सोनिया ने संभाली पार्टी की कमान, यूपी चुनाव मुख्य एजेंडा

कांग्रेस और यूपीए की कमान सोनिया गांधी ने केवल 35 दिनों के लिए छोड़ी थी। इतने दिनों में ही यूपीए अपनी राह से भटक गई। इसकी शुरुआत अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के अनशन से शुरू हुई। पहले सरकार ने अन्ना को जेपी पार्क में अनशन की इजाजत दे दी फिर जब वे 16 अगस्त को अनशन के लिए निकले तो उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ भेज दिया गया। सरकार की इस करतूत के खिलाफ देश की जनता एकजुट होकर अन्ना हजारे के समर्थन में सड़कों पर आ गई। दबाव में आई सरकार ने अन्ना हजारे को जेल से रिहा करने का आदेश दे दिया। अन्ना हजारे ने सरकार पर पलटवार किया और वे अपनी शर्तों पर ही जेल से बाहर निकले। इसके बाद सरकार ने अन्ना हजारे को उसी रामलीला मैदान पर अनशन की इजाजत दे दी जहां बाबा रामदेव ने सरकार को घेरा था।
अन्ना हजारे का अनशन 12 दिन तक चला। सरकार में नेतृत्व की कमी देखी गई और कोई भी 12 दिन तक अन्ना के अनशन तुड़वाने के लिए कोई उपाय नहीं निकाल पाया। आखिर में सरकार को झुकना पड़ा और अन्ना की शर्तों को मानने के लिए लोकसभा में प्रस्ताव पास किया गया। इन 12 दिनों में सरकार अन्ना हजारे के सामने घुटने टेकती नजर आई। सोनिया ने अपनी गैरमौजूदगी में राहुल गांधी को यूपीए की कमान सौंपी थी लेकिन राहुल ने लोकसभा में अन्ना के लोकपाल पर ही सवालिया निशान उठा दिया। जिसके बाद सरकार की पूरे देश में किरकिरी हुई।
सोनिया के पार्टी मुखिया न होने पर पार्टी में नेतृत्व की कमी के साथ बयानबाजी का दौर भी जारी रहा। अन्ना के अनशन से ठीक एक दिन पहले कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे को ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार में लिप्त बताया था। अन्ना से तूं के लहजे में बात करते हुए मनीष तिवारी ने कहा कि अन्ना हजारे सेना के भगौड़े हैं। इसके बाद उन्होंने अन्ना से माफी भी मांग ली थी। अब फिलहाल देखना है कि भ्रष्टाचार और अन्ना के वारों से घायल कांग्रेस और यूपीए सरकार को सोनिया गांधी किस तरह से सहारा देती हैं?












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