आज फिर मनायें महात्मा गांधी का जन्मदिन
अहमदाबाद। क्या आपको याद है अभी दस दिन पहले 2 अक्टूबर को आपने क्या किया? यदि आप सरकारी या अर्ध सरकारी कर्मचारी हैं, तो निश्चित रूप से आपकी छुट्टी रही होगी। याद करने की कोशिश कीजिए। शायद आप फिल्म देखने गए होंगे, किसी रिश्तेदार से मिलने गए होंगे, खूब एन्जॉय किया होगा, पिकनिक पर गए होंगे या फिर किसी सामाजिक कार्य या पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी की होगी या फिर कोई पेण्डिंग काम निपटाए होंगे।

जी हाँ। हम 2 अक्टूबर की ही बात कर रहे हैं। वैसे 2 अक्टूबर तारीख आते ही जेहन में हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की छवि उभर आती है, लेकिन ज्यादातर लोगों के लिए तो यह यह दिन सार्वजनिक अवकाश से ज्यादा शायद कुछ नहीं है। हाँ यह बात सही है कि आम दिनों में भाषणों में ही महात्मा गांधी का नाम लेने वाले तथाकथित गांधीवादियों, राजनेताओं और मंत्रियों के लिए यह दिन व्यस्ततापूर्ण रहता है। उन्हें पहले तो गांधी की प्रतिमा पर पुष्पार्पण, श्रद्धांजलि देनी होती है। उनके चरित्र का वर्णन करना होता है। उसके बाद भी दिन भर व्यस्त कार्यक्रम रहते हैं, लेकिन मुझे याद हीं पड़ता कि 2 अक्टूबर को किसी ने गांधीजी की स्वदेशी की अवधारणा के प्रतीक चरखे को याद किया हो।
आज है महात्मा गांधी का जन्म दिन चरखा द्वादश
चौंक गए ना। चरखा याद आएगा भी कैसे। उसे याद करने का दिन तो आज है। भारतीय स्वतंत्रता और मृत्यु से पूर्व तक गांधीजी का जन्म दिन चरखा द्वादश के रूप में ही मनाया जाता था। गांधीजी वैसे तो अपना जन्म दिन मनाने के खिलाफ थे, लेकिन वे कहते थे, ‘यदि मेरा जन्म दिन मनाना ही तो सूत कात कर मनाओ।'
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म कब हुआ? इस सवाल का उत्तर चौथी कक्षा का छात्र भी बड़ी आसानी से दे सकता है, ‘2 अक्टूबर को'। हालाँकि वर्ष बताने में किसी को दिक्कत हो सकती है, परंतु तारीख बताने में शायद ही कोई भूल कर सकता है, लेकिन विक्रम संवत के अनुसार महात्मा गांधी का जन्म दिवस पूछने पर कई लोग सिर खुजाने लगते हैं। यह विडंबना ही कही जाएगी कि आम भारतीय जनसमुदाय अपने ज्यादातर उत्सव और त्योहार तिथियों के अनुसार मनाता है, परंतु दैनिक दिनचर्या में इन तिथियों के नहीं के बराबर उपयोग के कारण आधुनिक पीढ़ी में ज्यादातर लोगों को यह नहीं मालूम होगा कि 12 अक्टूबर, 2012 शुक्रवार को महात्मा गांधी की 143वीं जयंती है।
स्वतंत्रता से पूर्व था राष्ट्रीय पर्व
ईसवी सन् के अनुसार गत 2 अक्तूबर को महात्मा गांधी की 143वीं जयंती भले ही धूमधाम से मनाई गई हो, परंतु हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार महात्मा गांधी का जन्म विक्रम संवत 1926 आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी (गुजराती कैलेण्डर के अनुसार विक्रम संवत 1925 में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी) को हुआ था। स्वतंत्रता से पूर्व तक महात्मा गांधी अपना जन्म दिन इसी तिथि को मनाया करते थे और उनके अनुयायी इस दिन गांधी के प्रिय चरखे से ज्यादा से ज्यादा सूत कात कर खादी उत्पादन में वृद्धि करने का प्रयास करते थे। इसीलिए इस दिन को चरखा द्वादश ( रेंटिया बारस) के रूप में मनाया जाता है। स्वतंत्रता से पहले तक चरखा द्वादश राष्ट्रीय पर्व होता था। महात्मा गांधी अपनी वर्षगांठ मनाने के खिलाफ थे। इसीलिए वे लोगों को प्रेरणा देते थे कि यदि उनका जन्म दिन मनाना ही है, तो ज्यादा से ज्यादा चरखा चला कर सूत कातें, ताकि देशवासियों को तन ढंकने के लिए खादी के रूप में स्वदेशी कपड़ा उपलब्ध हो।
2 अक्टूबर ने भुलाया चरखा
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद केन्द्र सरकार ने महात्मा गांधी की जयंती अंग्रेजी कैलेण्डर के हिसाब से 2 अकटूबर को मनाने की घोषणा की। तब से चरखा द्वादश का महत्व घटता चला गया। जैसे-जैसे समय बीतता गया महात्मा गांधी की जयंती मनाया जाना महज औपचारिकता बनता चला गया। आज स्थिति यह है कि हर वर्ष 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती मनाई जाती है। नेतागण उनकी प्रतिमाओं पर फूलमालाएं चढ़ाते हैं। लोगों को उनके आदर्शों और सिद्धांतों पर चलने की सीख देते हैं, लेकिन महात्मा गांधी को प्रिय खादी और चरखे को कोई याद नहीं करता। इसके साथ ही 2 अक्तूबर के बढ़ते प्रचार के बीच चरखा द्वादश भुला दी गई।
मोदी के बाद बढ़ा खादी का महत्व
वर्तमान में तो कुछ लोगों को मालूम भी होगा कि चरखा द्वादश कोई पर्व है, लेकिन दशक-दो दशक बाद नई पीढ़ी शायद यह भूल ही जाएगी कि चरखा द्वादश भी कोई पर्व होता है, जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जन्म लिया था। यह कैसी विडंबना है कि समग्र देश में साल भर मनाए जाने वाले सैकड़ों पर्व हिन्दी या राज्यों के भाषाई कैलेंडरों की तिथियों के हिसाब से मनाए जाते हैं, फिर वह प्रकाश पर्व दीपावली हो या रंग पर्व होली या भाई-बहन के पवित्र बंधन का पर्व रक्षा बंधन। यहां तक कि रामनवमी, जन्माष्टमी ही नहीं, बल्कि महात्मा गांधी के गुजरात में सबसे प्रिय उत्सव नवरात्रि भी हिन्दू कैलेंडर के अनुसार ही मनाया जाता है।
हालांकि जब से गुजरात में नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री बनें हैं, तब से खादी का महत्व बढ़ता जा रहा है। इसके लिए मुख्यमंत्री भी हर वर्ष गांधी जयंती पर स्वयं दुकान पर जाकर खादी खरीदते हैं और लोगों को खादी खरीदने की प्रेरणा देते हैं।












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