यूपी में सिर्फ 6 विधायक लखपति, बाकी करोड़पति

यदि आंकड़ों को समझ होती तो संभव है कि अखिलेख यादव अपने गरीब विधायकों के लिए 20 लाख के कार खरीदने की वकालत नहीं करते। सच्चाई तो यह है कि अखिलेश सरकार और यूपी विधानसभा में चुनकर आए सभी विधायक में कोई भी गरीब नहीं है। जो छह गरीब हैं भी वे भी लखपति हैं। इसलिए अखिलेश सरकार को कोई भी कदम उठाने से पहले कम से कम तीन बार सोच लेना चाहिए नहीं तो ऐसे ही उनकी सरकार की किरकिरी होती रहेगी और उनपर नासमझ होने के आरोप लगते रहेंगे।
67 फीसदी विधायक करोड़पति, केवल 6 लखपति
यूपी विधानसभा का चुनाव संपन्न हुए अभी कुछ ही महीने बीते हैं। उस दौरान उम्मीदवारों ने अपने संपत्ति के बारे में खुलासा किया था। उस खुलासे के अनुसार, यूपी के 403 विधायकों में से 271 विधायक यानी 67 फीसदी करोड़पति हैं। केवल छह विधायक जिनकी संपत्ति पांच लाख से नीचे हैं। यदि पार्टियों के आनुपातिक प्रति विधायक आमदनी का आंकलन करें तो सत्ता रूढ़ दल सपा के उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 2.52 करोड़ रुपये है जबकि बसपा के 4.44 करोड़ रुपये, भाजपा के 4.01 करोड़ रुपये और कांग्रेस के उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 4.61 करोड़ रुपये है। यानी कांग्रेस के उम्मीदवार सबसे मालदार हैं।
विधायकों को रिझाने की कोशिश में थे अखिलेश
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भले ही विधायक निधि से 20 लाख रुपये तक के कार खरीद मामले में पलट गए हों पर सूत्र बता रहे हैं कि वे अपने विधायकों के साथ ही अन्य विधायकों के हीरो बनना चाहते थे। हालांकि इस मामले में अखिलेश को कसूरवार कम उनके सलाहकारों को कसूरवार ज्यादा ठहराया जा रहा है।
दरअसल अखिलेश सोचकर चल रहे थे कि गाड़ी खरीद विधायकों के लाभ की बात है इसलिए इस मुद्दे पर उन्हें सभी दलों का समर्थन हासिल होगा। हालांकि सदन में शुरू में ऐसा नजर आया भी, लेकिन विपक्षी दलों को जब सरकार को दांव देने का अवसर दिखा तो वे पलट गए सरकार का दांव उल्टा पड़ गया। शुरुआत भाजपा ने की और कांग्रेस, बसपा समेत रालोद आदि सभी ने इसका विरोध करते हुए पार्टी विधायकों के सरकारी पैसे से गाड़ी खरीदने के प्रस्ताव से साफ इन्कार कर दिया।
विधायक निधि से गाड़ी खरीदे जाने की छूट देने की मंगलवार को विधानसभा में घोषणा के समय जिस तरह से विपक्ष ने अपनी आपत्ति जताई थी, उसी से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को इसका अहसास हो गया था कि उनका निर्णय गलत हो गया है। उन्होंने दोपहर बाद विधान परिषद में फैसले की जानकारी देने से बचने की भी कोशिश की। यही नहीं मुख्यमंत्री आवास पर यूपीए के राष्ट्रपति के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के दोपहर भोज के दौरान पार्टी के चंद युवा विधायकों से मुख्यमंत्री ने फैसले का जिक्र किया तो उन्होंने भी इसके गलत हो जाने की राय जताई। वरिष्ठ नेता मोहन सिंह ने भी मुख्यमंत्री से इस निर्णय से सरकार की छवि खराब होने की बात कही। इसके बाद से ही फैसले वापस लेने की योजना बनी।












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