नवरात्रि- षष्ठि पर मां कात्यायनी करेंगी बुरे कर्मों का नाश

पौराणिक कथाओं के अनुसार महर्षि कत के पुत्र कात्य हुए। कात्य के गोत्र में महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए। कत्यायन के आश्रम में दानवों का भारी आतंक था जिस कारण उन्होंने मां पराम्बा की आराधना की। उन्होंने मां पराम्बा को पुत्री के रूप में पाने की इच्छा कर कठोर तपस्या की।
मां पराम्बा इनके तप से प्रसन्न हुई जिसके बाद मां अपने कात्यायनी रूप में उनके आश्रम में प्रकट हुई। महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट होने के कारण उन्हें महर्षि की पुत्री कहा गया जिससे उनका नाम कात्यायनी देवी पड़ा। देवताओं और ऋषियों के कार्यो को सिद्ध करने के लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई हुई मां के इस स्वरूप के तेज से दावनों का नाश होने लगा।
देवी कात्यायनी ने कुछ ही समय में आश्रम में आने वाले समस्त दानवों व पापियों का नाश कर दिया। सिंह पर सवार चार भुजाओं वाली मां के बाएं हाथ में कमल व तलवार तथा दाहिने हाथ में स्वास्तिक व आर्शीवाद की मुद्रा में है। मां की आराधना से व्यक्ति का आतंरिक व वाह्य जीवन पवित्र व निष्पाप हो जाता है। माता का ध्यान हमारी शक्ति के अनुचित अपव्यय को रोककर उसे कल्याणकारी कार्यों में लगाते हुए सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। मां के सभी भक्तों को पाप-पुण्य, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय, बुरे कर्म-सदकर्म के बीच भेद करने का ज्ञान हो जाता है। मां का स्वरूप स्वर्ण के समान दैदीप्यामान है। मां ब्रजमण्डल की अधिष्ठiात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
ध्यान मंत्र
चन्द्राहासोज्वलकरा शर्दूलवरवाहन:।
कात्यायनी शुभंदद्यात देवी दानवधातिनी।।












Click it and Unblock the Notifications