... लेकिन कोई ‘राम’ बनने को तैयार नहीं !
अहमदाबाद। सोनिया आईं और चली गईं। भीड़ इकट्ठा हुई और कपड़े झाड़ कर निकल गई। आज कुछ नया नहीं हुआ है और चुनाव की घोषणा से पहले भी जब सोनिया आईं, तब ऐसा ही कुछ हुआ था। थोड़ा और पीछे चले जाएँ, तो 2002, 2004, 2007, 2009 के लोकसभा-विधानसभा चुनावों में भी ऐसा होता आया है। आज नया क्या हुआ? कुछ नहीं।

गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 को लेकर प्रचार अभियान अब पराकाष्ठा पर है। सत्तारूढ़ भाजपा और प्रतिपक्ष कांग्रेस की ओर से प्रचार को लेकर सभाओं-बैठकों का दौर चल रहा है। भाजपा की ओर से जहाँ मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के आगे नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली सहित कई राष्ट्रीय नेता प्रचार में जुटे हुए हैं, तो मोदी से पीछे मंत्रिमंडल के सदस्यों, विधायकों और छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं की फौज जुटी हुई है।
तात्पर्य यही है कि गुजरात चुनाव के केन्द्र में मोदी हैं और होंगे भी क्यों नहीं? वे पिछले ग्यारह वर्षों से गुजरात के मुख्यमंत्री हैं। जो व्यक्ति 11 वर्षों से मुख्यमंत्री के पद पर हो, तो चुनाव के केन्द्र में उसी का होना स्वाभाविक भी है। चाहे अच्छे कार्यों के लिए हो या फिर बुरे के लिए।
रावण कहने वालों की कमी नहीं
क्या गुजरात विधानसभा चुनाव की बात हो और मोदी से परहेज किया जा सकता है? पर इस बार के चुनाव में मोदी जिन्हें लगातार निशाना बनाते रहे हैं, उन सोनिया गांधी ने लगातार दूसरी बार मोदी के नाम से परहेज किया। राजकोट की सभा में और फिर आज की चुनाव सभाओं में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मुश्किल से पंद्रह मिनट का भाषण किया, लेकिन गुजरात की भाजपा सरकार की निंदा की और उस सरकार के मुखिया का नाम लेने से परहेज किया।
दरअसल मोदी और कांग्रेस के मामले में जोरदार विरोधाभास है। पहला विरोधाभास यह है कि मोदी कांग्रेस को निशाना बनाते हुए सीधे-सीधे सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर हमला बोलते हैं, तो सोनिया-मनमोहन मोदी का नाम तक नहीं लेते। दूसरा विरोधाभास यह है कि कांग्रेस के बाकी नेताओं का पूरा भाषण मोदी पर केन्द्रित होता है, जबकि मोदी कांग्रेस के इन बाकी नेताओं का नाम तक नहीं लेते।
कांग्रेस के अनेक नेता अक्सर मोदी की निंदा करते हुए जबान फिसलने की स्थिति तक जा पहुँचते हैं। पिछले दिनों ही कांग्रेस के एक बड़बोले नेता दिग्विजय सिंह ने मोदी की तुलना रावण से कर डाली। मोदी के 3डी टेक्नोलॉजी द्वारा एक साथ कई जिलों में दिखने व प्रचार करने के अभियान पर दिग्गी राजा बोल बैठे कि रामायण में एक व्यक्ति था, जिसके दस सिर थे।
हनुमान, अंगद, जामवंत, सुग्रीव, लक्ष्मण से काम चलेगा?
