 से उल्टी गिनती : 24 से 3
दरअसल कांग्रेस की उल्टी गिनती शुरू हुई 1989 से। लालकृष्ण आडवाणी की ओर से निकाली गई राम रथयात्रा ने देश के अनेक हिस्सों में हिन्दुत्व की लहर दौड़ाई और गुजरात मानो इस लहर का नेतृत्व कर रहा था। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद व्याप्त सहानुभूति लहर के दौरान हुए लोकसभा चुनाव में गुजरात में कांग्रेस को 26 में से 24 सीटें मिली थीं। भाजपा की ओर से एकमात्र ए. के. पटेल मेहसाणा से विजयी रही थे, जबकि एक सीट जनता पार्टी को एच. एम. पटेल की साबरकांठा सीट पर जीत से मिली थी। अतः कहा जा सकता है कि 1984 में कांग्रेस अर्श पर थी, तो 1985 में भी जारी इंदिरा लहर के बीच हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 182 में से रिकॉर्ड 149 सीटें हासिल कीं, लेकिन उसके बाद चली राम लहर में कांग्रेस की नाँव जो डाँवाडोल हुई, तो आज तक नहीं संभली। राम लहर के बीच 1989 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 24 से सिमट कर 3 पर आ गई। इस चुनाव में भाजपा (12) व जनता दल (11) गठबंधन को 23 सीटें हासिल हुईं। कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया।
और 149 से 33
गुजरात पूरी तरह राम लहर के रंग में रंग चुका था और इसी राम लहर के साये में 1990 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ऐतिहासिक शिकस्त का सामना करना पड़ा। जिस कांग्रेस ने इंदिरा लहर में रिकॉर्ड 149 सीटें जीती थीं, पाँच साल बाद ही राम लहर में वह कांग्रेस अर्श से फर्श पर आते हुए रिकॉर्ड 33 सीटों पर सिमट गई। भाजपा (67) तथा जनता दल (70) गठबंधन को बहुमत मिला। इसके साथ ही गठबंधन सरकार के साथ ही सही, लेकिन पहली बार गुजरात में भाजपा सत्ता में आई। यह उसकी पहली चुनावी सफलता रही।
चिमनभाई का साथ भी न उबार सका
राम लहर ने राष्ट्रीय राजनीति में भी उथल-पुथल मचाई और बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया और दो ही साल के भीतर 1991 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव आन पड़े। राम लहर पर सवार भाजपा अब जनता दल से किनारा कर चुकी थी और उसने अकेले दम पर चुनाव लड़ा, तो चिमनभाई पटेल कांग्रेस का दामन थाम चुके थे। इस चुनाव में चिमनभाई का साथ लेने के बावजूद जनता दल का वोट बैंक कांग्रेस को नहीं मिला और भाजपा को 26 में से 20 सीटें हासिल हुईं, तो कांग्रेस 5 सीट लेकर पिछले चुनाव के मुकाबले दो सीटों का इजाफा कर सकी। इस प्रकार कांग्रेस लगातार तीसरे चुनाव में भाजपा से उन्नीस रही।
पहली बार भगवा लहराया
गुजरात के जबर्दश्त कांग्रेस विरोध के बावजूद केन्द्र में तो नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बन गई, लेकिन गुजरात में भाजपा के प्रति लहर और कांग्रेस के खिलाफ लहर का शमन नहीं हुआ और 1995 में गुजरात की जनता ने कांग्रेस को पूरी तरह नकार दिया। 1990 में भाजपा-जनता दल गठबंधन को बहुमत देने के बावजूद राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हुए गुजरात ने इस चुनाव में पहली बार भाजपा को 121 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत दिया। यह भाजपा की विधानसभा चुनावों में दूसरी जीत थी, तो कांग्रेस लगातार चौथी बार भाजपा से उन्नीस साबित हुई। इस चुनाव में उसे पिछली बार से 11 सीटें ज्यादा 45 सीटें मिलीं। केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री बने।
कांग्रेस संभली, पर उन्नीस ही रही
