भोपाल गैस त्रासदी के वक्त शांत चुड़ैल बनकर आयी थी मौत

भोपाल में शनिवार को कुछ लोग न्याय की गुहार में धरने पर बैठ गये, कुछ ने रेल रोकी तो कुछ ने सड़कों पर जाम लगाया, और बदले में उन्हें मिली मध्य प्रदेश पुलिस की लाठियां। सच पूछिए तो सरकार का यह रवैया इस कांड के पीड़ितों के घावों को और ताज़ा कर देता है। यह त्रासदी भारतीय इतिहास में एक भयानक औधोगिक त्रासदी के लिए दुनिया भर में जानी जाती है। अगर इतिहास के पन्नों को पलटें तो आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
इस त्रासदी से उठी उस जहरीली गैस ने भोपाल के हजारों लोगों की लीला एक झटके में ही समाप्त कर दी। यह वही समय था आज के ही दिन ही आधी रात थी जब पूरा भोपाल चैन की नींद सो रहा था, और भोपाल के यूनियन कार्बाइड नामक कम्पनी के कारखाने में टैंक नंबर 610 में एक विस्फोट हुआ, जिससे रिसने वाली जहरीली गैस ने लगभग 15,000 से अधिक लोगो को मौत दे दी।
2-3 दिसंबर 1984 की मध्यरात्री को यूनियन कार्बाइड कारखाने प्लांट सी का टैंक नंबर 610 अचानक फट गया और इसी के साथ भोपाल की सांसो में 42 टन मिथाइल आइसोसाईंनेट रिसकर फैल गया। उस रात हवा का रूख भी गरीबों की ही तरफ था, जिनके पास अपना तन ढकनें के लिए पूरे कपड़े तक नहीं थे। वो भला इस अदृश्य मौत से खुद को कैसे महफूज रख पाते। यह जहरीली गैसे धीमें-धीमें कारखाने के पास के झोपड़ पट्टियों की तरफ बढ़ने लगी।
देखते-देखते इस गैस ने आस-पास के सभी इलाके को अपने आगोश में ले लिया। इस धमाके के बाद शायद किसी को कोई भी सुध नहीं थी। होती भी कैसे ये हुआ ही इतना अचानक था, किसी को क्या पता था, कि मौत इस तरह शांत चुडै़ल की तरह आयेगी और सब बारबाद कर चली जायेगी। जैसा कि पता चला कि, टैंक नंबर 610 का तापमान मापने वाला मीटर खराब हो गया था, इसी दौरान टैंक नंबर 610 में ज़हरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस में पानी मिल गया। इससे हुई रासायनिक प्रक्रिया की वजह से टैंक में दबाव पैदा हो गया और टैंक खुल गया और टैंक से मौत रिसने लगी।
तीन मिनट में मौत
दिन भर कारखाने में हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले इन कर्मचारियों को शायद रोज इतने कम समय में नींद भी नहीं आती होगी जितनी जल्दी उनका समूचा परिवार मौत की नींद सो गया। जब यह हादसा हुआ तो कारखाने के आस-पास के बस्तियों में लोग नींद में थे और उस रात की नींद से वो कभी नहीं जगे। टैंक नंबर 610 से रिसने वाली 42 टन मिथाइल आइसोसाईंनेट को लोगों को मौत देनें में केवल तीन मिनट ही लगे थे।
रात भर गैस ने किया था तांडव
इस हादसे ने पूरी रात भोपाल में मौत का तांडव किया जिससे कभी भी भोपाल उबर नहीं सकेगा। कारखाने में विस्फोट होने के बाद संयोग इतना बुरा था जैसे मानो यमराज ने पूरी दुनिया को दरकिनार कर उस रात भोपाल को ही चुना था। कारखाने में लगा आपातकालिन अलार्म भी उस दिन खराब हो गया था, जो कि नींद में सो रही निर्दोष जनता को जगा भी नहीं सकी, और वह जहरीली गैस ने बड़े ही आराम से वृद्वो, जवानो सहित हजारो बच्चों की सांसो में मौत भर दी।
मौत की सुबह
रात भर में जहरीली गैस अपना भयानक रूप दुनिया के सामने पेश कर दिया था। 3 दिसंबर की सुबह पौ फटने तक हमीदिया चिकित्सालय मूर्दाघर बन चुका था। चारों तरफ लाशे ही लाशे थी, इस त्रासदी में जो बचे थे वो अपने अभागा ही मान रहे थे क्योंकि, उनके पास गले लगाने वाले भी नहीं बचे थे। मृतको को किसी तरह पहचान कर उनके संप्रदायों के अनुसार मुसलमानों के लिए सामूहिक कब्रें खोदी गयीं व हिंदुओं के लिए सामूहिक चिताऐं बनाई गई। इन सारे इंतजामों के बाद एक साथ हजारो लोग जंमिदोज और हजारो आसमान में राख बन उड़ गये।
एक ऐसी मौत जो हर रोज आती है
भोपाल में हुई त्रासदी ने सभी को एक बार में मौत नहीं दी, बल्कि तमाम लोग ऐसे थे जिन्हें मर-मर कर जीने के लिए छोड़ दिया। कारखाने में बनने वाले कीटनाशक का मुख्य तत्व मिक यानी मिथाइल आइसोसाइनेट था, जो कि बहुत ही ज़हरीला होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह प्राणघातक है। इसे ठंडा करके सुरक्षित तरीके से रखा जाना होता है और ख़ासकर पानी से बचा कर, क्योंकि पानी के संपर्क में आते ही यह पदार्थ तेजी से रासायनिक अभिक्रिया करता है जिससे बड़ी मात्रा में ज़हरीली गैस और गर्मी उत्पन्न होती है। इसके कारण उल्टी और सांस लेने में दिक्कत, फेफड़े में सांस लेते वक्त असहनीय दर्द, पेट में भयानक दर्द और उसके बाद बेहोशी आ जाती है। गैस के रासायनिक प्रभाव से त्वचा झुलस जाती है। यही नहीं व्यक्ति के प्रजनन क्षमता को भी प्रभावित करती है।
इस गैस का प्रभाव आज भी भोपाल के जेहन और भविष्य में व्याप्त है। इस गैस कांड के वक्त जो लोग बच गये उनकी आगे आने वाली पिढ़ी इस दर्द को झेल रही है। इस गैस के कारण आज भी गैस से प्रभावित इलाकों में आज भी लोगों की आंखों में जलन, और दर्द होता है, जिसके कारण आये दिन लोग अंधेपन का शिकार हो रहे है। इस त्रासदी के बाद बच्चों की मृत्युदर में इजाफा हुआ है।
इस भयानक कांड के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए दुनिया की कोई भी अदालत आ जाये, तो भी शायद जीवन का वो दर्द कभी नहीं खत्म होगा, जो पीड़ितों को मिले हैं।
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