दो महीने पहले ही हार चुकी थीं मायावती

सारी पार्टियां आरोप प्रत्यारोप की राजनीति में खोई हुई थी और ऐसा लग रहा था कि बसपा सोई हुई थी। हर पार्टी बसपा पर भ्रष्टाचार का कुशासन का
आरोप लगा रही थी लेकिन और बसपा मौन धारण किये हुए सुन रही है, कभी जागती तो दो शब्द विरोध के बोल देती। शायद मौन रहकर ही बसपा जनता को बहुत कुछ समझाना चाहती थी, लेकिन ये भाषा जनता की समझ से परे थी।
चुनाव से पहले जनता से वादों का दौर शुरू हो जाता है लेकिन बसपा ने जनता को रूझाने के लिए ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया। हर पार्टी प्रदेश भर में रैली और चुनावी अभियान चला रही थी लेकिन बसपा ने कुछ जगहों पर ही चुनावी अभियान चलाना उचित समझा। बसपा की चुनाव के प्रति खासा उदासीनता इस चुनाव में दिखाई दिया।
इन सब कारणो को देखकर ऐसा लगता है कि बसपा अपनी हार दो महिने पहले ही मान चुकी थी। सुशासन की बात करने वाली बसपा को शायद भांप चुकी थी कि प्रदेश की जनता का समर्थन वो नहीं जुटा पाएंगी। शायद इसका कारण यह था कि बसपा सरकार में सैकड़ो योजनाएं तो चलायी गयी लेकिन उनका क्रियांवन नहीं हो सका हुआ तो केवल घोटाला। माया सरकार में भ्रष्टाचारी मंत्रियों की एक लंबी लाइन देखने को मिली। उनको बाहर का रास्ता तो दिखाया गया लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
शायद माया को ऐसा लग गया था कि प्रदेश की जनता के ऑखों की पट्टी खुल चुकी है। बसपा से अब सुशासन की उम्मीद जनता भूल चुकी है। जनता बसपा के भ्रष्टाचार से इतना उब चुकी है कि किसी भी कीमत पर वह बसपा की वापसी नहीं करेंगी। मायावती पहले से ही अपनी हार को भांप चुकी थी।












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