केन्द्र की नरसिंह राव सरकार का कार्यकाल पूरा हुआ और 1996 में लोकसभा चुनाव आए। इस चुनाव में राज्य की केशुभाई पटेल सरकार की कसौटी होनी थी और वे इस कसौटी पर खरे नहीं उतरे। राज्य में कांग्रेस को 10 सीटें देकर भाजपा और केशुभाई सरकार के कामकाज को लेकर सवाल खड़े कर दिए। हालाँकि कांग्रेस इस चुनाव में पिछले चुनाव से दोहरी सीटें जीत कर संभली जरूर, लेकिन भाजपा की 16 सीटों के आगे वह उन्नीस ही रही।
राजनीतिक अस्थिरता का कोपभाजन
1998 गुजरात और देश के लिए राजनीतिक अस्थिरता का वर्ष था। 1996 में खंडित जनादेश के चलते केन्द्र में पहले तेरह दिन चली वाजपेयी सरकार, फिर कांग्रेस समर्थित देवगौड़ा और फिर गुजराल सरकार का नाटक चला, तो गुजरात में शंकरसिंह वाघेला के विद्रोह के चलते दो तिहाई बहुमत वाली भाजपा सरकार में भी केन्द्र की तर्ज पर नाटक चला। केशुभाई पटेल को हटा कर सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री बनाया गया। फिर वाघेला ने भाजपा विधायकों को तोड़ कर कांग्रेस के समर्थन से अपनी सरकार बनाई। फिर कांग्रेस के विरोध के चलते वाघेला की जगह दिलीप परीख को मुख्यमंत्री बनाया गया।
इस प्रकार केन्द्र और गुजरात में जबर्दश्त राजनीतिक अस्थिरता की उपज के रूप में 1998 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हुए। इन चुनावों में भाजपा ने विधानसभा की 117 सीटें जीत कर हैट्रिक बनाई, तो कांग्रेस मात्र 53 सीटें हासिल हुईं। केशुभाई पुनः मुख्यमंत्री बने। तीसरी शक्ति के रूप में वाघेला की राष्ट्रीय जनता पार्टी को मात्र 4 सीटें मिलीं और यहाँ तक कि मुख्यमंत्री दिलीप परीख स्वयं हार गए। बात लोकसभा की करें, तो कांग्रेस को मात्र तीन सीटें घट कर 7 सीटें मिलीं, तो भाजपा को 3 सीटों के फायदे के साथ 19 सीटें मिलीं। इस प्रकार कांग्रेस पाँचवीं बार उन्नीस साबित हुई।
वाजपेयी लहर का वार
फिर आए 1999 के लोकसभा चुनाव। इस बार राम लहर थोड़ी ठंडी पड़ चुकी थी और तेरह दिन तथा तेरह माह ही सरकार चला सके अटल बिहारी वाजपेयी को सत्ता पर बैठाने का जुनून गुजरात में दिखाई दिया। वाजपेयी लहर का यह वार कांग्रेस सह न सकी। इस चुनाव में भी भाजपा को पिछले चुनाव के मुकाबले एक ज्यादा यानी 20 सीटें मिलीं, तो कांग्रेस को एक सीट के नुकसान के साथ 6 सीटें हासिल हुईं। इस प्रकार यह चुनाव कांग्रेस की 8वीं उन्नीसी साबित हुए।
अब मोदी का प्रहार
केशुभाई पटेल सरकार की कमजोरियाँ कांग्रेस की शक्ति बनतीं, उससे पहले भाजपा हाईकमान संभल गया और उसने 2003 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बना दिया। 7 अक्टूबर, 2001 को केशुभाई की जगह मुख्यमंत्री बने मोदी इतनी तेजी से छाने लगे कि कांग्रेस को कुछ सूझ ही नहीं रहा था। मोदी ने 26 फरवरी, 2002 को अपने जीवन का पहला उप चुनाव राजकोट-2 विधानसभा क्षेत्र से जीता और अगले ही दिन राज्य में गोधरा कांड हो गया। फिर जो दंगों का दौर चला और उसके बाद हुआ साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किसी से छिपा नहीं है। मोदी ने भी इस हालात का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए विधानसभा को समय से पहले भंग कर दिया और दिसम्बर-2002 में चुनाव आ गए। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की आंधी में कांग्रेस होश फाक्ता हो गए। भाजपा को 127 सीटें दिला कर मोदी पहली बार जन-निर्वाचित मुख्यमंत्री बने और कांग्रेस की सीटें 51 तक ही रुक गईं। यह भाजपा की विधानसभा चुनाव में चौथी और मोदी की पहली जीत थी, तो कांग्रेस की 9वीं उन्नीसी थी।
शक्ति बढ़ी, पर दिशा न मिली
