गरीबी और भूख से हर हफ्ते दिल्ली में मरता है कोई एक

यह संभव है कि आपको पच नहीं रहा होगा कि दिल्ली में भी भूख से हर हफ्ते एक आदमी की मौत होती है तो यह हम नहीं दिल्ली पुलिस खुद इस बात को स्वीकार करती है। दिल्ली पुलिस ने एक आरटीआई के जवाब में कहा है कि शहर में पिछले 14 साल में 737 लोगों की मृत्यु या भूख या गरीबी की वजह से हुई है। इसमें कई लोगों ने आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठाए। हालांकि पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह आंकड़ा वास्तविक संख्या से काफी अधिक है।
दिल्ली के ही सीलमपुर के रहने वाले नैयर आलम ने एक आरटीआई के माध्यम से दिल्ली पुलिस से पूछा था कि 1999 से लेकर अब तक कितने लोगों ने भूख से तंग होकर आत्महत्या की या भूख के कारण उनकी मौत हुई। आलम ने इसी तरह गरीबी के कारण आत्महत्या या मौत के आंकड़े भी पुलिस से मांगे। पुलिस मुख्यालय ने सभी जिलों से ये आंकड़े मंगाए और पिछले महीने जून में आलम को जो जवाब मिला तो वह चौंकाने वाला था। पिछले साल वर्ष 2011 में दिल्ली में भूख और गरीबी से मरने वालों की संख्या 62 थी। इसमें से 15 लोगों ने भूख और 47 लोगों ने गरीबी के कारण दम तोड़ा। वर्ष 2012 में मार्च तक मरने वालों की संख्या 11 है।
इस तरह वर्ष 2010 में भूख से 18 और गरीबी से 40 लोगों ने दम तोड़ा। दिलचस्प बात यह है कि अक्टूबर 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के कारण दिल्ली पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनी हुई थी और राज्य व केंद्र सरकार दिल्ली में हुए विकास का राजधानी में हर हफ्ते भूख-गरीबी से एक मौत जमकर ढिंढोरा पीट रही थी, लेकिन इस साल भूख और गरीबी से हुई मौतों के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा। इससे पहले वर्ष 2009 में भी भूख और गरीबी से 60 लोग मारे गए थे। हालांकि वर्ष 2008 में यह आंकड़ा कुछ कम था और मरने वालों की संख्या 39 रिकार्ड की गई। वर्ष 2005 और 2002 में सबसे अधिक 72 मौतें हुई, जबकि वर्ष 2001 में सबसे कम 37 लोगों की मौत हुई।
दिल्ली सरकार आंकडे मानने को तैयार नहीं
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि ये आंकड़े कुछ गड़बड़ है। उन्होंने कहा कि अस्पतालों में जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आए हैं उसमें मौत के लिए एक शब्द 'कुपोषण का इस्तेमाल किया गया है। जबकि कुपोषण का मतलब भूख नहीं होता है।
दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय़ 176000 रुपये
दिल्ली में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1,76,000 रुपये है। ऐसे में इस प्रकार की घटनाएं निश्चित तौर पर सरकार को हिलाने वाली है। सूत्रों का कहना है कि सरकार को एक बार फिर नए सिरे से अपने कार्यक्रमों पर विचार करना चाहिए। क्योंकि सरकार झूठे आकंड़ों पर गुमान कर रही है जबकि दिल्ली में हकीकत के आंकड़े कुछ और ही हैं।












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