भाजपा को बनना होगा राष्ट्रीय पार्टी!

हेडलाइन पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि भारतीय जनता पार्टी तो पहले से ही एक राष्ट्रीय पार्टी है, तो उसमें बनने न बनने वाली बात कहां से आ गई। जबकि सच पूछिए तो पिछले डेढ़ दशक से भाजपा राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी नहीं है, बल्कि वो एक अच्छी क्षेत्रीय पार्टी बन कर रह गई है। इस दौरान यह सिर्फ कर्नाटक और गोवा तक फैल सकी है।
देश में एक बहुत बड़ा भाग है, जहां भाजपा की उपस्थिति शून्य है। वास्तव में देखें तो भाजपा 300 से कम लोकसभा सीटों पर ही टक्कर दे सकती है। हाल ही में हुए आंध्र प्रदेश के उपचुनाव भाजपा के लिए आंखें खोलने का काम करते हैं। आंध्र प्रदेश के लोग पूरी तरह कांग्रेस और टीडीपी से जुड़े थे। पार्टियों से उनका जुड़ाव इतना प्रगाढ़ था कि उन्हें तोड़ना मुश्किल था। जगन मोहन रेड्डी ने वाईएसआर कांग्रेस का गठन किया, क्योंकि उनके पिता की मृत्यु के बाद उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। जगन ने कांग्रेस के खिलाफ अपनी जंग तेज की और जेल से चुनाव जीता।
अगर दूसरा पक्ष देखें तो केंद्र सरकार ने जगर पर तमाम अरोप लगाते हुए उन्हें जेल भेज दिया। उनके खिलाफ सीबीआई जांच बिठा दी। मीडिया की रिपोर्ट आयीं कि कांग्रेस सीबीआई का गलत इस्तेमाल कर रही है। खबरें आयीं कि वाईएसआर की संपत्ति 5 साल में कुछ लाख से बढ़कर कई सौ करोड़ की हो गई। इस पूरे घटनाक्रम में लोगों की भावनाएं जगन के समर्थन में बह गईं। परिणाम कांग्रेस के खिलाफ आये। मुझे लगता है कि इस संदेश को भूलना नहीं चाहिये कि केंद्र सरकार ने जगन के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों का राजनीतिक दुरुपयोग किया। खैर यह मुद्दा इस समय हमारा केंद्र बिंदु नहीं है।
जगन की सफलता से जो सवाल उभर कर सामने आया है कि क्या कांग्रेस/टीडीपी द्वारा बनाया गया खाली स्थान भरने के लिए कोई अन्य विश्वस्नीय व्यक्ति नहीं था। क्या हमारे राजनीतिक मानक इतने गिर गये हैं कि जगन और उनके जैसे लोग वोट की राजनीति में आसानी से सफल होंगे। जगन की जीत भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ कुछ गंभीर सवाल उठाती है। बात यह है कि भाजपा जैसी पार्टियां ज्यादा विश्वस्नीय विकल्प हैं। उसके कई मुख्यमंत्रियों के बेहतरीन शासन इस बात के गवाह हैं।
खैर आंध्रा में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। 2009 के चुनाव में चिरंजीवी की पार्टी पीआरपी को 16 फीसदी वोट मिले, जो कुछ महीने ही पुरानी पार्टी थी। वहीं 1984 में भाजपा जिसने दो 2 में से एक सीट जीती थी, उसे 6 फीसदी से भी कम वोट मिले।
राज्य में भाजपा प्रमुख कृष्णा रेड्डी पर फिर से संदेहस्पद सवाल उठने लगे हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि वो राज्य में पार्टी के लिए ईमानदारी से और पूरी लगन से काम कर रहे हैं। उनके प्रयासों से ही पार्टी का मनोबल बढ़ा और भाजपा ने महबूबनगर सीट पर जीत दर्ज की, लेकिन ऐसी जीत भाजपा से कोसों दूर रहेंगी। एक बड़ी पार्टी के रूप में भाजपा के उभरने में समय लग सकता है। उस समय कृष्ण रेड्डी ने आरोप लगाया था कि भाजपा के खिलाफ पैसा और शराब बांटी गई थी (हालांकि अंत में भाजपा महज 6 फीसदी वोट ही प्राप्त कर पायी थी)।
भविष्य में अगर भाजपा को ऐसी हार मिलती हैं, तो उसमें चकित होने की जरूरत नहीं। कई हार उनका इंतजार कर रही हैं। महबूबनगर की जीत के बाद सभी पार्टियां भाजपा से चौकन्नी हो गई हैं और वो आगे के लिए अपनी रणनीतियां तय करने में जुट भी गई हैं। वो कभी नहीं चाहेंगी कि भाजपा आंध्र प्रदेश में बड़ी पार्टी के रूप में उभरे।
हमने कई जगहों पर ऐसा देखा है। केरल में भी यही कहानी दोहराई। राज्य में दो या तीन जेबें थीं, जहां भाजपा दमदार प्रदर्शन करने में नाकाम रहीं। बाद में सुना कि यूडीएफ और एलडीएफ ने भाजपा को हराने के लिए गठबंधन कर लिया।
तो क्या करना चाहिये? भाजपा को छोटी-छोटी सफलताएं पाने वाली वर्तमान राजनीति से ऊपर उठकर कुछ बड़ा सोचना होगा। इस समय भाजपा राज्य स्तरीय नेतृत्व तक सीमित है। अगर आपका फोकस एक या दो सीट जीतने पर होगा, तो आप बड़ी तस्वीर को खो देंगे। कुल मिलाकर देखा जाये तो भाजपा को नये नेतृत्व के साथ बड़ी सोच लेकर आगे आना चाहिये। राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए भाजपा को अपने राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों के खिलाफ दमदार तरीके से आगे आना चाहिये।
ऐसी नीति के साथ आने की जरूरत है जो लंबे समय तक पार्टी की मजबूती बनाये रखे। पार्टी को एक-दो सीट के बारे में नहीं बल्कि पूरे राज्य के बारे में सोचना चाहिये। पार्टी को जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की जरूरत है, जो लोगों से सीधे जुड़े हों। ममता ने दिखा दिया कि लंबे समय तक प्रयास करते रहने से कैसे सफलता मिलती है। उनका केंद्र बिंदु सिर्फ कुछ सीटों को जीतने पर नहीं था, बल्कि उन्होंने खुद को पश्चिम बंगाल में वाम दलों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।
भाजपा की हार का एक और उदाहरण है उतर प्रदेश। वहां भाजपा ने सत्ता पर कब्जा करने के लिए नहीं, बल्कि पहले से ज्यादा सीटों पर कब्जा करने के लिये चुनाव लड़ा। भाजपा कुशवाहा को लेकर आयी, ताकि 5 से 10 सीटों का फायदा मिले। इसी प्रकार उमा भारती को शामिल कर उसने बुंदेलखंड से कुछ सीटें जुटाने के प्रयास किये। ये उदाहरण साफ दर्शाते हैं कि भाजपा की सोच सिर्फ क्षणिक सफलता प्राप्त करने वाली है। यहां तक अरुण जेटली ने बाद में यह माना भी था कि लोगों ने भाजपा को कभी विकल्प के रूप में नहीं देखा।
इसलिए हम एक बार फिर दोहराना चाहेंगे कि अच्छा क्षेत्रीय नेतृत्व भाजपा का विस्तार तो कर सकती है, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी नहीं बना सकती। भाजपा को दिल्ली हाईकमान वाली संस्कृति से बाहर निकल कर कुछ करना होगा। इससे भाजपा के अंदर का वो संवेग खत्म हो गया है, जो 90 के दशक में दिखता था।












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