आईसीयू भरा देख खुश होकर डॉक्‍टर कहते सत्‍यमेव जयते!

Satyamev Jayate, Aamir
सत्‍यमेव जयते के माध्‍यम से आमिर खान ने जिस मुद्दे को उठाया है, उससे देश का कोई भी व्‍यक्ति अछूता नहीं है। डॉक्‍टर के रूप में मौत के सौदागरों को सभी ने अपने जीवन में एक न एक बार जरूर देखा होगा। आमिर खान के इस प्रयास को हम सलाम करते हैं और साथ में उठाते हैं उन बिंदुओं को जो सत्‍यमेव के चौथे एपिसोड में नहीं आ सके। 1 घंटे में शायद संभव भी नहीं था। अपनी हर बात मैं किसी दूसरे के नहीं बल्कि अपने जीवन की घटनाओं से जोड़ते हुए रखूंगा-

केस 1: 9 दिसंबर 2006 को मेरी दूसरी जॉब का पहला दिन था, मैं सुबह ऑफिस पहुंचा और दोपहर करीब 2 बजे घर से फोन आया कि भईया की तबियत खराब है। मैं तुरंत घर पहुंचा और भाईया रवि मोहन को निरालानगर स्थित प्राइवेट अस्‍पताल ले गया, जहां उनका इलाज चल रहा था। डॉक्‍टर ने तुरंत एडमिट किया और ड्रिप लगा दी। एक के बाद एक इंजेक्‍शन देने शुरू कर दिये। रात के करीब 9 बजे डॉक्‍टर ने कहा हम कुछ नहीं कर सकते, आप इन्‍हें संजय गांधी स्‍नातकोत्‍तर आयुर्विज्ञान संस्‍थान (एसजीपीजीआई) ले जायें।

एंबुलेंस का इंतजाम किया और निरालानगर से एसजीपीजीआई ले गये। वहां इमर्जेन्‍सी में डॉक्‍टर मौजूद थे, लेकिन उन्‍होंने पेशेंट लेने से यह कहकर इंकार कर दिया, कि बेड खाली नहीं है। जबकि इमर्जेंसी में ही तमाम बेड खाली पड़े थे। हम भाईया को गोमतीनगर स्थित एक प्रसिद्ध निजी अस्‍पताल लेकर गये। वहां डॉक्‍टर ने बताया कि पेशेंट को वेंटीलेटर पर रखना होगा। हमारे पास कोई चारा नहीं था। हमने हां कर दी।

रात भर हमने आईसीयू के बाहर खड़े जो देखा वो भयावह था। डॉक्‍टरों ने मेरे भाईया के शरीर में 5 ड्रिप लगाये। रात भर उनके शरीर में एक के बाद एक दवा डालते रहे। हमारे पास पैसे कम पड़ गये लेकिन दवाओं का चलना खत्‍म नहीं हुआ। सुबह जब दो सीनियर डॉक्‍टर आये और आपस में बोले, "अरे वाह आज तो आईसीयू फुल है।" इन शब्‍दों के बाद डॉक्‍टर के मुंह से सिर्फ मैंने इतना सुना, "आईएम सॉरी मिस्‍टर अजय"। रात भर चली दवाएं मेरे भाई के लिए जहर बन गई थीं। उनका शरीर नीला पड़ गया था। रात भर में 100, 200, 500 रुपए वाली करीब 42 हजार रुपए की दवाईयां उनके शरीर में डाल दी गईं।

इस हादसे के बाद परिवार का क्‍या हाल होगा इसका आप अंदाजा लगा सकते हैं। बाद में पता चला कि उस दिन पीजीआई में सिर्फ जनरल वार्ड ही नहीं, बल्कि आईसीयू में भी बेड खाली थे। यही नहीं जिस अस्‍पताल में मेरे भाई ने दम तोड़ा उसके आईसीयू में रात भर दवाएं चलाने वाले डॉक्‍टर आयुर्वेदिक चिकित्‍सक थे, जिन्‍हें एलोपैथ की एबीसीडी भी नहीं आती।

हमारे सवाल- एसजीपीजीआई जैसे बड़े अस्‍पताल मरीज को बिना देखे उन्‍हें लेने से इंकार क्‍यों कर देते हैं?
- निजी अस्‍पताल जहां वेंटीलेटर या आईसीयू की सुविधाएं हैं वहां तैनात डॉक्‍टर की डिग्री क्‍या है, इसकी जांच क्‍यों नहीं होती?
- उन डॉक्‍टरों से पूछूंगा कि क्‍या वे तब इतने खुश होंगे जब आईसीयू उनके रिश्‍तेदारों से भरा होगा?

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