पर गुलगुले से परहेज है नीतिश को!

अहमदाबाद, 20 नवम्बर। हिन्दी में एक कहावत है - ‘गुड़ खाए और गुलगुले से परहेज करे।' भारतीय राजनीति में यह कहावत इस समय सबसे सटीक किस पर बैठती है? क्या जानते हैं आप?

नहीं जानते? चलिए हम ही आपको बताए देते हैं। यह कहावत सटीक बैठती है बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार पर। जी हाँ। नीतिश कुमार जनता दल (युनाइटेड) यानी जदयू के नेता हैं। बिहार में नीतिश कुमार की सरकार है और वह भी भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा के साथ गठबंधन वाली सरकार है। वही नीतिश कुमार गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 में अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार के लिए आने वाले हैं।

जदयू की ओर से चुनाव आयोग को भेजी गई स्टार प्रचारकों की सूची में नीतिश कुमार का नाम है। साथ ही पार्टी अध्यक्ष शरद यादव का नाम भी सबसे ऊपर है। शरद यादव यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अर्थात् एनडीए के संयोजक हैं। यह वही एनडीए है, जिसकी केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पांच साल सरकार थी। उसमें शरद यादव ही नहीं, स्वयं नीतिश कुमार तक मंत्री के रूप में शामिल थे।

Nitish Kumar, With Bjp, Not With Modi

नीतिश कुमार और शरद यादव समेत बिहार सरकार के कई मंत्री गुजरात चुनाव में प्रचार के लिए आएँगे। बिहार में भाजपा के साथ मिल कर अपनी सरकार के कामकाज का ढोल पीटने वाले तथा आठ साल पहले लगातार पाँच साल तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में शामिल होकर सत्तासुख भोगने वाला जनता दल यू यानी जदयू गुजरात में भाजपा के साथ नहीं है।

अब हम आपको बताते हैं कि ‘गुड़ खाए और गुलगुले से परहेज करे' कहावत इस पूरे वाकये में क्यों सटीक बैठती है। इस कहावत में गुड़ का मतलब है केन्द्र में पाँच साल तक एनडीए की सत्ता में भागीदारी और हाल में बिहार में 2005 से अब तक यानी सात वर्षों से सत्ता में भागीदारी का सुख। नीतिश कुमार और उनकी पार्टी एनडीए और भाजपा रूपी गुड़ को लगातार चाट रहे हैं, परंतु अब सवाल उठता है गुलगुले का।

यह गुलगुला कौन है? यह गुलगुला है नरेन्द्र मोदी। नीतिश कुमार को भाजपा और एनडीए रूपी गुड़ से कोई परहेज नहीं है। बस परहेज है तो केवल और केवल गुलगुले से यानी नरेन्द्र मोदी से। नीतिश इस गुलगुले का नाम आते ही गुलगुले की तरह गरम हो उठते हैं।

अंटश क्या है?
अंटश तो कुछ भी नहीं है और बहुत कुछ है भी। नीतिश कुमार के मन में गुड़ से बने इस गुलगुले से अंटश 2002 में हुए गोधरा कांड और उसके बाद भड़के साम्प्रदायिक दंगों के बाद पैदा हुई। हालाँकि गोधरा कांड और दंगे 2002 में हुए, लेकिन नीतिश को मोदी रूपी गुलगुले से चटका तब लगा, जब दो साल बाद 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार का पतन हुआ और नीतिश कुमार को मंत्री पद गँवाना पड़ा।

गुड़ में डूबे हुए थे नीतिश
दरअसल जब यह गुलगुला बना, तब नीतिश कुमार पूरी तरह गुड़ और उसकी चासनी में डूबे हुए थे। जी हाँ। गोधरा कांड रेलवे की सीमा में हुआ था। गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस 6 डिब्बे में आग लगी और उसमें सवार 59 कार सेवकों की मौत हो गई। उस समय केन्द्र में वाजपेयी सरकार और रेल मंत्री नीतिश कुमार थे। गोधरा कांड के बाद जोरदार दंगे हुए और मोदी की चौतरफा निंदा हुई, लेकिन नीतिश कुमार न केवल रेल मंत्री बने रहे, बल्कि उनकी पार्टी मई-2004 तक एनडीए रूपी गुड़ का मजा उठाती रही।

