यूपी में बंद आतंकवादी रिहा होंगे

23 नवंबर 2007 को लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी कचहरी परिसर में एक के बाद एक हुए विस्फोटों में कई लोगों की जान गई थी। एसटीएफ ने कचहरी ब्लास्ट के सिलसिले में दो आरोपियों आजमगढ़ के तारिक काजमी और जौनपुर के खालिद मुजाहिद को 20 दिसंबर 2007 को गिरफ्तार किया था। बाराबंकी रेलवे स्टेशन के बाहर से पकड़े गए इन दोनों के पास से एसटीएफ ने सवा किलो आरडीएक्स के साथ डिटोनेटर व अन्य सामान बरामद किया था। इसके एक हफ्ते बाद ही एसटीएफ ने जम्मू-कश्मीर से सजादुर्रहमान और अख्तर को गिरफ्तार किया था। इन्हें तारिक व खालिद का साथी बताया गया था।
इसके कुछ दिन बाद ही एटीएस का गठन हो गया था और मामले की तफ्तीश एटीएस के पास चली गई थी। एटीएस ने भी मामले को सही पाते हुए आरोपियों के खिलाफ अप्रैल 2008 में आरोपपत्र दाखिल कर दिया था। अदालत ने आरोपपत्र का संज्ञान लेते हुए मामले का ट्रायल शुरू करा दिया था। खालिद और तारिक की गिरफ्तारी का उनके परिवार के सदस्यों व स्थानीय लोगों ने जमकर विरोध किया था।
इसे लेकर कई दिनों तक धरना-प्रदर्शन किया गया। प्रधानमंत्री से लेकर जिलाधिकारी व अन्य को टेलीग्राम व दरख्वास्त भेजे गए थे। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने भी प्रदर्शनकारियों का साथ देते हुए आतंक की घटनाओं में फंसाए गए मुसलिम नौजवानों के हित में आवाज उठाई थी। अब सरकार गठित होने के बाद राज्य सरकार ने इनके खिलाफ मुकदमे वापस लेने को अपनी शीर्ष प्राथमिकताओं में रखा है।
मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने पदभार ग्रहण करने के अगले ही दिन मुख्य सचिव ने कई विभागाध्यक्षों के साथ बैठक कर जो प्राथमिकताएं जारी की थीं, उनमें ‘आतंकवादी घटनाओं में जेल में बंद निर्दोषों के मुकदमों का पुनरावलोकन एवं साक्ष्य न होने की स्थिति में इनके मुकदमों को वापस लिए जाने को’ वरीय प्राथमिकता सूची में रखा गया। इसी परिप्रेक्ष्य में मुख्य सचिव के यहां से न्याय विभाग को लेटर भेज कर तारिक व खालिद के मामले में विशेषज्ञ परामर्श मांगा गया है।
हालांकि सरकार के लिए कचहरी ब्लास्ट के आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस लेना आसान नहीं होगा। ऐसा करना इसलिए खासा मुश्किल होगा क्योंकि गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ साक्ष्यों को प्रमाणित करते हुए उनके खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है और मुकदमा ट्रायल पर है।












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