मिशन 2014 और मिस्‍टर कंफ्यूज्‍ड राहुल की 10 खामियां

नई दिल्‍ली (वनइंडिया ब्‍यूरो)। कांग्रेस पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी ही पार्टी की कमान संभालेंगे। कांग्रेस प्रवक्‍ता पीसी चाको के इस ऐलान के बाद राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर राहुल की काबीलियत पर चर्चा शुरू हो गई है।

अगर चुनावी बागडोर की बात करें तो राहुल को अब तक जिन-जिन चुनावों की बागडोर सौंपी गई, उनमें से वो एक भी चुनाव में कांग्रेस को जीत नहीं दिला सके। यूथ आईकन के रूप में मैदान में उतरे राहुल बिहार, उत्‍तर प्रदेश, पंजाब और गोवा में अपना सिक्‍का जमाने में विफल रहे। अब बारी है पूरे देश के आम चुनाव की। इन चुनाव में कांग्रेस ने लंबी-चौड़ी टीम बनायी है, जिसमें राहुल गांधी कैप्‍टन हैं। और हां देश ही नहीं बल्कि विदेशी मीडिया भी इन्‍हें मिस्‍टर कंफ्यूज्‍ड के नाम से बुलाने लगा है।

सच पूछिए तो कांग्रेस के इस कैप्‍टन के पास अब यह अंतिम मौका होगा। अगर इस बार कांग्रेस हारी, तो शायद ही कभी राहुल गांधी राजनीति में वापसी कर पायेंगे। यह राहुल गांधी के जीवन का सबसे कठिन इम्‍तहान होगा। इस इम्‍तहान की तैयारियां उन्‍होंने अभी से शुरू कर दी हैं। ऐसे में हम उन्‍हें बताना चाहते हैं कि अगर उन्‍हें यह परीक्षा पास करनी है, तो नीचे दी गईं 10 बातों का खयाल रखना होगा, अन्‍यथा उन्‍हें कड़ी शिकसत मिल सकती है।

और हां पार्टी में बड़ी जिम्‍मेदारी संभालने के लिये भी राहुल गांधी को इन बातों का खयाल रखना होगा-

राहुल अभी बच्‍चे हैं

राहुल अभी बच्‍चे हैं

राहुल गांधी अधिकांश पब्लिक प्‍लेस पर मां सोनिया गांधी के साथ ही दिखाई देते हैं फिर वो चाहे कोई बैठक हो या फिर चुनाव प्रचार। तमाम रैलियों में भी वो अपनी मां के साथ दिखे। इससे यह संदेश जाता है कि राहुल अभी बच्‍चे हैं।

युवा कांग्रेसियों को संभाल नहीं पाये

युवा कांग्रेसियों को संभाल नहीं पाये

राहुल गांधी जहां भी जाते हैं वहां के युवाओं से चर्चा तो करते हैं, लेकिन उस चर्चा के परिणाम कभी नहीं मिलते। वो युवाओं को राजनीति में आने के उपदेश तो देते हैं, लेकिन यूथ कांग्रेस के युवाओं को एक जुट नहीं कर पाते। इसका सबसे बड़ा कारण है संगठन के अंदर चुनाव। यूथ कांग्रेस के अंदर चुनाव कराने से संगठन में गुटबाजी बढ़ गई है। संगठन के अंदर चुनाव का कॉन्‍सेप्‍ट राहुल गांधी का ही है।

यूपीए की गलती स्‍वीकार नहीं करते

यूपीए की गलती स्‍वीकार नहीं करते

यूपीए के भ्रष्‍टाचार को कभी स्‍वीकार नहीं करते हैं। राहुल कहीं भी जब युवाओं से या देश की जनता से मुखातिब होते हैं, तो यूपीए सरकार में हुए भ्रष्‍टाचार को स्‍वीकार नहीं करते। बल्कि उलटा राज्‍य सरकारों को कोसना शुरू कर देते हैं।