अब सबसे बड़ा सवाल उठता है कि इस रावण का वध कैसे हो? भाई रावण शब्द जिस ग्रंथ से हमारे सामने आया है, जवाब भी उसी ग्रंथ से मिलता है। रामायण के अनुसार रावण का वध करने के लिए राम की आवश्यकता पड़ती है। अब मोदी को रावण बताने का साहस करने वालों की तो कोई कमी नहीं है, लेकिन क्या कोई राम बनने को तैयार है? मोदी पिछले कुछ दिनों से लगातार अपने भाषणों में कांग्रेस से सवाल कर रहे हैं कि आपका कैप्टन कौन है? मोदी का यह सवाल कांग्रेसी स्टाइल में देखा जाए, तो मोदी सीधे-सीधे कांग्रेस को उनके समक्ष अपने राम को प्रस्तुत करने की चुनौती दे रहे हैं। विडंबना यह है कि कांग्रेस ने इस कथित रावण से मुकाबला करने के लिए हनुमान, अंगद, जामवंत, सुग्रीव, लक्ष्मण जैसे योद्धा तो उतारे हैं, परंतु राम ही बाकी छोड़ दिया।
हद कर दी सोनियाजी ने
हद तो तब हो जाती है, जब कांग्रेस अध्यक्ष या यूँ कहें कि कांग्रेस की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी तक अपने चुनावी भाषण में मोदी के नाम का उल्लेख तक नहीं करतीं। राजकोट की चुनाव सभा में भी सोनिया ने मोदी का पूरी तरह इग्नोर किया, तो आज की सभाओं में भी सोनिया लगातार भाजपा पर निशाना साधती रहीं। अब यह हद ही कहलाएगी न। आम से आम गुजराती और खास से खास कांग्रेसी भी जानता है कि गुजरात चुनाव यानी मोदी के सुशासन-कुशासन के बीच फैसला करना है। पूरा देश जानता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 पूरी तरह मोदी के इर्द-गिर्द है, परंतु इस कांग्रेस कथित रावण से निपटने के लिए स्वयं सोनिया भी राम बनने को तैयार नहीं लगतीं।
गलती का प्रायश्चित या प्रायश्चित में गलती?
चलो मान लिया कि गुजरात विधानसभा चुनाव 2007 में सोनिया गांधी ने मोदी को मौत का सोदागर कह कर गलती की थी। बताया जाता है कि सोनिया की मोदी को दी गई इस एकमात्र उपाधि के कारण मोदी मतों के सौदागर बन कर उभरे थे। शायद यही कारण है कि मोदी की ओर से लगातार वाक्-बाण झेलने के बावजूद सोनिया मोदी का नाम तक नहीं लेतीं। वे शायद भयभीत होंगी कि कहीं गलती से पुनः गलती न हो जाए। संभव है कि मोदी का नाम न लेकर वे 2007 की गलती का प्रायश्चित कर रही हों, परंतु क्या इस प्रायश्चित में गलती नहीं है?
मुद्दे से भटकाव
गुजरात चुनाव में विकास-विनाश, परिवर्तन-पुनरावर्तन, आरोप-प्रत्यारोप कई मुद्दे हैं, लेकिन हर मुद्दे की तह में जाइए, आपको धुरि के रूप में मोदी ही नजर आएँगे। तो क्या गुजरात चुनाव में नहीं लगता कि मोदी ही एक मुद्दा हैं। ऐसे में यदि सोनिया गांधी 2007 के प्रायश्चित के रूप में मोदी का नाम न लेकर मुद्दे से भटकाव की गलती नहीं कर रहीं? मोदी को मोदी की ही भाषा में न सही, लेकिन अपनी भाषा में तो जवाब दिया ही जा सकता है। सोनिया गांधी के आज के दौरे की पूर्व संध्या पर मोदी ने सोनिया पर जम कर निशाना साधा और सवालों की झड़ी लगाई, परंतु सोनिया मौन रहीं। क्या मोदी के आरोपों का सोनिया को जवाब नहीं देना चाहिए था? केवल भाजपा सरकार शब्द का उपयोग कर देने मात्र से उस सरकार के खिलाफ प्रचार हो गया, जिसके हर अच्छे-बुरे कार्य के लिए जवाबदेही उसके मुखिया की बनती है?












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