2004 में लोकसभा चुनाव आए। राष्ट्रीय स्तर पर वाजपेयी सरकार की इंडिया शाइनिंग की चकाचौंध और राज्य में मोदी की लोकप्रियता कसौटी पर थी, लेकिन जनता ने इन दोनों पर सवालिया निशान लगाते हए भाजपा को 6 सीटों के नुकसान के साथ 14 पर ला खड़ा किया, तो कांग्रेस 6 के इजाफे के साथ 12 सीटों पर पहुँच गई। लगने लगा था कि अब गुजरात में भाजपा और मोदी की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। हालाँकि इस चुनाव में भी कांग्रेस भाजपा के मुकाबले उन्नीस ही रही। गुजरात में बढ़ी शक्ति के बीच केन्द्र में वाजपेयी सरकार का पतन और मनमोहन सरकार का उदय भी हुआ, लेकिन इस बढ़ी हुई शक्ति को दिशा की जरूरत थी, जो शायद कांग्रेस उपलब्ध नहीं करा सकी।
फिर बढ़ा मोदी का कद
लोकसभा चुनाव 2004 में मोदी के कमजोर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस को लग रहा था कि वह विधानसभा चनाव 2007 में मोदी को शिकस्त दे देगी। इस बार केन्द्र में सत्तानशीन उसकी सरकार का भी समर्थन था, लेकिन 2004 के कमजोर प्रदर्शन से सीख लेते हुए मोदी मजबूत होकर उभरे। इस चुनाव में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और विकास के मिलेजुले समर्थन ने मोदी को लगातार दूसरी बार बहुमत दिलाया। भाजपा को इस चुनाव में 117 सीटें मिलीं, तो कांग्रेस को 57 सीटों से संतोष करना पड़ा। यह कांग्रेस की 11वीं उन्नीसी थी, तो भाजपा की विधानसभा चुनाव में लगातार पाँचवीं जीत थी।
एक और मौका मिला
2007 में मोदी के समक्ष मुँह की खा चुकी कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में जनता ने संभलने का फिर मौका दिया। इस चुनाव में मुकाबला मोदी की लोकप्रियता और मनमोहन सिंह की स्वीकार्यता के बीच था। चुनावी घमासान के बाद भाजपा की सीटें 2004 के मुकाबले एक बढ़ कर 15 तो हुई, लेकिन यह मोदी के बढ़ते कद के आगे कम था, तो कांग्रेस एक सीट घट कर 11 पर आने के बावजूद इस मुगालते में रही कि राज्य में मोदी इतने लोकप्रिय नहीं रहे कि वे भाजपा को 26 में से 20 सीटें दिला सकें। भाजपा को 15 सीट ही देकर जनता ने कांग्रेस को संभलने का एक और मौका दिया, देश में भी मनमोहन सरकार की वापसी हुई। इस प्रकार यह चुनाव कांग्रेस के लिए 12वीं बार भाजपा के मुकाबले उन्नीस साबित हुए।
मोदी की हैट्रिक, कांग्रेस की 13वीं उन्नीसी
आखिर 2012 का गदर आ ही गया। कांग्रेस को इस बार लग रहा था कि मोदी के खिलाफ राज्य में व्यापक असंतोष है और इस बार वह मोदी रूपी किले को तोड़ने में सफल रहेगी, लेकिन लगातार तीसरी बार कांग्रेस मोदी के समक्ष बिना नेतृत्व के उतरी। लोकसभा में तो जनता को केन्द्रीय स्तर पर कांग्रेस का नेतृत्व स्पष्ट रूप से दिखता रहा, लेकिन विधानसभा के मामले में जनता के समक्ष कांग्रेस सक्षम विकल्प नहीं पेश कर सकी और फिर एक बार उसे हार का मुँह देखना पड़ा। इस बार उसकी सीटें 61 के रिकॉर्ड स्तर पर तो पहुँची, लेकिन गुजरात में भाजपा के मुकाबले यह उसकी 13वीं उन्नीसी रही। तो मोदी ने जहाँ हैट्रिक दर्ज की, वहीं भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव में यह छठी जीत के साथ डबल हैट्रिक रही।
| चुनाव | वर्ष | कांग्रेस | भाजपा | अन्य |
| लोकसभा | 1989 | 3 | 12 | 11 |
| विधानसभा | 1990 | 33 | 67 | 72 |
| लोकसभा | 1991 | 5 | 20 | 1 |
| विधानसभा | 1995 | 45 | 121 | 18 |
| लोकसभा | 1996 | 10 | 16 | - |
| लोकसभा | 1998 | 7 | 19 | - |
| विधानसभा | 1998 | 53 | 117 | 12 |
| लोकसभा | 1999 | 6 | 20 | - |
| विधानसभा | 2002 | 51 | 127 | 4 |
| लोकसभा | 2004 | 12 | 14 | - |
| विधानसभा | 2007 | 59 | 117 | 6 |
| लोकसभा | 2009 | 11 | 15 | - |
| विधानसभा | 2012 | 61 | 115 | 6 |
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