सीबीआई के डर से मुलायम हैं यूपीए के साथ

दरअसल मुलायम सिंह आय से अधिक संपत्ति के एक से ज्यादा मामलों में सीबीआई के घेरे में है और सीबीआई केंद्र सरकार के घेरे में जिसे वो समय-समय पर आदेश देती रहती है। अगर मुलायम जरा सा चूं-चां करते हैं तो सीबीआई का हथौड़ा उन पर पड़ जाता है और मामला कोर्ट में रफ्तार पकड़ लेता है लेकिन जब मुलायम ठंडे पड़ जाते हैं तो उनका मुकदमा तारीखों की भेंट चढ़ जाता है और केस की सुनवाई टाल दी जाती है।
ऐसा नहीं है कि मुलायम ने यूपीए का साथ इस बार ही दिया है। साल 2008 में भी जब यूपीए वन को शक्ति परीक्षण की जरूरत पड़ी थी तो यह मुलायम ही थे जिन्होंने उसको वोट किया था, यह कहकर कि देश पार्टी से बड़ा होता है और परमाणु संधि देश हित में है। उसी तरह इस बार भी मुलायम सिंह ने ममता बनर्जी की तरह हल्ला तो बहुत मचाया, विपक्ष के बंद में पुर-जोर से शामिल भी हुए लेकिन ममता की तरह मनमोहन सिंह का हाथ नहीं छोड़ पाये क्योंकि जिस तरह एक जिन्न की जान तोते में होती है उसी तरह मुलायम की राजनीति के काले पन्नों की किताब केन्द्र के हाथ में है।
इसलिए चाहते हुए भी मुलायम सिंह अपनी साईकिल से पीएम सीट तक ना पहुंच पा रहे हैं और ना ही पंजे को परास्त कर पा रहे हैं , जिसके कारण वो अपने आप को भ्रष्टाचारी कहलाने की बजाय दोगुला कहलाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
गौरतलब है कि मुलायम सिंह ने शुक्रवार को साफ किया था कि वो भले ही सरकारी फैसलों के खिलाफ हैं लेकिन सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा ना मिले इसके लिए वो मनमोहन सिंह के साथ है। वो अब भी डीजल के बढ़े हुए दामों और एफडीआई की मंजूरी की खिलाफत करते हैं लेकिन वो सरकार गिराने के पक्ष में नहीं है। मुलायम ने कहा कि देश पहले ही बहुत सारी समस्याओं से ग्रस्त है, ऐसे में वो सरकार से समर्थन वापस लेकर भारत को राजनैतिक परेशानी नहीं देना चाहते क्योंकि ऐसा करने से देश के ऊपर सांप्रदायिक संकट मंडराने लगेगा।
मुलायम सिंह के इस बर्ताव के बारे में आपका क्या मत है, अपनी बात नीचे लिखे कमेंट बॉक्स में दर्ज करायें।












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