जीत के लिये प्रेतों को खून-मांस का भोग लगा रहे प्रत्‍याशी

अंकुर कुमार श्रीवास्‍तव
लखनऊ। यूपी में अपना झंडा लहराने के लिये राजनीतिक पार्टियां कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। जहां पार्टियां एक दूसरे पर आरोप लगाकर पर उसे खाक में मिलाने की कोशिश कर रहे हैं वहीं जमीनी आदमी के वोट के लिये प्रत्‍याशी आसमानी ताकतों की ओर निहार रहे हैं। सूबे के चुनाव में हाईकमान की मेहरबानी से टिकट मिलने के बाद रुहानी ताकतों साधने के लिए उम्मीदवारों ने अपने सारे घो़ड़े छोड़ दिए हैं। प्रत्‍याशी वोट पाने के लिये जहां साष्‍ठांग दंडवत कर रहे हैं वही तंत्र, मंत्र और दुआ का भी सहारा ले रहे हैं।

देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के सात्विक अनुष्ठान तो खैर शायद ही कोई उम्मीदवार हो जो काशी नगरी (वाराणसी) में आकर ना कर रहा हो। हद तो यह है कि चुनाव में शत्रु दमन के लिए मरघट के भूत-प्रेतों को रक्त और मांस का भोग लगाया जा रहा है। वहीं मुसलिम उम्मीदवार मजारों पर अगर चादर चढ़ाकर दुआ कर रहे हैं तो दुश्मन या विरोधी ताकतों को दफन करने के लिए जिन्नातों का आह्वान हो रहा है। दल चाहे कोई हो अब चुनाव जीतने के लिए अपनी पार्टी और अपने काम से ज्यादा उम्मीदवारों को भरोसा हाईएस्ट कमान- यानी ऊपर वाले की मेहर पर है।

सांस्कृतिक और धार्मिक राजधानी में फिलहाल पंडितों, ज्योतिषयों से लेकर तांत्रिकों तक के पास काम की कमी नहीं है। न सिर्फ बनारस या पूर्वांचल के उम्मीदवार, बल्कि प्रदेश के दूसरे हिस्सों से भी लोग यहां पर जीत के लिए कुछ न कुछ पूजन-हवन करा रहे हैं। कोई दुर्गा सप्तशती का विजय संपुट के साथ पाठ करा रहा है तो कोई महामृत्युंजय का सवा लाख और सवा करोड़ पर जाप। कोई अपना वैभव और समृद्धि बढ़ाने के लिए राज-राजेश्र्वरी देवी का अनुष्ठान कर रहा तो कोई महाविद्या देवी से शत्रु दमन की प्रार्थना कर रहा।

इतना ही नहीं मतदान होने के दो दिन बात तक नतीजे अपने अनुकूल लाने के लिए कई पूजाएं चलती रहेंगी। सियासत के दिल्ली दरबार के तमाम गणों को किसी भी कीमत में साधकर टिकट लाने में कामयाब रहे उम्मीदवार भला रुहानी ताकतों में अच्छे-बुरे का भेद क्यों करे। यही कारण है कि रात के सन्नाटे में भी वाराणसी के मणिकर्णिका श्मसान चिताओं व भस्म में भी नेता अपनी जीत का तंत्र-मंत्र तलाश रहे हैं।

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