हुड्डा सरकार से खुश हुए हरियाणा के जाट

समिति चाहती है कि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला जाट आरक्षण के बारे में अपनी नीति को स्पष्ट करें, क्योंकि वे बार-बार बयान देते हैं कि हरियाणा के जाटों को राजस्थान के जाटों की तर्ज पर आरक्षण दिया जाए, लेकिन उन्हें पिछड़े वर्ग के 27 प्रतिशत के कोटे में शामिल न करते हुए आर्थिक आधार पर दिया जाए। इसीलिए चौटाला साहब अपनी तर्ज को स्पष्ट करें कि जब संविधान के अनुसार आरक्षण के लिए आर्थिक कोई आधार नहीं है, आरक्षण देने का ही उद्देश्य पिछड़ी जातियों के आर्थिक स्तर को ऊंचा करते हुए उनके सामाजिक और शैक्षणिक स्तर को ऊंचा करना है।
इसलिए चौटाला साहब की जाट आरक्षण की वकालत की तर्ज किसी भी जाट की समझ से बाहर है। यह सर्वविदित है कि चौटाला साहब की पार्टी मुख्य रूप से जाट समाज के दम पर सत्ता में आती रही है, इसलिए उनका फर्ज बनता है कि भोले-भाले व गरीब किसान जाटों को गुमराह न करें क्योंकि आज जाट समाज इस विषय में काफी हद तक जागरूक हो चुका है। इसी प्रकार सांसद कुलदीप बिश्रोई जो स्वयं मांझू गौत्र के बिश्रोई जाट हैं, जाट आरक्षण के बारे में अपनी स्थिति को स्पष्ट करें, क्योंकि उनकी पार्टी का भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन है और भारतीय जनता पार्टी जाट आरक्षण का शुरू से ही समर्थन करती आई है तथा कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने जाट समाज को पहले ही आरक्षण दिया है।
इसलिए सांसद महोदय ग्रामीण जाट समाज को गुमराह न करें। हमारी स्पष्ट मांग है कि भारत के जाटों को बगैर किसी धर्म, पंथ व क्षेत्र के भेदभाव के समान रूप से पिछड़ी जाति घोषित किया जाए, जिसके लिए हमने 15 अगस्त, 2012 की तिथि निश्चित की हुई है तथा सबसे पहले केंद्र सरकार जाट समाज को पिछड़ा घोषित करे, जिस प्रकार राजस्थान के जाटों को 29 अक्टूबर, 1999 को केंद्र सरकार ने पिछड़ा घोषित किया तथा राजस्थान राज्य में विपक्ष की सरकार होते हुए भी 6 नवंबर, 1999 को राज्य स्तर पर पिछड़ा घोषित किया गया।
संघर्ष समिति ने इनेलो के महासचिव डॉ. अजय सिंह चौटाला के बयानों पर संतुष्टि प्रकट की क्योंकि उनका रूख जाट आरक्षण पर शुरू से सकारात्मक रहा है, लेकिन संघर्ष समिति चाहती है कि पंजाब के सिख जाटों के आरक्षण के बारे में सरदार प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन अमरिंद्र सिंह अपना स्टैंड जाहिर करें, क्योंकि अधिकतर समय में पंजाब पर इन्हीं दो जाट नेताओं ने शासन किया है। इन दोनों के शासन में पंजाब के जाट की हालत बद से बदतर हो चुकी है, क्योंकि केंद्रीय श्रम मंत्रालय की एक सर्वे रिपोर्ट के आधार पर पंजाब में रोजगार की दर 1.8 प्रतिशत है, जो पूरे भारत में सबसे निम्र स्तर पर है।
इसी का परिणाम है कि आज पंजाब का युवा जाट नशाखोरी की ओर जा रहा है। नतीजन वही पंजाब प्रदेश, जो कभी देश का सिरमौर होता है, आज बुरी तरह से पिछड़ रहा है। वर्ष 1966 में हरियाणा के अलग होने से पहले, जब कभी पश्चिमी हरियाणा क्षेत्र जो पंजाब का काला पानी कहा जाता था, वही आज पंजाब से आगे बढ़ रहा है। दब के वाह ते रज के खा वाली पंजाब की कहावत आज भूतकाल का विषय बनकर रह चुकी है। अब समय आ गया है कि पंजाब के जाटों को फिर से सरदार अजीत सिंह के इस नारे को बुलंद करना होगा: पगड़ी संभाल जट्टा।
वर्तमान में जाट समाज को पिछड़ी जाति घोषित करवाकर तथा आरक्षण दिलवाकर ही पंजाब के जाट की पगड़ी की इज्जत रखी जा सकती है। इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। प्रेस वार्ता में राष्ट्रीय अध्यक्ष के अलावा समिति के हरियाणा प्रदेशाध्यक्ष पूर्व कमांडेंट हवासिंह सांगवान, पंजाब प्रदेशाध्यक्ष सरदार सुच्चा सिंह बाजवा, कुलदीप फौगाट, दिलबाग सिंह जोहल एवं कश्मीर सिंह चीमा आदि भी उपस्थित थे।












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