समाजवादियों ने कांग्रेस को किया हाईजैक
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी के ताबड़तोड़ दौरे जारी हैं। वो जहां भी जाते हैं, मायावती को गरियाते नजर आते हैं। जब से बाबू सिंह कुशवाहा का मुद्दा आया है, तब से भाजपा भी उनके निशाने पर है। लेकिन समाजवादी पार्टी पर उंगली उठाते वक्त वे शायद ही कभी मुलायम सिंह यादव या सपा के किसी नेता का नाम लेते हैं। जरा सोचिये क्यों? आखिर ऐसा क्या है कि सपा के खिलाफ आग के गोले क्यों नहीं निकलते? ऐसा इसलिए क्योंकि समाजवादियों ने यूपी कांग्रेस को हाईजैक कर रखा है!
इस जगह आप सोच रहे होंगे कि ये कैसे संभव है। जी हां ऐसा ही कुछ कांग्रेस में चल रहा है वो भी आज से नहीं बल्कि पिछले कई सालों से। अगर यूपी में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की बात करें तो सबसे पहले नाम आता है प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी का। जो सपा छोड़ कर कांग्रेस में भर्ती हुई थीं। उनके बाद बेनी प्रसाद वर्मा। वो भी एक समय में सपा के कद्दावर नेता कहे जाते थे। राज बब्बर और मुलायम सिंह का दोस्ताना किसी से नहीं छिपा है। पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने भी बसपा और सपा का दामन छोड़ कर कांग्रेस का हाथ पकड़ा।
कहते हैं कि आदमी को बदलना जितना आसान है, उसकी विचारधारा को बदलना उतना ही कठिन। ऐसा ही कुछ इन नेताओं के साथ है। भले ही ये लोग कांग्रेस के लिए जान लड़ाते दिख रहे हैं, लेकिन इनकी विचारधारा समाजवादी ही है। यूपी में राहुल के इर्द रहने वाले इन्हीं नेताओं के बीच ही प्रदेश कांग्रेस का नीति निर्धारण होता है। यानी कुल मिलाकर यूपी में कांग्रेस पार्टी समाजवादी विचारधारा द्वारा हाईजैक हो चुकी है। इनके अलावा महज एक मात्र प्रमोद तिवारी ही हैं, जो हमेशा से कांग्रेस में रहे हैं, लेकिन रीता बहुगुणा के आगे उनकी भी नहीं चल पाती है।
ये तो रही समाजवादी विचारधारा की बात, अब अगर समाजवादी पार्टी की बात करें तो इन चुनावों में अभी से यह संकेत मिलने लगे हैं कि केंद्र में भ्रष्टाचार, काला धन और लोकपाल बिल की वजह से कई सारे दाग लिये हुई कांग्रेस बहुमत से तो नहीं आ पायेगी। अब अगर कांग्रेस पचास-साठ सीटों पर जीत दर्ज कर लेती है, तो वह समाजवादी पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन दे सकती है।
हालांकि ऐसे संकेत मुलायम सिंह यादव की ओर से भी मिले हैं। मुलायम ने हाल ही में एक जनसभा में कहा था कि उन्हें कांग्रेस पार्टी पसंद नहीं है, लेकिन फिर भी वो केंद्र में यूपीए को बाहरी समर्थन वापस नहीं लेंगे। कुल मिलाकर गिव एंड टेक के संकेत मिल रहे हैं। वो यह कि अगर सपा को बहुमत के लिए कांग्रेस का समर्थन मिलता है, तो वो केंद्र में कांग्रेस के संकट को कुछ कम करने में मदद कर सकती है। वही संकट जो ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की ओर से समर्थन वापस लेने की धमकियों के रूप में दिखाई दे रहा है।
साफ शब्दों में कहें तो सपा केंद्र में अपने सांसदों के लिए मंत्रालयों की मांग कर सकती है, जिसके बादले में वो यूपी में कांग्रेस को अपने सहयोगी दल के रूप में सीधे तौर पर मंत्रालय सौंप सकती है। ऐसी कोई डील अभी तक फाइनल तो नहीं हुई है, लेकिन हां मतगणना के बाद ऐसी संभावनाएं प्रबल जरूर हो जायेंगी। यानी अगर कांग्रेस-सपा की सरकार बनी तो कांग्रेस पूरी तरह समाजवादियों के हाथों हाईजैक हो जायेंगे।













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