राहुल गांधी को बर्दाश्त नहीं हो रहा अन्ना का आंदोलन
कांग्रेस के महासचिव व युवा सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा में आज अपने भाषण के साथ एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने पांच बातें कही- पहली-अन्ना का आंदोलन लोकतंत्र पर हमला है, दूसरी सशक्त लोकपाल बनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है और तीसरी लोकपाल को संवैधानिक संस्था बनाने की जरूरत है, चौथी अगर लोकपाल भ्रष्ट निकला तो क्या होगा और पांचवीं लोकपाल से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा।
पहली बात को उठाते हुए मैं राहुल गांधी से पूछा चाहूंगा कि क्या वो जाटों का वो आंदोलन भूल गये, जिसकी वजह से पूर उत्तर भारत तीन हफ्तों तक देश से कटा रहा। दिल्ली जाने वाली ट्रेनों के पहिये जाम हो गये। दिल्ली के कई इलाकों में दूध की सप्लाई बंद हो गई। जगह-जगह आगजनी, तोड़फोड़ और पथराव के मंजर देखने को मिले। सही मायने में देखा जाये तो वो सभी कुछ असंवैधानिक था। इसकी वजह से आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ।
सदन में आज का भाषण सुन कर ऐसा ही प्रतीत होता है कि राहुल गांधी जाटों के आंदोलन को भूल चुके हैं। अगर वाकई में भूल चुके हैं, तो कुछ दिन और इंतजार करें, उन्हीं की कांग्रेस सरकार के खिलाफ जाट एक बार फिर सड़कों पर उतरने वाले हैं। राहुल गांधी अगर अन्ना का अहिंसात्मक आंदोलन को असंवैधानिक कहते हैं, तो बता दें कि आखिर वो क्या चाहते हैं। आखिर उनकी पार्टी जनता का कितना इम्तहान लेना चाहती है।
राहुल की बाकी की बातों को उठायें तो राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी उन्हीं की पार्टी में दिख रही है। तो इस कथन पर पूरे देश में राहुल की जबर्दस्त किरकिरी हुई है। हर विपक्षी दलों के नेता व अन्य लोग इस बात पर थू-थू कर रहे हैं। क्योंकि अन्ना के बिल को पास करने के लिए स्वयं कांग्रेस को राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उस कांग्रेस को जिसकी कमान उनके और उनकी मां के हाथों में है।
तीसरी बात लोकपाल को संवैधानिक संस्था बनाने की जरूरत है, ठीक उसी प्रकार जिस तरह चुनाव आयोग है, जो स्वतंत्र रूप से काम कर सके। इस पर सबसे अच्छी बात शांति भूषण ने कही। उन्होंने कहा कि रोटी दे नहीं पा रहे हैं, मिठाई की बात कर रहे हैं। अरे कम से कम एक बार लोकपाल तो लेकर आयें फिर संस्था तो बना ही जा सकती है। हालांकि इस बात का समर्थन भी तमाम लोगों ने किया।
चौथी बात कि अगर लोकपाल भ्रष्ट निकला तो क्या होगा। इस पर शांति भूषण ने कहा कि राहुल गांधी ने अगर बिल पढ़ा होता तो ऐसी बेवकूफी भरी बात नहीं कहते। बिल में साफ लिखा है कि अगर लोकपाल भ्रष्टा पाया जाये तो उसके खिलाफ कोई भी भारतीय नागरिक सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है।
राहुल गांधी की पांचवीं बात पर गौर करें तो यह पूरा भारत जानता है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। जाहिर है अकेला लोकपाल भ्रष्टाचार नहीं रोक सकेगा इसीलिए लोकपाल के साथ-साथ टीम अन्ना सभी राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति चाहती है। यह साफ दर्शाता है कि राहुल ने अन्ना के बिल को ठीक तरह से नहीं पढ़ा।
वैसे अंत में एक बात जो राहुल गांधी के लिए सबसे कड़वी है, वो यह कि उन्होंने भी सदन में ऐसी बातें करके दूसरे दर्जे के राजनेताओं जैसा ही आचरण दिखाया है। उनके बयान से साफ झलक रहा था कि अन्ना के आंदोलन से कांग्रेस की जो फतीहत हो रही है, वो उन्हें बर्दाश्त नहीं हो रही। आखिर बर्दाश्त हो भी तो क्यों, अन्ना के इस आंदोलन का सीधा असर जनवरी में पांच राज्यों- गुजरात, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, पंजाब और उत्तराखंड में जो पड़ सकता है। इस आंदोलन के बाद आम जनता का मन कांग्रेस से खट्टा हो चुका है और खट्टे मन से कोई उन्हें वोट नहीं देने वाला। यानी यह आंदोलन कांग्रेस के वोट बैंक पर सीधा प्रहार है।













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