कुष्‍ठ रोगी बाप को अस्‍पताल में छोड़ गया बेटा

Son left his ill father and never came back
लखनऊ। हमने तो उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाया। जब वह बीमार पड़ा तो आखों में पूरी रात काट दी। पढ़ा लिखा कर काबिल इंसान बनाया। उसकी नौकरी के लिए खेत बेच दिया लेकिन जब हमें उसकी जरूरत हुई तो उसी लाडले ने मुंह फेरते देर न की। यह सब कहते-कहते सत्तर वर्षीय राम बिलास की आंखों में आंसू भर आते हैं।

लखनऊ के लिम्ब सेन्टर (रिहेबिलिटेशन एण्ड आर्टिफिशियल लिम्ब सेन्टर) में अपने कुष्ठ का इलाज करा रहे राम बिलास हर वक्त रोते ही रहते हैं। उनका दुख यह है कि उनके लड़के सूरज ने उनके इलाज के नाम उन्हें चिकित्सालय तो पहुंचा दिया लेकिन बीते आठ माह से उनकी कोई खोज खबर नहीं ली।

जिला फतेहपुर के राम बिलास को त्वचा में रोग हुआ पहले पहल तो उन्होंने स्थानीय चिकित्सकों से इलाज कराया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। अपने इकलौते बेटे सूरज को पत्र भेजकर सूचित किया उन्हें किसी बड़े डाक्टर से इलाज करा दे ताकि उनका रोग दूर हो सके। बावजूद इसके बेटे सूरज उनके पत्र का जवाब नहीं दिया। करीब आधा दर्जन पत्रों को भेजने के बाद भी जब जवाब नहीं मिला तो गांव वालों ने सूरज से सम्पर्क साधा और बाप के इलाज के लिए दबाव बनाया।

लोगों के ताने सुनने के बाद सूरज पिता को लिम्ब सेन्टर ले आया। जांच में पता चला कि राम बिलास के पैर में जो त्वचा रोग है वह असल में कुष्ठï का विकृत रूप ही है फिर क्या था कुष्ठï का नाम सुनते ही एक दिन सूरज चिकित्सालय से लापता हो गया और उसके बाद से आज तक उसने लौटकर पिता की ओर नहीं देखा। राम बिलास की सेवा उसके ही गांव का एक युवक करता है।

राम बिलास को हर वक्त यही दर्द सताता है कि उन्होंने सूरज की मां के देहान्त के बाद किस प्रकार सूरज को पाला पोसा। युवक का कहना है कि सूरज जब छोटा था तो उसकी मां की मौत हो गयी। चाचा (राम बिलास) ने अकेले ही उसका पालन पोषण किया। खेती के सहारे चाचा ने सूरज को किसी प्रकार पढ़ाया लिखाया और इस लायक बनाया कि वह नौकरी कर सके। चाचा ने सूरज की पढ़ाई समाप्त होने के बाद उसकी नौकरी के लिए अपने दो खेत भी बेच दिए।

उन्होंने यह सोचा था कि जब बेटा नौकरी करने लगेगा तो उनके सारे दुख दूर हो जायेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राम बिलास के सपने सूरज के नौकरी मिलने के कुछ माह बाद ही टूट गए। सूरज ने अपनी पसंद की लड़की से शादी की और पिता को भूल गया। अब राम बिलास को उस दिन का इंतजार है कि उनकी मौत हो और उनके कष्टï दूर हो जायें। इतना सबकुछ होने के बाद भी राम बिलास अपने बेटे को बद्दुआ नहीं देना चाहते।

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