बहुत जल्‍द उत्‍तेजित हो जाते हैं

बहुत जल्‍द उत्‍तेजित हो जाते हैं

राहुल बहुत जल्‍द ही उत्‍तेजित हो जाते हैं। यूपी विधानसभा चुनावों की कई रैलियां इसकी गवाह हैं, जहां राहुल ने एक कागज को सपा का चुनावी घोषणा पत्र बता कर फाड़ दिया। वहीं अखिलेश यादव हर रैली में ठंडे दिमाग से बोलते हुए दिखे।

ज्‍वलंत मुद्दों पर बोलने से बचते हैं

ज्‍वलंत मुद्दों पर बोलने से बचते हैं

राहुल गांधी जल्‍दी लोगों से मिलते नहीं हैं। यही नहीं वो मी‍डिया से भी बात नहीं करते हैं। मीडिया में उनके सिर्फ रैली के भाषण ही आप देख सकते हैं। राहुल की प्रेसवार्ता शायद ही कभी दिखती हैं। यही नहीं ज्‍वलंत मुद्दों पर बोलने से भी राहुल गांधी हमेशा से बचते आये हैं, फिर चाहे वो लोकपाल बिल हो या फिर एफडीआई हो।

कथनी और करनी में फर्क

कथनी और करनी में फर्क

जो कहा उस पर कभी अमल नहीं किया। उन्‍होंने भट्टा पारसौल की जंग में कूद कर बड़ा नाम कमाया। चुनाव खत्‍म हो गये और राहुल दिल्‍ली चले गये। उन्‍होंने कभी पलट कर गांव की तरफ नहीं देखा। इसी प्रकार जिन गांवों में उन्‍होंने दलितों के घर रुक कर रात बिताई वहां भी विकास का नामोनिशान नहीं है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बुंदेलखंड है।

शो ऑफ करते हैं राहुल

शो ऑफ करते हैं राहुल

राहुल गांधी कई जगह शो ऑफ भी करते हैं। महाराष्‍ट्र में बीएमसी के चुनाव के पहले वो लोकल ट्रेन में सफर करते दिखे। वहीं बुंदेलखंड के गांवों में रातें गुजारी, लेकिन क्‍या आज तक लोकल ट्रेन की हालत में कोई सुधार हुआ। नहीं। क्‍योंकि राहुल सिर्फ शो ऑफ करने के लिये वहां गये थे।

तर्कहीन बातें

तर्कहीन बातें

चाहे लोकपाल बिल हो या फिर एफडीआई और या कोई स्‍कैम, राहुल गांधी ने कभी किसी मुद्दे पर तर्कसंगत बातें नहीं कीं। उनके बयान भी कई बार तर्कहीन होते हैं।

पूर्वजों की नकल

पूर्वजों की नकल

राहुल अपने पिता राजीव गांधी और पिता के नाना जवाहर लाल नेहरू के पदचिन्‍हों पर चलने की कोशिश करते हैं, लेकिन चल नहीं पाते। उदाहरण के तौर पर फूलपुर ही ले लीजिये, जहां से नेहरू ने अपना राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। नेहरू फूलपुर तक पैदल चल कर गये थे, जबकि राहुल पिछले चुनाव में एक बार गये और महज आधे घंटे में वहां से गायब हो गये।

यूथ की परिभाषा में कंफ्यूज्‍ड हैं

यूथ की परिभाषा में कंफ्यूज्‍ड हैं

राहुल गांधी की डिक्‍श्‍नरी में यूथ की परिभाषा क्‍या होती है, यह देश को आज तक नहीं समझ आया। यूथ को प्रोग्रेसिव और एनर्जेटिक होना चाहिये, ये दोनों ही राहुल के अंदर नहीं है। यही नहीं उनकी टीम में दिग्विजय सिंह, प्रमोद तिवारी, एके एंटनी जैसे दिग्‍गजों के बीच कितने यूथ हैं जो उनके मिशन 2014 को सफल बनायेंगे।

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