हार का ठीकरा मोदी के सिर
लोकसभा चुनाव 2004 में जब एनडीए की करारी हार हुई, तो नीतिश कुमार और उनकी पार्टी ने हार का ठीकरा मोदी के सिर फोड़ा। नीतिश ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गुजरात में मोदी के कथित मुस्लिम विरोधी रुख के कारण देश में मुस्लिम वोट एनडीए से विमुख रहे और वाजपेयी सरकार को हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद बिहार में नीतिश ने 2005 में भाजपा के साथ मिल कर पहली बार प्रचंड बहुमत तो हासिल किया, लेकिन मोदी से उनकी अंटश उनकी कथित मुस्लिम विरोधी छवि के कारण बनी रही। नीतिश हमेशा भाजपा-एनडीए रूपी गुड़ के गुलगुले रूपी हिस्से मोदी से कन्नी काटते रहे।

मोदी की छवि से भयभीत नीतिश
मोदी और नीतिश के बीच यह दूरियाँ कभी कम होती नजर नहीं आईं। मोदी जहाँ गुजरात में 2002 और उसके बाद 2007 में भी विधानसभा चुनाव जीत कर गुजरात भाजपा के सर्वेसर्वा बन गए, वहीं 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी नीतिश कुमार मोदी से परहेज करते रहे। यहाँ तक कि एनडीए की पंजाब में आयोजित सभा में मोदी ने जब एनडीए के तमाम नेताओं की तरह नीतिश का भी हाथ पकड़ कर उठा लिया, तो नीतिश ने भयभीत होकर बाद में स्पष्टीकरण दिया कि वे मोदी की नीतियों के खिलाफ हैं। इतना ही नहीं मोदी लोकसभा चुनाव 2009 या बिहार विधानसभा चुनाव 2005 और 2010 के दौरान कभी भी वहाँ भाजपा के प्रचार के लिए नहीं गए।

शीर्ष पद की दावेदारी से संघर्ष चरम पर
मोदी और नीतिश के बीच 2004 से शुरू हुआ यह संघर्ष अब चरम पर पहुँचा गया है। कारण है प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी और दावेदारी। देश के इस सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद के लिए भाजपा और एनडीए के भीतर घमासान मचा हुआ है। भाजपा में मोदी के विरुद्ध उठने वाले सुरों की कमी नहीं है, तो उनके समर्थक भी कहाँ कम हैं, लेकिन एनडीए में यदि मोदी की उम्मीदवारी-दावेदारी का कोई सबसे बड़ा विरोधी है, तो वो हैं नीतिश कुमार। यह ऐसा मुद्दा है कि नीतिश गुजरात ही नहीं, बल्कि बिहार और राष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा से नाता तोड़ने को तैयार हैं। मतलब यदि गुलगुला खाने को विवश किया जाए, तो नीतिश पूरे गुड़ को ही ठोकर मारने को तैयार हैं। अब सभी निगाहें गुजरात विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं। 20 दिसम्बर को काफी कुछ तय हो जाएगा। पहला निश्चयन तो इस बात का होगा कि गुजरात में मोदी को तीसरी बार सत्ता का ताज मिलता है या नहीं? दूसरी बात यह तय होगी कि मोदी यदि गुजरात में प्रचंड बहुमत हासिल करते हैं, तो फिर उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के लिए पार्टी के भीतर दबाव और लामबंदी तेज हो जाएगी। फिर तीसरा प्रश्न रह जाएगा एनडीए यानी नीतिश कुमार और उन्हीं की तरह सोचने वाले अन्य सहयोगी दलों का।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+